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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - गांधी की प्रासंगिकता

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से -   गांधी की प्रासंगिकता

- सुभाष मिश्र
अब पहले की तरह सांप्रदायिक दंगे दिखाई नहीं देते, अब अ नफरत उभर कर दिलों में समा गई है। सोशल मीडिया पर दिन-रात शेयर होने वाली पोस्ट इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। पूरी दुनिया को मानवता का पाठ पढ़ाने वाले महात्मा गांधी के विचारों को हमने दरकिनार करके धर्म और राजनीति का ऐसा घालमेल कर दिया जो गांधी के देश में कतई स्वीकार नहीं है।

गांधी जी राजनीतिक कार्य को सामाजिक और नैतिक प्रगति के लिए किया जाने वाला कार्य बात कहते थे। उनका मानना था कि लोकतंत्र में जीवन का कोई पक्ष राजनीति से अछुता नहीं है। अपने धर्म का अपने देश से ज्यादा प्यार करने वाले गांधी जी कहते थे कि मेरे देश के हित और मेरे धर्म के हित एक ही है। हिन्दुस्तान में चाहे जिस धर्म के आदमी रह सकते है उससे यह एक राष्ट्र मिटने वाला नहीं है। अगर हिन्दू माने कि सारा हिन्दुस्तान सिर्फ हिन्दुओं से भरा होना चाहिए, तो यह एक निरा सपना है। मुसलमान अगर ऐसा मानें कि उसमें सिर्फ मुसलमान ही रहें, तो उसे भी सपना ही समझिये। फिर भी हिन्दू, मुसलमान, पारसी, ईसाई, जो इस देश को अपना वतन मानकर बस चुके हैं। एक-देशी, एक-मुल्की हैं, वे देशी-भाई हैं, और उन्हें एक-दूसरे के स्वार्थ के लिए भी एक होकर रहना पड़ेगा।

पड़ेगा। वोटो की राजनीति के चलते गोडसे जो एक व्यक्ति था अब वह धीरे-धीरे एक पार्टी विशेष और बहुत सी कट्टरपंथी ताकतों का दर्शन बन गया है। भारतीय के हृदय में बसे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या के लिए बार-बार वैमनश्यता की बंदूक अलग-अलग तरीके, फोरम से चलाई जाती है, गांधी बार-बार हताहत होकर उठ खड़े होते हैं। दरअसल गांधी एक व्यक्ति नहीं विचार है जो मानवतावादी, उदारवादी अहिंसा का सबसे बड़ा पैरोकार है। जिसे गांधी दर्शन विचारों की ताकत से हम दुनिया को बदल सकते थे। हमने उसका इस्तेमाल नहीं किया। उल्टे हमारे देश में गांधी के विरूद्ध जहर उगलने का काम सुनियोजित तरीके से किताबों, व्याख्यानों ओर सोशल मीडिया की पोस्ट के जरिए संगठित तरीके से किया जा रहा है।

हिन्द स्वराज की अपनी अवधारणा के जरिए गांधीजी ने असहयोग कानूनों का सविनय भंग और सत्याग्रह की मदद से स्वराज का रास्ता तय किया। हिन्द स्वराज गांधी जी कहते हैं कि देश धर्म की जगह प्रेमधर्म-सिखाती है, हिंसा की जगह आत्म बलिदान को रखती आत्मबल को खड़ा करती है।

गांधीजी भविष्य दृष्टा थे। वे आने वाले समय की आहट को पहचान रहे थे। यही वजह थी कि उन्होंने कहा था कि अंग्रेजी शिक्षा को लेकर हमने अपने राष्ट्र को गुलाम बनाया है। अंग्रेजी शिक्षा से दंभ, राग, जुल्म वगैरा बढ़े है। अंग्रेजी शिक्षा पाये हुए लोगों ने प्रजा को ठगने में, उसे परेशान करने में कुछ भी कर सकते है। हम सभ्यता के रोग में ऐसे फंस गये है कि अंग्रेजी शिक्षा बिल्कुल लिए बिना अपना काम चला सकें ऐसा समय अब नहीं रहा। जिसने वह शिक्षा पाई है, वह उसका अच्छा उपयोग करे। अंग्रेजो के साथ के व्यवहार में जिनकी भाषा हम समझ न सकते हों और अंग्रेज खुद अपनी सभ्यता से कैसे परेशान हो गए है, यह समझने के लिए अंग्रेजी का उपयोग किया जाय। जो लोग अंग्रेजी पढ़े हुए है उनकी संतानों को पहले तो नीति सिखानी चाहिए, उनकी मातृभाषा सिखानी चाहिए और हिन्दूस्तान की एक े दूसरी भाषा सिखानी चाहिए।

दुनिया के किसी भी हिस्से में एक राष्ट्र का अर्थ एक धर्म नहीं किया गया है, हिन्दुस्तान में तो ऐसा था नहीं। सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक अल्बर्ट आइसटीन ने महात्मा गांधी के संदर्भ में कहा था कि आने वाली नस्लें ने शायद मुश्किल से ही विश्वास करेंगी कि हाड़-मांस से बना हुआ कोई ऐसा व्यक्ति भी धरती पर चलता-फिरता था।
मोहनदास करमचंद गांधी जिन्हें बाद में प्यार और श्रद्धा वश बापू य फिर महात्मा गांधी कहा जाने लगा, एक ऐसे ही इंसान थे जो धरती पर युगों में अवतरित होते हैं। न्याय, सत्य एवं अहिंसा के प्रति अपने सत्याग्रह से उन्होंने विश्व समुदाय को प्रेरित किया। आज जब हम गांधीजी की बात कर रहे है तो हम अपनी आजादी की लड़ाई के एक ऐसे वीर सेनानी जिन्होंने स्वतंत्रता का युद्ध तलवार और बंदूक के बदले सत्याग्रह, सविनय अवज्ञा और असहयोग जैसे शस्त्रों से लड़ा। सत्य अहिंसा और सत्याग्रह को अपनी लड़ाई का हथियार बनाने वाले महात्मा गांधी ने सबसे पहले अपनी युवावस्था में आजमाया जब उन्होंने प्रवासी वकील के रूप में अफ्रीका में भारतीय समुदाय के हितों की लड़ाई लड़ी। उन्होंने श्रमिकों के हितों के लिए अपनी आवाज बुलंद की। अत्यधिक भूमि करों और नागरिक अधिकारों में भेदभाव को लेकर अपना प्रतिरोध दर्ज कराया। गांधीजी ने बिहार के चम्पारण से पहले नागरिक अवज्ञा आंदोलन की शुरुआत की। चम्पारण के किसानों ने नील की खेती के लिए दबाव डाले जाने पर ब्रिटिश हुकूमत का विरोध किया ओर इस विरोध का नेतृत्व किया। ब्रिटिश हुकूमत को इस आंदोलन के आगे झुकने पर मजबूर होना पड़ा। उन्होंने स्वतंत्रता के पक्ष में भी अपनी आवाज बुलंद की।

महात्मा गांधी के जीवन का लक्ष्य था पर्दा प्रथा, बाल विवाह, दहेज और सती प्रथा को हमेश के लिए उन्मूलन। भारत की शोषित, पीड़ित, ग़रीब जनता के साथ बापू की गहरी सहानुभूति थी। इसलिए उन्होंने भारत की उसी गरीब जनता का वेश धारण किया ताकि वे उसकी भूख, उसकी गरीबी और पीड़ा को महसूस कर सकें। बापू ने हाथ से बुनी गई लंगोटी और चरखे को अपनाया। सत्याग्रह बापू का हथियार था और उपवास उनकी ताक़त ।

महात्मा गांधी भारतीय समाज की वह   चट्टान है जिससे टकराये बिना हम आगे नहीं बढ़ सकते है। महात्मा गांधी के बहुत से विचारों, सत्य के प्रयोगों से अपनी असहमति के बावजूद पूरी दुनिया में उन जैसा मौलिक विचारक, सत्याग्रही और अपनी बातों पर अडिग व्यक्तित्व पैदा नहीं हुआ। भारतीय राजनीति में गोडसे युग की शुरुआत के बावजूद महात्मा गांधी आज भी उतने ही प्रासंगिक है जितना वे अपने समय में थे। नई पीढ़ी जिन्होंने महात्मा गांधी को नहीं देखा, जो उनके आंदोलन, विचारों से परिचित नहीं है, वह उन्हें व्हाटसअप यूनिर्वसिटी से मिले ज्ञान की वजह से देश का विभाजनकर्ता, सरदार पटेल को प्रधानमंत्री न बनाने वाला, पाकिस्तान को पचास करोड़ रुपये की रकम देने वाला, मुसलमानों का हितैषी बताने वाला भले ही समझे लेकिन महात्मा गांधी एक ऐसे विचारक, चिंतक, ग्राम स्वराज की कल्पना वाले इंसान थे, जो अपने विचारों और कामो की वजह से हमेशा प्रासंगिक रहेंगे। किसी गोडसे की गोली उन्हें कभी खत्म नहीं कर सकेगी।

जो लोग देश में महात्मा गांधी सड़क यानी एमजी रोड बनाकर उस पर चलकर या गांधी जी के फोटो वाले नोटो के बंडल अपनी जेब में रखकर अपने आपको गांधीवादी बताते हुए नहीं थकते, उन्हें भी गांधी को नये सिरे से याद करना होगा। बहुत लंबे समय तक झूठ, पाखंड, आडबंर का दिखावा नहीं चल सकता। कोरोना संक्रमण ने पूरी दुनिया को बता दिया है कि आप अपनी जरूरतों को कम करके आज कम में भी अपना गुजारा कर सकते है। गांधी जी का सादगी के साथ स्वराज की कल्पना वाला विचार आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना गांधीजी के समय था। गांधी कभी नहीं मरते वे हमेशा जिंदा रहते है।