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व्यंग्य : डरे हुए आदमी की आत्मकथा - अखतर अली

व्यंग्य : डरे हुए आदमी की आत्मकथा - अखतर अली


वह आदमी जो नाराज़ शिल्पी से रहता है पर विरोध मूर्ति का करता है डरा हुआ आदमी कहलाता है | उसे चाबुक धारी का विरोध करना था पर वह चाबुक का विरोध करता है | वह त्रस्त पुलिस से रहता है पर निंदा कानून की करता है | वह व्यक्ति जो भगवान से नहीं बल्कि पुजारी से डरता है इस हिम्मती दुनियां में डरा हुआ आदमी कहलाता है |

पड़ोसी इसका मज़ाक बनाते है , उसके घर में पत्थर फेकते है , उसके आंगन में कचरा डालते है , और ये मियाँ यही कहते रहते है कि तेरे बूढ़े बाप का ख्याल कर के चुप हूँ वरना मैंने भी हाथ में चूड़ियाँ नहीं पहनी है , मेरे भी मुंह में ज़बान है | डरपोक आदमी के पास सब्र की ताकत , सहनशीलता की शक्ति बहुत मात्रा में होती है |

डरपोक आदमी विरोध में खड़े होने के बजाये समर्थन में बैठे रहना ज़्यादा पसंद करता है | यह छांव छांव जाता है और छांव छांव आता है | भाषण सुनता है पर प्रतिक्रिया कभी नहीं देता , वोट देता है पर समर्थन किसी का नहीं करता | यह भी एक सुंदर लड़की से प्रेम करता है पर उसे व्यक्त कभी नहीं करता | नदी तक जाता है पर नहाता बाथरूम में ही है | डरपोक आदमी पत्नी के पक्ष में खड़े रह कर मां का विरोध करता है |

डरा हुआ आदमी न खुल कर हंसता है न चीख कर रोता है | मद्धम मद्धम मुस्काता है सिसक सिसक कर रोता है | यह सड़क पर बांये तरफ़ चलता है , लाल बत्ती जलने पर वहीँ रुक जाता है , भीड़ से अलग थलक रहता है और एकांत से बचता है | डरपोक आदमी न टमाटर छाट कर लेता है न आम सूंघ कर | पचास रूपये किलो भिंडी खरीद कर घर में चालीस रूपये बताता है और जवाब में सुनता है इससे तो मै ही जाकर ले आती तो अच्छा होता | डरपोक आदमी पूरी तरह डरपोक आदमी होता है और डरपोक होने के अतिरिक्त और कुछ नहीं होता है | डरपोक आदमी का न कोई दोस्त होता है न ये किसी का दुश्मन |

यह हमेशा आफ़िस से एडवांस लेने का विरोधी रहता है | आफ़िस समय से आधा घंटा पहले पहुच जाता है और शाम को छुट्टी होने के एक घंटे बाद आफ़िस से निकलता है | यह दफ़्तर में वह काम भी कर लेता है जो इसकी ज़िम्मेदारी नही होते | यह सिर्फ़ हाँ बोलता है – न बोलना इसने सीखा नहीं | आफ़िस में मुंह नीचे किये हुए काम करता रहता है और जो जहां बोलता है वहाँ दस्तखत कर देता है | यह हर बात में बस हां में हां मिलाता है इसकी अपनी कोई विचारधारा नहीं होती है |

खेलकूद में ये कभी हिस्सा नहीं लेता है | हारर फ़िल्म तो छोड़िये ये तो कभी वन डे मैच का अंतिम ओव्हर भी नहीं देखता है | डरा हुआ आदमी डरे हुए आदमी से भी डरता है | डरा हुआ आदमी अखबार भी डर डर कर पढ़ता है | डरा हुआ आदमी व्यंग्य नहीं पढ़ता |

पहले यह अपने बाप से डरता था बाद में ये बच्चो से डरता है | स्कूल के अंदर गुरु जी से डरता था और स्कूल के बाहर हर छात्र से | डरा हुआ आदमी कभी ऐतराज़ नही करता और प्रशंसा भी इधर उधर देख कर फिर धीरे से करता है | डरा हुआ आदमी चाय का शौकीन होता है पर कभी चाय की मांग नहीं करता |

डरा हुआ आदमी हर मामले से अपने को दूर रखता है , ये ज़िम्मेदारी से भागता है और कही भी भागते हुए नहीं जाता है | धीरे धीरे चलता है , धीरे धीरे गाता है , धीरे धीरे नहाता है | यह सुबह नहा कर नाश्ता मांगता नहीं बस पत्नी की तरफ़ देखता है धीरे से |

डरा हुआ आदमी कभी रूठता नहीं पर मनाता सब को है | किसी से कभी मांगता नही और अपना सब कुछ देने के लिये हमेशा तैयार रहता है | डरा हुआ आदमी टाईम बार बार देखता है , पानी अधिक पिता है , बाथरूम ज़्यादा जाता है | कोई इसके बाथरूम जाने का भी हिसाब रखता है , कोई इसके जेब के पैसे रोज़ गिनता है | ये खर्चता नहीं और इसके पैसे खत्म हो जाते है | डरपोक आदमी बहन के घर नहीं जाता , बहने डरपोक भाई के घर नहीं आती |

डरा हुआ आदमी टी.वी. चालू नहीं करता , चालू टी.वी. का चैनल नहीं बदलता , इसके हाथ में रिमोर्ट कभी नहीं होता | डरे हुए आदमी का पसंदीदा सीरियल कभी नहीं लगाया जाता | टीवी से उसका संबंध केवल उसकी किश्त पटाने और टाटा स्काई का रिचार्ज कराने तक ही होता है |

डरा हुआ आदमी मुशायरे में वाह वाह नहीं करता | न दाद देता है न इरशाद कहता है , न किसी ख़ास गज़ल की फरमाईश करता है न किसी अच्छे शेर को दोबारा पढ़ने की मांग करता है | वह जब भी किसी प्रोग्राम में शामिल होता तो हाँल में बहुत धीरे से दाखिल होता , सब से पीछे की सीट पर बैठता है | कार्यक्रम की समाप्ति पर तेज़ी से बाहर निकलता है और लम्बे लम्बे पग भरता हुआ घर की दिशा में बढ़ने लगता है | किसी को मालूम भी नहीं होता कि वह आया था |

डरा हुआ आदमी दुनियां में नहीं होने की तरह होता है | ये परिवार वालों के साथ रहता है लेकिन परिवार वाले इसके साथ नहीं रहते | यह एक मकान बनवाता है लेकिन वह मकान इसका कभी नहीं कहलाता | यह फर्नीचर खरीदता है लेकिन उसका चयन कोई अहमियत नहीं रखता | खरीदने को तो ये कार भी खरीदता है लेकिन करता है हमेशा पदयात्रा | इसका बैंक में खाता भी होता है लेकिन ये हमेशा डिपाजिट स्लीप ही भरता है चैक बुक कभी इस्तेमाल नहीं करता | इसके पास ए टी एम कार्ड भी होता है जिसका इस्तेमाल हमेशा दूसरे करते है | यह दुनियां में रह कर सिर्फ़ भुगतान करता है |


डरा हुआ आदमी हमेशा से तन्हा था , तन्हा है और तन्हा रहेगा | ये जब जलता है तो न रौशनी थोड़ी ज़्यादा होती है और जब ये बुझ जाता है तब न ही अँधेरा ज़्यादा गहराता है | ये शख्स ज़्यादा जी भी गया तो क्या और जल्दी मर भी गया तो क्या ? इसके हाथ में कभी इतना कमाल नहीं होता कि वह मिटटी को सोना कर दे लेकिन सोने को मिटटी करने का हुनर इसका पैदाइशी हुनर होता है |

डरे हुए आदमी पावर , लुक्स , फन और तकनीक से पूरी तरह ख़ाली रहते है | इनके अंग भी इनके शरीर के लिये काम नही करते | इन्हें हाशिये में डाल दिया जाता है जहां से ये कभी मुख्य धारा में लौटने की कोशिश नही करते |

डरा हुआ आदमी जब बीमार होता है तब किसी को नहीं बताता , इससे कोई पूछता भी नहीं कि इतना सुस्त क्यों लग रहे हो ? डरा हुआ आदमी डाक्टर से भी डरता है , दवाओं से डरता है , इंजेक्शन से डरता है , इलाज के खर्चे से डरता है | फिर डरा हुआ आदमी बिस्तर पकड़ लेता है , खाना पीना बंद कर देता है , अब वह बोल भी नहीं पाता , सुन भी नहीं पाता , समझ भी नहीं पाता और एक दिन डरा हुआ आदमी मर जाता है |

डरे हुए आदमी की मृत्यु समाचार नहीं बनती , सुन कर कोई चौकता नहीं , कोई अफ़सोस नहीं करता , कोई दहाड़े मार मार कर रोता नहीं | डरा हुआ आदमी आज पहली बार नहीं मरा है वह तो जब तक ज़िन्दा था रोज़ मरता था , बल्कि वह तो कभी ज़िंदा था ही नहीं क्योकि डरे हुए आदमी का जीना भी कोई जीना है ?