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ध्रुव शुक्ल की कविताः मनौती के धागे

ध्रुव शुक्ल की कविताः मनौती के धागे


इस बिरछा पर

पूरे गाँव का दुख टँगा है

टहनियों पर

रंगबिरंगी चिंदियाँ बाँधे

तूल की झण्डियाँ खोंसे जड़ों में

गाँव के मुहाने पर खड़ा

जैसे कोई मस्खरा


उसे देखकर कोई नहीं हँसता


जो भी उसके पास आता है

एक झण्डी खोंस देता है

एक चिंदी और

बांध देता है कसकर

मनौती के धागे

मन हो तो सिसक लेता है


हर गठान में एक दुख बंधा है

हर झण्डी में एक पीड़ा फहरा रही है


कभी किसी को लगता है

कि सुख आ गया

तो अपनी गठान खोल देता है


हवा जब पत्ते झराती है

दुख की कोंपलें छाया किये रहती हैं

पूरे गाँव की पीड़ा अकेली फहराती है