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छत्तीसगढ एक खोजः पहली कड़ी पार्ट - 3: किशोर नरेंद्र की रायपुर यात्रा

छत्तीसगढ एक खोजः पहली कड़ी पार्ट - 3: किशोर नरेंद्र की रायपुर यात्रा

 रमेश अनुपम

इस तरह पन्द्रह बीस बैलगाड़ियों का कारवां पन्द्रह - बीस दिनों की अथक यात्रा के पश्चात् रायपुर पहुंचा। कोतवाली से कालीबाड़ी चौक की ओर जाने वाले मार्ग में स्थित डे भवन में बैलगाड़ियों का यह कारवां थम गया। भूत नाथ डे के भवन में ही विश्वनाथ दत्त ने भी अपने परिवार के साथ डेरा डाला । डे भवन के ऊपर के दो कमरों में विश्वनाथ दत्त और भुवनेश्वरी देवी ने अपनी नई गृहस्थी सजाई। नरेंद्र,  छोटी बहन जोगेन बाला, छोटे भाई महेंद्र ने अपने इस नए आशियाने में धमाचौकड़ी मचाई।

विश्वनाथ दत्त को छोड़कर सबके लिए रायपुर एक नया शहर था।विशाल कोलकाता की तुलना में छोटा सा और शांत शहर।

तब रायपुर शहर केवल बूढ़ा पारा तक ही सिमटा- सिकुड़ा हुआ था।  हां तब विशाल सागर सा बूढ़ा तालाब जरूर था। जो रायपुर शहर को एक नई पहचान देता था। जिसकी जलराशि पशु,पक्षी, मनुष्य सबको एक साथ आकर्षित करती थी। 

यह उस दौर की कहानी है जब रायपुर चारों ओर से जंगलों से घिरा हुआ था। 

रायपुर में कोलकाता के मुकाबले कोई अच्छा स्कूल न होने के कारण किशोर नरेंद्र की शिक्षा - दीक्षा घर पर ही होने लगी। 

पिता विश्वनाथ दत्त रोज घर पर ही तीनों बच्चों को पढ़ाया करते थे। विश्वनाथ दत्त से मिलने रायपुर के बंगाली समाज के अनेक भद्र लोक उन दिनों डे भवन आने लगे थे। 

घर आने वाले भद्र लोगों के साथ हो रही चर्चाओं में किशोर नरेंद्र भी सम्मिलित हो जाया करते थे। 

पिता के साथ होने वाली चर्चाओं को वे ध्यानपूर्वक सुना करते थे और कभी - कभी अपनी जिज्ञासाओं को भी उन सबके समक्ष रखा करते थे। कभी - कभी अपनी किसी अपूर्व निष्पत्तियों से सबको आश्चर्यचकित भी कर दिया करते थे। उन दिनों ऐसे थे किशोर नरेंद्र। 

कभी-कभी खाली समय में वे नीचे रहने वाले भूतनाथ डे के घर पर भी पहुंच जाते थे। श्रीमती एलोकेशी डे की गोद से छह माह के छोटे से बच्चे हरिनाथ डे (कालांतर में विश्व के महान जीनियस कहलाने वाले )  को  लेकर डे भवन में अपनी छोटी बहन जोगेन बाला के साथ घूमा करते थे।

उन दिनों शाम होते - होते अक्सर डे भवन रायपुर के भद्र बंगालियों का अड्डा बन जाता था। विश्वनाथ दत्त के यहां अक्सर यह भद्र मंडली एकत्र होती थी। 

अनेक विषयों पर विचार विमर्श का दौर चलता था। देश - विदेश की अनेक घटनाओं से लेकर धर्म, दर्शन जैसे गूढ़ विषयों पर वाद - विवाद और संवाद का असमाप्त सिलसिला चलता रहता था।

नरेंद्र इन सबको ध्यान से सुनते रहते थे। उन्हें बड़े - बुजुर्गों की यह महफ़िल रास आती थी। वे कभी - कभी श्रोता की भूमिका से अलग हटकर स्वयं भी इस विमर्श में शामिल हो जाते थे।

किशोर नरेंद्र से जुड़ी हुई एक घटना का उल्लेख हिंदी ग्रंथ ' विवेकानंद चरित ' तथा बांग्ला ग्रंथ ' जुग नायक विवेकानंद ' ' ( स्वामी गंभीरानंद ) दोनों ही ग्रंथों में मिलता है। 


डे भवन में एक बार विश्वनाथ दत्त के एक साहित्यिक मित्र बांग्ला साहित्य की चर्चा कर रहे थे, तब नरेंद्र ने भी बांग्ला साहित्य के अनेक ग्रंथों की विस्तारपूर्वक चर्चा कर सबको चकित, विस्म्मित कर दिया था। उस समय किसी ने भी यह नहीं सोचा था कि चौदह वर्षीय यह किशोर बांग्ला साहित्य में भी निष्णात और प्रवीण है। 

उसी समय नरेंद्र के बांग्ला साहित्य के ज्ञान से चकित होकर विश्वनाथ दत्त के एक मित्र जो बांग्ला साहित्य के विद्वान थे , उन्होंने नरेंद्र से बांग्ला में जो कहा वह इस प्रकार है ' बाबा एक दिन न एक दिन तोमार नाम आमरा सुनते पारबो ' ( बाबा एक दिन न एक दिन हम लोग तुम्हारा नाम अवश्य सुनेंगे। ) अर्थात् एक दिन तुम्हारा नाम पूरे भारत वर्ष में रोशन होगा। 

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विश्वनाथ दत्त संगीत के अच्छे ज्ञाता भी थे। उनका कंठ भी सुमधुर था, वे मौज में आकर गाने बैठ जाते थे। किशोर नरेंद्र भी अपने पिता के साथ गाने लग जाते थे। वैसे भी प्रत्येक बांग्ला भाषी भद्र समाज की गंभीर रुचि साहित्य और संगीत में न हो यह संभव ही नहीं है।

भूतनाथ डे भी इस संगीत मंडली का पूरा - पूरा आनन्द उठाते थे। वे स्वयं भी संगीत और साहित्य के कम बड़े रसिया नहीं थे। 

भूतनाथ डे के पास बांग्ला और अंग्रेजी किताबों का अनमोल खजाना भी था, जिसका पूरा आनंद किशोर नरेंद्र उठाते थे।

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रायपुर में किशोर नरेंद्र के अपने परिवार के साथ बिताए हुए ये  दिन उनके जीवन के सर्वाधिक महत्वपूर्ण और अनमोल दिन थे। पिता विश्वनाथ दत्त कभी - कभी फुर्सत में खुद अपने हाथों से खाना बना देते थे। विश्वनाथ दत्त पाक विद्या में पारंगत थे। अपने हाथों से सुस्वादु भोजन बना लेने की कला में माहिर थे। नरेंद्र बहुत ध्यान से अपने पिता को खाना बनाते हुए देखा करते थे और कभी स्वयं भी पिता के साथ हाथ बटाया करते थे। कालांतर में स्वामी विवेकानन्द के रूप में विख्यात होने के पश्चात वे खुद अपने हाथों से सुस्वादु भोजन पका कर अपने शिष्यों को खिलाया करते थे। स्वामी विवेकानंद के शिष्य उनकी पाक विद्या के कायल थे। यह पाक विद्या रायपुर प्रवास की ही देन थी।

शेष अगले रविवार....