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II अध्यक्षजी ये 'असंसदीय' है : वरिष्ठ पत्रकार अनिल द्विवेदी समझा रहे हैं कि विधानसभा में संसदीय विमर्श कैसे रास्ता भटक रहा है! एक विश्लेषण

II अध्यक्षजी ये 'असंसदीय' है : वरिष्ठ पत्रकार अनिल द्विवेदी समझा रहे हैं कि विधानसभा में संसदीय विमर्श कैसे रास्ता भटक रहा है! एक विश्लेषण
  • अनिल द्विवेदी

सच्चर कमेटी की सिफ़ारिशों को लेकर लोकसभा में चर्चा चल रही थी. सांसद पीके बीजू समय का ध्यान न रखते हुए बोलते जा रहे थे. तत्कालीन लोकसभा स्पीकर मीरा कुमार ने उन्हें चेताते हुए कहा, “जल्दी खत्म कीजिए और अपना पूरक प्रश्न पूछिए. इस पर बीजू ने कहा, "मैडम, मैं केरल से आता हूं, तो स्पीकर ने उनसे कहा, 'जल्दी आइए! उसके बाद सदन ठहाकों से गूंज गया. लेकिन छत्तीसगढ़ विधानसभा में ठहाके नही बल्कि कुतर्क किए जा रहे हैं! लगता है संसदीय विमर्श अपना रास्ता भटक गया है.

मैं जिक्र करना चाहता हूं विधानसभा में उठकर खत्म हो चुके ताजा विवाद की. गुजरे रोज वहां अजीब सा 'शून्यकाल' उभरा. बजट सत्र में गृह विभाग के प्रस्ताव पर चर्चा शुरू हुई तो विधानसभा अध्यक्ष डॉ.चरणदास महंत ने सबसे पहले विपक्ष को अपनी बात रखने का मौका दिया. चर्चा की शुरूआत विधायक शिवरतन शर्मा ने की लेकिन जब वे आधा घण्टा से ज्यादा बोलते रहे तो महंत ने उन्हें टोका और आग्रह किया कि, 'समय का ध्यान रखें...विपक्ष के लिए तय आधा घण्टा का समय तो आपने अकेले ही ले लिया! अगर एक—एक सदस्य इसी तरह बोलते रहे तो सदन चलाना मुश्किल हो जाएगा.' महंत की बात सुनकर भाजपा विधायक नाराज हो गए और चर्चा का बहिष्कार कर दिया.

भाजपा के इस विवाद के ठीक पहले, कांग्रेस विधायक बृहस्पति सिंह अपना भाषण दे रहे थे तो अध्यक्ष की आसंदी पर बैठे वरिष्ठ सदस्य ने उन्हें समय पर अपनी बात रखने को कहा. इस पर सिंह उखड़ गए. उनका आरोप था कि किसी को ज्यादा समय दिया जा रहा है और किसी को कम. मैं अपनी बात पूरी करके रहूंगा. उनके लहजे पर विपक्ष ने आपत्ति की और इसे आसंदी का अपमान बताया. खैर..यह प्रवृत्ति हमें डराती है. बड़ा सवाल यह है कि क्या हमारी विधानसभा का संसदीय विमर्श अपना रास्ता भटक गया है!

जैसे स्कूल में एक प्रिंसिपल होता है..मंदिर में पुजारी और परिवार में पिता.. वैसे ही विधानसभा का एक अध्यक्ष होता है. चारों पदवियां देहात्मबुदिध की प्रतीक हैं. लोकतंत्र के सुचारु संचालन के लिए विधानसभा जैसी संस्थाएं बेहद जरूरी हैं. इनकी मर्यादा की रक्षा के लिए आवश्यक है ऐसा निजाम, जो पूरी तरह पारदर्शी और आमजन के प्रति जवाबदेह हो. विधानसभा स्पीकर के रूप में डॉ.महंत अपने इस कर्तव्य को निष्पक्ष और प्रभावी ढंग से अच्छी तरह निभा रहे हैं. न्यायपरक सवाल यह है कि महंत ने कौन सी अपमानजनक बात कह दी! विधानसभा अध्यक्ष के तौर पर संविधान ने जो शक्तियां उन्हें प्रदान की हैं, उसी के दम पर वे सदन चलाते हैं. सदन को कैसे चलाना है, यह तो वे ही तय करेंगे.

विधानसभा के अंदर संसदीय परंपराओं का पालन हो, विधायकों के अधिकारों और गरिमा की रक्षा हो, पक्ष और विपक्ष में सामंजस्य बना रहे, यह देखने और तय करने की जिम्मेदारी महंतजी की है जिसे वे अब तक बखूबी निभाते आए हैं. अन्यथा ढाई साल के कार्यकाल में यह विवाद पहली बार खड़ा हुआ है और वह भी भाजपा विधायकों के अड़ियल रवैये के कारण. विपक्ष की मंशा सवालों के घेरे में है. भाजपा विधायकों ने बहिष्कार का जो कारण बताया है, वह पच नही रहा. हालांकि इसके कुछ ही समय बाद संसदीय कार्यमंत्री रवीन्द्र चौबे भाजपा विधायकों को मनाने पहुंचे लेकिन बात नही बनी. विपक्षी विधायक इस बात पर अड़े रहे कि स्पीकर अपनी तरफ से बातचीत के लिए बुलाएं जबकि विधानसभा अध्यक्ष डॉ महंत का सवाल वाजिब था कि मेरी कोई गलती नहीं है..मैंने तो समयानुकूल व्यवस्था का सवाल उठाया है! इसमें क्या गलत है!



हम सब जानते हैं कि महंतजी संसदीय परंपराओं के श्लाघ विशेषज्ञ हैं. अविभाजित मध्य प्रदेश में गृह मंत्री रहने से लेकर सांसद और केन्द्रीय राज्य मंत्री तक का सफर उन्होंने तय किया है. वे गहरी राजनीतिक समझ रखते हैं और संसदीय ज्ञान के जानकार भी. यही वजह रही कि उनके ढाई साल के अध्यक्षीय कार्यकाल में पहले विवाद ने मुंह उठाया है. ऐसा एक क्षण भी प्रतीत नही हुआ कि सरकार के समर्थक विधायक होते हुए उन्होंने कभी सत्तापक्ष को बख्शा हो या विपक्ष को फंसाया हो.

इसकी नजीर भी स्थापित हुई. विवाद के दूसरे ही दिन संसदीय कार्यमंत्री रविन्द्र चौबे अपने प्रस्ताव पर भाषण दे रहे थे तो डॉ.महंत ने उन्हें रोका और व्यवस्था का हवाला देते हुए कहा कि, 'आप अपनी बात 15 मिनट में खत्म कर दीजिएगा ! हालांकि थोड़ी देर के लिए चौबेजी झेंप से गए लेकिन महाराज ने जिस उदारता के साथ उसे स्वीकारा और महंतजी ने जिस न्यायवादिता के साथ उन्हें आगाह किया, दोनों के व्यवहार ने विधायकों, आमजनों और मीडिया के बीच खूब प्रशंसा पाई. सत्ता पक्ष से जुड़ा होने के बावजूद अपने ही मंत्री से समय—पालन करने की सीख देकर महंत ने संदेश दिया है कि उनके नियम सदन में सभी के लिए बराबर हैं. यही है कबीराना दर्शन.

सियासत में कुछ भी बेमकसद नहीं होता. यहां उपस्थिति, अनुपस्थिति, मौन हो या मुखरता, सबकी अपनी अहमियत होती है. एक जागृत लोकतंत्र में सवाल उठने लाजिमी हैं. कभी-कभी कुछ आरोप भी लग सकते हैं. कुछ गलतफहमियां भी पैदा हो सकती हैं, पर बदनीयती न हो तो उन पर आसानी से पार पाया जा सकता है. सदन की कार्रवाई का बहिष्कार कर रहे भाजपा विधायकों ने न्यायपरक सवाल उठाया कि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष मोहन मरकाम लगभग 25 मिनट तक अपनी बात रखते रहे. उन्हें क्यों नही रोका गया! क्या मरकाम को सत्ता पक्ष का होने का लाभ दिया गया! बहरहाल भाजपा विधायक बहिष्कार खत्म कर सदन में लौट आए हैं और महंतजी ने भी अपने पास अलार्मिंग घण्टी रख ली है! फिलहाल भाजपा विधायकों के लिए यह सलाह जरूरी है कि यदि वे अटलजी को अपना आदर्श मानते हैं तो उन्हें यह भी सीखना होगा कि सदन में कम से कम समय में, प्रभावी तरीके से अपनी बात कैसे रखें! सत्ताकांक्षा में अकुलाए माननीयों से अनुरोध है कि वे आसंदी की गरिमा बनाए—बचाए रखेंगे. विपक्ष को यह डर भी होना चाहिए कि अगर वे अपनी जिम्मेदारी से भागेंगे तो राज्य का मतदाता उन्हें देख रहा है.

अटलजी ने संसद में सही कहा था : न भीतो मरणादस्मि केवलं दूषितो यश: अर्थात मैं मृत्यु से नहीं डरता, डरता हूं तो बदनामी से, लोकापवाद से डरता हूं.


( लेखक दैनिक आज की जनधारा के संपादक हैं )