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अभिनय में ' विराट ' था दीपक

अभिनय में ' विराट ' था दीपक

जब भी लोग हबीब तनवीर को याद करेंगे तब तब  लोग दीपक तिवारी का भी नाम जरूर लेंगे। दीपक के भीतर छिपी गजब की अभिनय क्षमता और देह गति को समझकर हबीब तनवीर ने उन्हें अपने सबसे चर्चित नाटक चरणदास चोर में चरणदास का रोले दिया। हबीब तनवीर के नया थिएटर में चरनदास चोर में चोर के रूप में उन्होंने राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय ख्याति अर्जित की। संगीत नाट्य अकादमी सम्मान से सम्मानित दीपक तिवारी जिन्होंने बाद में अपने नाम के साथ 'विराट' जोड़ लिया था ,अपनी अभिनय क्षमता में वाकई विराट थे। हबीब तनवीर द्वारा निर्देशित नाटक लाला शोहरतरराम ,मिट्टी की गाड़ी , आगरा बाजार,  कामदेव का अपना बसंत ऋतू का सपना ,देख रहे है नैन ,जिन लाहौर नहीं वेख्या ,वो जन्मा नहीं ,हिरमा की अमर कहानी जैसे नाटकों में काम किया। 

छत्तीसगढ़ फिल्म एंड विजुअल आर्ट सोसाइटी के अध्यक्ष सुभाष मिश्र और नाट्य निर्देशिका श्रीमती रचना मिश्र ने दीपक तिवारी के निधन को अपनी व्यक्तिगत क्षति बताया है। बेटे सूरज के निधन के बाद जिस तरह से पूनम ने दीपक को और खुद को संभाला था और जिस सहस और धैर्य का परिचय दिया,वह अविस्मरणीय है। 

भारतीय जन नाट्य संघ(इप्टा) की राष्ट्रीय समिति प्रख्यात की ओर से राष्ट्रीय अध्यक्ष रणवीर सिंह और महासचिव राकेश  रंगकर्मी एवं अभिनेता दीपक तिवारी के निधन पर गहरा शोक व्यक्त करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करती है। हबीब तनवीर के नया थिएटर में चरनदास चोर में चोर के रूप में उन्होंने राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय ख्याति अर्जित की।उन्होंने हबीब तनवीर तनवीर के नाटक मिट्टी की गाड़ी,लाला शोहरत राय, आगरा बाज़ार, देख रहे हैं नैन, हिरमा की अमर कहानी,कामदेव का अपना,बसंत ऋतु का सपना आदि में अविस्मरणीय चरित्रों का अभिनय किया।अभिनय के लिए उन्हें केंद्रीय संगीत नाटक अकादमी का सम्मान भी मिला।आठवें दशक की शुरुआत में वे रायपुर इप्टा से भी जुड़े रहे।उनकी पत्नी पूनम तिवारी भी प्रख्यात रंगकर्मी हैं।कोई दो साल पहले उनके नौजवान बेटे का निधन हुआ था।इस आघात से उन्हें गहरा धक्का लगा था और वे लगातार अस्वस्थ रहे। पूनम तिवारी ने लगातार न सिर्फ उन्हें संभाले रखा बल्कि वे लगातार नाटक भी करती रहीं।इप्टा उनके परिवार,मित्रों और प्रशंसकों के शोक में शरीक है।

नाट्य लेखक और नाट्य समीक्षक अख्तर अली ने अपनी श्रद्धांजलि में कहा है की हबीब तनवीर के नाटको के माध्यम से उन दिनों देश के रंगमंच में दीपक के जलवे थे | वह दीपक ही था जिसने हबीब साहब के पुराने थियेटर को एक बार पुनः "नया थियेटर" कर दिया था | समय के साथ जब एक एक कर सभी बड़े कद के अभिनेता जुदा हो गये तब रंगमंच के हबीबी अंदाज़ को इसी दीपक ने रौशन किया था | वह वास्तव में दीपक था , उसके अन्दर थियेटर की आग थी , दीपक ने अपनी लौ से अँधेरे में घिर चुके चरणदास चोर को जगमगा दिया था | नया थियेटर के मंच पर दीपक जब पहली बार चरनदास चोर बनकर थिरका था तब हबीब तनवीर ने राहत की लम्बी सांस ली थी , उन्होंने एक नज़र मोनिका तनवीर पर डाली और नज़र ने नज़र से नज़र को कह दिया कि हमे दीपक के रूप में एक साथ कई गोविन्द निर्मलकर मिल गए है | दीपक एक विराट कद का अभिनेता था | जिस अंदाज़ में वह मंच पर विचरण करता था तो ऐसा लगता था मानो इसकी पीठ पर भी आँख है | दीपक की आँख में भी शरीर था | दीपक के सुर में आकर्षण था , उसकी आवाज़ में सम्मोहन था , उसकी बाड़ी में गज़ब की लचक थी | लोग यह गलत कहते है कि हबीब तनवीर ने उसे अभिनेता बनाया , वह तो अभिनेता था ही हबीब तनवीर ने उसे काम दिया , अवसर दिया , उसके अभिनय को और बेहतर ढंग से तराशा | यह जो रंगमंच की दुनिया है न , यहाँ हर हबीब तनवीर को एक दीपक मिल ही जाता है , लेकिन हर दीपक को एक हबीब तनवीर नहीं मिलता |पाज़ेब की छन्न छन्न और चूड़ियों की खनखन से लबरेज़ होता था दीपक मंच पर | उसकी हर अदा निराली और हर अंदाज़ अनोखा था | उसके अभिनय में पात्र के अनुसार लक्षण पाए जाते थे |चरनदास चोर में तो दीपक ने अभिनय की कापी किया था , उसका मौलिक अभिनय तो "नंद राजा मस्त है" में मैंने काफी करीब से देखा था क्योकि इस नाटक में मैं भी दीपक विराट के साथ मंच पर था | हबीब तनवीर और राष्ट्रीय नाट्य विद्दालय के  कार्तिक अवस्थी द्वारा तैयार इस नाटक में सलीम आरिफ ने लाईट की थी और सपना अवस्थी ने गानों की धुन बनाई थी | जब इस नाटक का दिल्ली के प्यारे लाल भवन में मंचन किया गया था तब मंच पर दीपक के तेवर देख कर दिल्ली का रंगमंच चौक पड़ा था | आरंभिक दिनाे में दीपक पेशेवर फ़ाेटाेग्राफ़र था जिसे रंगमंच पर नीला अहमद नीलू मेघ ने पहली बार लाया था, दीपक मेरे दाेस्त तुम हमेशा याद में ज़िंदा रहाेगे |


 विचारक चिंतक ईश्वर सिंह दोस्त ने श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा, "मेरी कभी व्यक्तिगत मुलाकात नहीं हुई। दो तीन नाटकों में देखा था। जिसमें एक बार तालकटोरा स्टेडियम में करीब 5-6 हजार दर्शको के बीच सड़क नाटक भी शामिल है। उनकी मंच पर मौजूदगी इतनी प्रभावशाली और स्वयंस्फूर्त थी कि उन दृश्यों को कभी नहीं भुलाया जा सकता। कोई दस साल पहले भोपाल में सुरता हबीब में उनके व पूनम के संस्मरणों को सुना था। विनम्र श्रद्धांजलि"

आकाशवाणी से जुड़े साहित्यकार राजीव कुमार ने कहा है की दीपक तिवारी ने अपनी शुरुआत के दिनों में इप्टा, रायपुर के साथ भी काम किया था, जिन दिनों मेरा भी इससे संग-साथ था। संभवतः तब वे मध्य प्रदेश शासन के जन-संपर्क विभाग में नौकरी करते थे। फिर हबीब साहब का साथ पकड़ने के बाद उन्होंने पूर्णकालिक रंगकर्मी का जीवन अपना लिया। उन दिनों के भी हम आरंभिक साक्षी थे। उनसे मेरी अंतिम भेंट दिल्ली में कमानी सभागार में 2 फ़रवरी, 2020 को भारत रंग महोत्सव के दौरान हुई थी, जब राजनांदगांव के समूह रंग छत्तीसा ने नाचा शैली में सत्तार खां और लक्ष्मण देशमुख लिखित और दीपक की जीवनसंगिनी पूनम तिवारी के निर्देशन में नाटक 'महुआ के पानी' का मंचन किया था। नाटक के बाद मैं और मेरी पत्नी रीना कलाकारों और निर्देशक से बात करने मंच के पास गए। दीपक जी के बारे में पूनम जी से पूछा, तो उन्होंने दिखाया। सबसे आगे की पंक्ति में दीपक बैठे थे। मैं पास गया, अभिवादन किया, अपना परिचय याद कराया। पता नहीं, उन्हें कुछ याद आया कि नहीं, पर वे मंद-मंद मुस्कुराए से ज़रूर। मैंने उनके हाथ पकड़े और स्पर्श से ही कुछ कहने की कोशिश की। फिर विदा ली। आँखों के सामने 1980 के दशक के युवा दीपक तिवारी का मासूम चेहरा और छरहरा लचक भरा शरीर लहरा रहा था। कम लोग ऐसा साहस रखते हैं कि लगी-लगाई नौकरी छोड़ कर एक अनिश्चित जीवन के रोमांच को चुनने का जोखिम उठाएं। विनम्र श्रद्धांजलि।