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ध्रुव शुक्ल की कविताः अकेली स्त्री मंदिर जा रही है

ध्रुव शुक्ल की कविताः अकेली स्त्री मंदिर जा रही है


प्रार्थना में डूबा अकेला शब्द

खोजता है उस अकेले शब्द को

जिसे सुना सके अकेले में अपना दुख


थोड़े-से प्रकाश को आँचल में छिपाये

मंदिर जा रही है अकेली स्त्री

अकेले शब्द के पास


रास्ते के दाहिने-बायें खड़ी

शब्दों की भीड़

नहीं देख पा रही अकेले शब्द को

उसे दिखायी दे रही है केवल स्त्री


वासना के कचरे में लिथड़े

शब्दों के सामूहिक हमले से

बचाती अपने आपको

चली जा रही है अकेली स्त्री

अकेले शब्द में बसी उम्मीद के पास


मंदिर में अकेले शब्द के सामने

ठिठकी खड़ी रह गयी अकेली स्त्री

नहीं बचा पा रही उम्मीद का अर्थ

अकेली रह गयी अपनी प्रार्थना में


वासनाओं से भरे मंदिर के अंधेरे में

काँप रही है अकेली रह गयी स्त्री

बुझ रही है अकेले दीप की लौ-सी