breaking news New

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - छत्तीसगढ़ी को लेकर सार्थक पहल

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से -  छत्तीसगढ़ी को लेकर सार्थक पहल

-सुभाष मिश्र

मूलत: हम उत्सवधर्मी हैं। हमें किसी न किसी बहाने उत्सव मनाना पसंद है। पिछले एक साल से कोरोना संक्रमण के डर से बहुत सारे लोग चाहकर भी उत्सव, आयोजन, बड़े धार्मिक रीति-रिवाजों में शामिल नहीं हो पाये। इस बीच पिछले तीन माह में कोरोना के केसों में आई गिरावट के चलते लोगों ने बड़ी संख्या में घर से निकलना शुरु किया। एक बार फिर से समाज मेें उत्सवधर्मिता का माहौल दिखने लगा। इस बीच देश के बाजारों में, सड़कों पर रौनक लौटी लेकिन अब फिर से कुछ जगहों पर लॉकडाउन की स्थिति निर्मित होने लगी है। स्कूल-कालेज, आंगनबाड़ी तो बंद हो गये, होली जैसे त्यौहार के रंगों के साथ चेम्बर आफ कामर्स का चुनाव हुआ। अब बाकी गतिविधियों पर भी ग्रहण न लग जाए, यह आशंका सता रही है।

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में इस बीच रोड सेफ्टी क्रिकेट मैच, पुस्तक मेला और छत्तीसगढ़ी साहित्य महोत्सव संपन्न हुआ। इसके अलावा बहुत से मेले ठेले हुए।  राजधानी रायपुर में कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर की आशंका के बीच होने वाले ये सारे आयोजन कहीं न कहीं मनुष्य की आवाजाही से जुड़े हैं। क्रिकेट का जादू हमारे यहां सर चढ़कर बोलता है। यही वजह है कि 25 हजार दर्शक क्षमता की तय सीमा से कहीं अधिक दर्शक क्रिकेट का मैच देखने यहां-वहां से कैसे भी पहुंचे। पढऩे-लिखने की इच्छा और किताबों से मोह के कारण लोगों ने किताब मेले की ओर भी रुख किया लेकिन इन सबसे परे एक और आयोजन हुआ वह था छत्तीसगढ़ी साहित्य महोत्सव का। यह दो दिवसीय आयोजन बाकी आयोजनों से इसलिए भी भिन्न था क्योंकि यहां छत्तीसगढ़, छत्तीसगढ़ी और स्थानीय अस्मिता से जुड़ी बातें हो रही थीं, उन पर गंभीरता से विमर्श हो रहा था। इस समारोह का उद्घाटन शिक्षा मंत्री डॉ. प्रेमसाय सिंह टेकाम, विधायक सत्यनारायण शर्मा और रविवि के कुलपति डॉ. केसरीलाल वर्मा ने किया। इस अवसर पर छत्तीसगढ़ी में लिखी 50 से अधिक किताबों का विमोचन किया गया। समारोह में 11 हस्तियों को महानदी शिखर सम्मान, 15 को शिवनाथ स्वाभिमान सम्मान, 11 महिलाओं को कोशल्या सम्मान, 15 हस्तियों को महाप्रसाद सम्मान और 15 को हरेली युवा सम्मान से नवाजा गया।

समारोह के पहले दिन छत्तीसगढ़ी के बढ़त दुनिया पर विचार गोष्ठी हुई। दूसरे दिन छत्तीसगढ़ी गदय अउ पद्य म समकालीन समे के उपस्थिति पर चर्चा हुई। इस सत्र की अध्यक्षता नन्दकिशोर तिवारी ने की। शाम के सत्र में छत्तीसगढ़ी अउ हिंदी के आवाजाही विषय पर चर्चा हुई।

छत्तीसगढ़ राज्य में बोली जाने वाली एक अत्यन्त ही मधुर व सरस भाषा है। यह हिन्दी के अत्यन्त निकट है और इसकी लिपि देवनागरी है। छत्तीसगढ़ी का अपना समृद्घ साहित्य व व्याकरण है। राष्ट्रभाषा हिन्दी व उर्दूृ, पंजाबी, उडिय़ा, मराठी, गुजराती, बांग्ला, तेलुगू, सिन्धी आदि भाषा में और आदिवासी क्षेत्रों में हल्बी, भतरी, मुरिया, माडिय़ा, पहाड़ी कोरवा, उरांव आदि बोलियों के सहारे ही संपर्क होता है। स्कूली पाठ्यक्रम में इन बोली, भाषा में किताबें तैयार की गई है। श्री प्यारेलाल गुप्त अपनी पुस्तक प्राचीन छत्तीसगढ़ में लिखते हैं-छत्तीसगढ़ी भाषा अर्धमागधी की दुहिता एवं अवधि की सहोदरा है। डॉ. भोलेनाथ तिवारी अपनी पुस्तक हिन्दी भाषा में लिखते हैं-छत्तीसगढ़ी भाषा भाषियों की संख्या अवधी की अपेक्षा कहीं अधिक है और इस दृष्टि से यह बोली के स्तर के ऊपर उठकर भाषा का स्वरुप प्राप्त करती है।
छत्तीसगढ़ के रायपुर, दुर्ग, धमतरी, कांकेर, राजनांदगांव, कोरबा, बस्तर, बिलासपुर, जांजगीर-चांपा और रायगढ़ जिलों में इस बोली को बोलने वालों की संख्या बहुतायत है। भाषा के बारे में कहा जाता है कि कोस कोस में पानी बदले, तीन कोस म बानी। छत्तीसगढ़ के पूर्व में उत्तर से दक्षिण तक ओडिय़ा भाषा का विस्तार है। इसका प्रभाव छत्तीसगढ़ के रायगढ़, महासमुंद तथा बस्तर जिले के पूर्वी भाग में दिखाई देता है। छत्तीसगढ़ी का जो प्रचलित रुप है, उसे हल्बी कहते हैं। उत्तर में सरगुजिया बोली बोली जाती है जिस पर भोजपुरी का प्रभाव है।

जब हम छत्तीसगढ़ी भाषा को राजभाषा बनाने की बात करते हैं तो हमें यह भी देखना होगा कि हिन्दी के विरुद्घ छत्तीसगढ़ी को खड़ा किया जाना उचित नहीं है। छत्तीसगढ़ी जनपदीय भाषा है। उसे राजभाषा बनाने का अर्थ है, हिन्दी के विकल्प के रुप में उसे पेश करना होगा।  हिन्दी और छत्तीसगढ़ी के बीच वही संबंध है जो परिवार के मुखिया और उसके  सदस्यों के बीच होता है। अर्थात छत्तीसगढ़ी हिन्दी परिवार की बोली है। दोनों के बीच पारिवारिक स्नेह संबंध है। छत्तीसगढ़ी के मानकीकरण की बात हिन्दी के मानक रुप को ध्यान में रखते हुए की जाती है, अन्यथा जनपदीय भाषाएं स्वभावत: मानकीकरण के विरुद्घ जाती हैं और थोड़ी-थोड़ी दूर पर बदलने लगती है। हिन्दी के अब छत्तीसगढ़ी की आंचलिक और उपक्षेत्रीय विविधता खतरे में है। छत्तीसगढ़ी से हिन्दी रस ग्रहण करती है, उसमें स्थानीयता की रंगत और स्वाद पैदा करती है ृविनोदकुमार शुक्ल का गद्य इसका सबसे बेहतरीन उदाहरण है। हिन्दी की ताकत उसकी बोलियां हैं। बोलियां हिन्दी में संवेदना और सौंदर्य उत्पन्न करती है। छत्तीसगढ़ी साहित्य महोत्सव में हिन्दी और छत्तीसगढ़ी की आवाजाही विषय पर बात करते हुए यह बात भी सामने आई कि वस्तु, पात्र और भाषा का संदर्भ देकर विषय को खोलने और हिन्दी-छत्तीसगढ़ी अंतर्सम्बन्ध को समझने में मुश्किल होगी। नयी वस्तु के आने से बनने वाले नये संबंध और उसके संदर्भ हिन्दी और छत्तीसगढ़ी के लिए अलग-अलग नहीं हैं। वस्तुत: छत्तीसगढ़ी ने नये संबंधों को हिन्दी के जरिए और उसके साथ-साथ ग्रहण किया है। इस तरह हिन्दी की शब्दावली तो छत्तीसगढ़ी में आ रही है लेकिन छत्तीसगढ़ी के शब्द हिन्दी में नहीं जा रहे हैं, उल्टे छत्तीसगढ़ी अपनी सदियों से सहेजी पारंपरिक  शब्द संपदा खो रही है। अनेक शब्द प्रचलित और विलुप्त होने को है।

चूंकि इस तरह के आयोजन का यह पहला साल था तो निश्चित ही इसमें बहुत कुछ जोड़े जाने की, गंभीर विमर्श की गुंजाइश है। जिन लेखकों की किताबों का विमोचन हुआ, उन किताबों पर बातचीत भी होनी चाहिए। जिन लोगों को सम्मानित किया गया उनके कामकाज पर विस्तार से चर्चा होनी चाहिए। स्थानीय भाषा बोली को बढ़ावा देने देने के लिए जरुरी है कि उसमें नये लिखने वालों को, संस्कृतिकर्मियों को चिन्हित कर उनकी लेखन कार्यशाला लगाई जानी चाहिए। छत्तीसगढ़ी साहित्य के इतिहास की खोज पर ठोस काम हो। छत्तीसगढ़ी में आ रहे परिवर्तनों पर चर्चा हो। अन्य भाषाओं, बोली के साथ उसकी आवाजाही पर चर्चा होनी जरुरी है। अभी तक इस दिशा में जो ठोस काम या कार्ययोजना होनी चाहिए थी, वह नहीं बनी है, कुछ आयोजनों, मेलों में छत्तीसगढ़ी संस्कृति, भाषा का गौरवगान, करने से यह स्थिति नहीं सुधरने वाली है। आने वाले दिनों में सरकार यदि साहित्य परिषद जैसी संस्था बनाती है, भारत भवन की तर्ज पर छत्तीसगढ़ भवन बनाकर यहां की कला संस्कृति साहित्य को प्रमोट करती है तो निश्चित ही इस तरह के आयोजनों में हुआ विमर्श सार्थक सिद्घ होगा।