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काछन और रैला देवी से मिली बस्तर दशहरा मनाने की अनुमति

 काछन और रैला देवी से मिली बस्तर दशहरा मनाने की अनुमति

जगदलपुर। बस्तर दशहरा के महत्वपूर्ण काछनगादी पूजा विधान में नवरात्र के एक दिन पूर्व रात्रि 08 बजे काछनगुड़ी में संपन्न की गई। बेल के कांटों से बने झूले की 3 बार परिक्रमा कर कांटों की झूले में विराजमान होकर काछन देवी अनुराधा ने बस्तर दशहरा मनाने की अनुमति और आशीर्वाद दिया। बड़ेमारेंगा की अनुराधा स्कूल से छुट्टी लेकर छटवी बार विधान में शामिल हुई । रस्म के पहले बालिका को 07 दिन पहले से व्रत रखकर रोज शाम को पूजा में शामिल होना होता है। इसके बाद स्थानीय गोलबाजार में रैलादेवी से आशीर्वाद लेने पहुंचे जहां रैला देवी चांदनी ने भी निर्विघ्न दशहरा हेतु आर्शीवाद दिया। इसके साथ ही दंतेवाड़ा की मावली माता और अंचल के अन्य देवी-देवताओं को निमंत्रण पत्र भेजा गया। 

    बस्तर दशहरा पर्व की काछन पूजा रस्म अश्विन अमावस्या को पुलिस लाइन स्थित काछनगुड़ी में संपन्न की जाती हैं। रियासत कालीन परम्परा के अनुसार आतिशबाजी और बाजे-गाजे के साथ राजमहल से जुलुस निकाल कर काछनगुड़ी तक पहुंचा। जुलूस के सामने आंगादेव की सवारी चल रही थी। जुलूस में बस्तर सांसद, विधायक, सहित राज परिवार के सदस्य कमलचंद्र भंजदेव, पुजारी व राजगुरू के साथ मांझी, चालकी, मेंबर, मेंबरीन एवं बड़ी संख्या में श्रृद्धालू शामिल हुए। 

     बस्तर दशहरा स्थानिय जनजातीय समभाव का प्रमुख पर्व है, इसमें स्थानिय सभी जनजातीय के लोगों को जोड़कर इनकी सहभागिता निश्चित की गई थी, इसीलिए यह जन-जन का पर्व कहलाता रहा है। साथ ही काछन और रैला देवी से आशीर्वाद लेने की परम्परा नारी सम्मान का बेहतरीन उदाहरण देखने को मिलता है।