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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-कलेक्टर: जिले का माई-बाप या इवेंट अर्गनाईजर

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-कलेक्टर: जिले का माई-बाप या इवेंट अर्गनाईजर

कानून का राज कहने से आशय उस कानून के राज से कतई नहीं है जो अंग्रेजी राज की तरह भय से डंडे की जोर जबर्दस्ती से स्थापित किया जाता रहा है। जनता का भरोसा जीतकर, जनता को यह महसूस कराना कि सरकार हमारे दुख-दर्द की साथी है। ऐसा राज, ऐसी व्यवस्था जिसमें सिटीजन चार्टर दिखाने के लिए नहीं बल्कि समय पर लोकसेवा की गारंटी देने वाला हो। दरअसल, पूरे देश में अंग्रेजों की बनाई शासन प्रणाली जिसमें डिप्टी कमिश्नर यानी इस समय के कलेक्टर शासन के प्रतिनिधि के रूप में काम करते हैं। अंग्रेजों के समय के साहब बहादुर जिले के माई-बाप जिले के मालिक कहलाते थे। अब कानून व्यवस्था, राजस्व संबंधी मामलों में कम रूचि लेकर जिले भर में होने वाले अलग-अलग तरह के आयोजनों, अभियानों में इवेंट मैनेजर बने नजर आते हैं। वे अपनी छबि एक सोशलाइट की बनाए रखना चाहते हैं। बहुत सारे लोग काम में कम प्रचार-प्रसार में ज्यादा विश्वास करते हैं। यही वजह है कि इन्हें जमीनी सच्चाई का पता नहीं होता। वे कुछ खास लोगों से ही हमेशा घिरे देखे जाते हैं। शासन-प्रशासन का अर्थ इनमें से बहुतों के लिए कुछ लोगों को खुश रखना तक सीमित होकर रह गया है। जिला दंडाधिकारी के रूप में कलेक्टर के पास बहुत से अधिकार होते हैं। आम जनता उन्हें जिले का माई बाप, मालिक समझती है लेकिन बदली हुई प्रशासनिक व्यवस्था में जिले में आने वाला हर महत्वपूर्ण व्यक्ति सर्किट हाउस से लेकर अपने कार्यक्रमों, बैठकों, दौरों में कलेक्टर की उपस्थिति चाहता है। जनप्रतिनिधियों की भाषा बहुत बार कलेक्टरों और अफसरों के साथ अमर्यादित रहती है। चाहे वह छत्तीसगढ़ के पूर्व मंत्री जो कलेक्टर से बातचीत में पोंगली बनाने की बात कहते हों या फिर मध्यप्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती जो कहती हैं कि ब्यूरोक्रेसी कुछ नहीं होती, चप्पल उठवाती हंै। पहले ही बात हो जाती है फिर ब्यूरोक्रेसी फाईल बनाती है। दरअसल जो चीज नियम प्रक्रिया से समय पर हो जानी चाहिए यदि उसके लिए भी लोग दफ्तरों के चक्कर लगवाएं, लोगों को सिफारिश करवानी पड़े तो इस तरह के कमेंट्स तो आएंगे ही। अपनी पोस्टिंग, लूप लाईन में जाने और तबादले के भय के चलते कलेक्टर नामक संस्था सहित बहुत से पदों का अवमूल्यन हुआ है। लोगों के मन में प्रशासन को लेकर जो खौफ का वातावरण निर्मित  होना चाहिए उसका निर्माण करने में प्रशासनिक मशीनरी फेल है। हाल ही में कवर्धा और पत्थलगांव में घटी दो अलग-अलग घटनाएं इसका ताजा उदाहरण है। सभी कलेक्टर्स को कानून व्यवस्था सुस्थापित करने हेतु पत्थलगांव जैसी घटनाओं से सीख लेनी होगी। नशे के सौदागरों का मनोबल बढऩे से ऐसी घटनाएं और दुर्घटना घटित होती हंै। गली-मोहल्लों, हाईवे में शराब की बिक्री, गांजा और अन्य नशे के खिलाडिय़ों पर पुलिस का खौफ़ हो, खुफिया तंत्र से समय पर सम्यक सूचनाएं मिलनी चाहिए और उन पर क्रियान्वयन भी हो ऐसी मंशा सरकार के मुखिया की है। 

छत्तीसगढ़ शांति का टापू है उस पर अशांत हरकतों पर नजर और नियंत्रण हेतु अधिकारियों की सजगता जरूरी है। गली-मोहल्ले में शांति और सद्भाव हो इसलिए कार्यपालिक दंडाधिकारी और पुलिस मिलकर दौरे करें और समस्या को समय पर समझ  कर प्रभावी और ठोस निराकरण भी करें। राज्य में चाहे सड़क दुर्घटनाओं की बढ़ती संख्या हो या चाकूबाजी की बढ़ती वारदात, हर जगह इन समस्याओं का नियंत्रण कैसे किया जाए इस पर पुलिस और जिला प्रशासन दोनों का समन्वित प्रयास जरूरी है। जब मुख्यमंत्री की कलेक्टर कान्फ्रेंस में रोका-छेका को एक जनअभियान के रुप में स्थापित करने की बात होती है और इसे केवल धान कटाई तक सीमित नहीं करने की बात होती है तो लोगों को जगह-जगह सड़क चौराहों पर बैठी गायों का झुंड मुंह चिढ़ाते हुए कहता है कि ये लो ये रहा तुम्हारा रोका-छेका। मुख्यमंत्री चाहते हैं कि राजस्व प्रकरणों के लंबित रहने के कारणों पर ठोस कार्यवाही होनी चाहिए। इसके लिए जरुरी है कि विशेषकर पीठासीन अधिकारी अपनी सीट पर बैठें और राजस्व के लंबित पुराने प्रकरणों पर सुनवाई पूर्ण करें। जिलों में जगह-जगह ई-कोर्ट बना तो दिए गए हैं लेकिन निराकरण कितना हो पा रहा है उस पर जिला कलेक्टर की नियमित निगरानी जरूरी है। ब्लाक, तहसील और जिला स्तर पर जिन समस्याओं का निराकरण हो जाना चाहिए यदि वे समस्याएं और आवेदन मुख्यमंत्री कार्यालय में स्थापित जननिवारण सेल में आते हैं तो इसकी समीक्षा कर संबंधित अधिकारियों पर कार्यवाही होनी चाहिए कि यह प्रकरण जहां निराकृत होने चाहिए थे वहां से निराकृत क्यों नहीं हुए?

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल कोरोना संक्रमण के बाद सीधे तौर से कलेक्टर कांफ्रेंस के जरिए कलेक्टरों से रूबरू हुए। इस कलेक्टर कांफ्रेंस के एजेंडा नंबर वन पर हमेशा की तरह लोक सेवा गारंटी है। सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता में से एक लोक सेवा गारंटी की चिन्हित सेवाएं जिनकी संख्या 260 से ज्यादा हैं, वे सेवाएं  निर्धारित समय पर आवेदक को मिल सके और नहीं की स्थिति में जिम्मेदारी तय कर दंड व्यवस्था सुनिश्चित करना जरूरी है। परंतु ऐसा नहीं हो पा रहा है। समय पर अपना कार्य नहीं करने वाले अधिकारियों को दंडित किया गया हो, ऐसा कोई प्रकरण सामने नहीं आया। बाकी प्रदेशों में दंडित व्यक्ति की सूचना का प्रसारण किसी न किसी एजेंसी के माध्यम से लगातार किया जाता है ताकि बाकी लोगों में कानून का भय बना रहे। छत्तीसगढ़ में अभी तक वैसी स्थिति नहीं बन पाई है। 

शांति का टापू कहे जाने वाले छत्तीसगढ़ में सांप्रदायिक दंगों की स्थिति निर्मित होना और दुर्गा विसर्जन के जुलूस पर नशे से भरी गाड़ी और नशे की हालत में लोगों को कुचलने की घटना छत्तीसगढ़ की प्रशासनिक कसावट और व्यवस्था के फेलवर को दर्शाता है। सोशल मीडिया के जरिए समाज में इस तरह की अफवाह फैलाकर माहौल बिगाड़ा जा रहा है। इसके बारे में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कलेक्टर्स कांफ्रेंस में कवर्धा यानी कबीरधाम की घटना का जिक्र किये हुए कहा कि संचार क्रांति के दौर में एक स्थान की घटना का असर पूरे प्रदेश और देश में होता है, इसलिए जिम्मेदारी बहुत अधिक है। हाल ही में कवर्धा के बहाने पूरे प्रदेश में हिन्दू मुस्लिम तुष्टिकरण की कोशिश की गई है। भूपेश बघेल ने बहुत ही जरुरी मुद्दे की ओर कलेक्टर्स का ध्यान दिलाया। उन्होंने बताया कि सोशल मीडिया पर उचित पर्यवेक्षण जरूरी है। सूचना ही शक्ति है, जिला प्रशासन का सूचना तंत्र सुदृढ़ किया जाना जरूरी है। गलत तथ्यों का खंडन करने और अफवाह न फैलने देने के लिए प्रशासन को सजग और सतर्क होना चाहिए। ऐसे समय जब देश में लोग अपनी आलोचना सुनना पसंद नहीं करते और प्रतिरोध के स्वर को दबाना चाहते हैं तब मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का ये कहना कि विरोध प्रदर्शन से मुझे परहेज नहीं है लेकिन योजनाबद्ध रूप से माहौल बिगाडऩे की साजिश को सफल नहीं होने दिया जाना चाहिए। 

भूपेश बघेल की छत्तीसगढ़ को लेकर यह चिंता स्वाभाविक है। जब कबीर के नाम से पहचाने जाने वाले कबीरधाम यानि कवर्धा में सांप्रदायिक सद्भाव बिगाड़ा जा सकता है तो फिर पूरे छत्तीसगढ़ में इसे कैसे रोक पाएंगे? सांप्रदायिक सद्भाव छत्तीसगढ़ी संस्कृति की पहचान है, किसी भी व्यक्ति या संस्था को इसे बिगाडऩे नहीं दिया जा सकता। चाहे वह कोई भी क्यों न हो। यदि हम सब मिलकर बार-बार यह कहते हैं कि छत्तीसढिय़ा सबले बढिय़ा तो हम सब लोगों की यह जिम्मेदारी है कि छत्तीसगढ़ को शांति का टापू बने रहने दें।