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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-सिनेमाई दर्शकों का बदलता मिजाज

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-सिनेमाई दर्शकों का बदलता मिजाज


अपने सौ साल की यात्रा में सिनेमा जितना नहीं बदला उतने वह इस एक दशक में बदला है। ओटीटी प्लेटफार्म आने के बाद सिनेमा के दर्शक को बोल्ड कंटेंड के साथ वे सब देखने मिल रहा है जो खुले विश्व के दर्शक को। पश्चिमी देश का खुला सिनेमा हो या ईरान का सिनेमा आज भारतीय दर्शक के लिए बहुत सारे ओटीटी प्लेटफार्म पर सब उपलब्ध है। हिन्दी सिनेमा ने इधर के सालों में बहुत तरह की रूढिय़ों को तोड़कर दर्शको को वह कंटेंट, कहानी उपलब्ध कराई है जो नई है, जो विश्वसनीय है। इधर के सालो में सत्य घटनाओं तथा महत्वपूर्ण व्यक्तियों के जीवन संघर्ष या कहे बायोग्राफी पर आधारित फिल्मे बनाने का चलन बढ़ा है और उन्हें दर्शको को बेहतर रिसपांस भी मिला है। तकनीक से लेकर विषय वस्तु भाषा और लोकेशन के स्तर पर भी बहुत कुछ नया है।
सिनेमा के नये संस्करण यानी वेब सीरीज पर कंटेंट और भाषा को लेकर बहुत बड़ा बदलाव आया है। ऐसे विषय जो पहले फिल्मों में लेने के लिए फिल्मकार हिचकते थे और ऐसा मानना था कि यह विषय व्यवसायिक फिल्मों के हित में नहीं है। ट्रांसजेंडर, जेंडर परिवर्तन और लिव इन रिलेशनशिप को वैध ठहराते हुए ओटीटी पर बहुत साहसी फिल्में और सीरीज बनने लगी हैं। इनका विषय और भाषा बेहद बोल्ड और आक्रामक है। आज से कुछ बरस पहले खासकर कोरोना से पहले किसी ने ऐसा सोचा भी नहीं होगा कि ऐसे वेब सीरीज के आने से थिएटर में लगने वाली फिल्मों के व्यवसाय पर गहरा प्रभाव पड़ेगा। आदित्य चोपड़ा, संजय लीला भंसाली और सुभाष घई जैसे लोग इस प्लेटफार्म पर पूरी तैयारी से आने वाले हैं। पहले यही और दूसरे बड़े निर्माता इस प्लेटफार्म से परहेज पालते थे लेकिन कोरोना काल में थिएटर बंद रहे और ओटीटी पर फिल्मों और वेब सीरीज ने नए आधुनिक और साहसी विषय और भाषा के साथ कदम रखा जिसे दर्शकों ने बेहद पसंद भी किया। भारतीय दर्शकों के बदलते टेस्ट को देखते हुए अब बहुत सारी विदेशी फिल्में वेब सीरिज का हिन्दी और क्षेत्रीय भाषाओं में सब टाइटिल संवाद के साथ दिखाया जा रहा है। मिर्जापुर, फैमिली मैन, आर्या, शिद्दत, बेकाबू आउट आफ लव, पाताल लोक, स्कैम 1992, इनसाइड एज, गंदी बात, तांडव आश्रम जैसी वेब सीरिज भी आई जिसके चलते बड़े विवाद भी हुए। एक्टर सैफ अली खान, डिंपल कपाडिय़ा, सुनील ग्रोवर, तिग्मांशु धूलिया जैसे दिग्गज कलाकारों की चर्चित वेब सीरीज तांडव रिलीज होते ही विवादों में घिर गई। मामला ने इतना तूल पकड़ा कि सरकार को भी दखल देना पड़ा। यह सीरीज स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म अमेजन प्राइम वीडियो पर रिलीज हुई। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने तमाम शिकायतों पर संज्ञान लेते हुए ऐमजॉन प्राइम से इस पर जवाब मांगा। वेब सीरीज तांडव को लेकर यह आरोप लगा कि इसमें हिंदू देवी-देवताओं का उपहास किया गया है। तांडव वेब सीरीज को लेकर हजरतगंज कोतवाली में सब इंस्पेक्टर ने 4 लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई है।
इसके अलावा नेटफ्लिक्स द्वारा दिखाई गई बैड बॉय बिलियनेयर्स के एपिसोड पर हैदराबाद में एक सिविल कोर्ट ने ओटीटी प्लेटफॉर्म को सत्यम कंप्यूटर घोटाले में दोषी ठहराए गए रामलिंगा राजू द्वारा दायर याचिका पर श्रृंखला को प्रसारित करने से रोकने के लिए अंतरिम रोक जारी की। इसके एपिसोड नीरव मोदी और सहारा बॉस सुब्रत रॉय पर केंद्रित थे। इसके पूर्व बजरंग दल ने ओटीटी प्लेटफार्म पर दिखाई गई आश्रम सीरिज तीसरे सीजन में एक समूह ने फिल्म निर्माता प्रकाश झा के सेट पर हंगामा किया।
सिर्फ ऐसा नहीं है कि अश्लील सी लगने वाली बीहड़ भाषा ही इन सीरीज के आकर्षण हैं, बल्कि विषय को लेकर इतने प्रयोग किए गए हैं कि उस से प्रेरित होकर अब फिल्में भी बनने लगी हैं, पति- पत्नी और वह, अंधाधुन, बधाई हो, चंडीगढ़ करे आशिकी, लुका छिपी और शुभ मंगल सावधान जैसी फि़ल्में जिनमें विवाह और सेक्स को लेकर पूर्वाग्रह और वर्जनाएँ टूट रही हैं। पुराना पवित्रता बोध खत्म हो रहा है। साहसी विषय और यथार्थ परक संवाद एक नया इतिहास रच रहे हैं। हिंदी फिल्मों के इतिहास में इतनी शीघ्र इतना बड़ा बदलाव पहले कभी नहीं आया था इसे कोरोना काल का बदलाव भी कहा जा सकता है।
नयेपन की तलाश में सिनेमा बनाने वाले अब विदेशों के साथ-साथ देश के भीतर उन जगहों शहरों, राज्यों की ओर रूख कर रहे हैं जो अब तक अनछूए थे। सिनेमा के जादू और महत्व को समझकर राज्यों की सरकारे भी चाहती हैं कि उनके राज्यों में ज्यादा से ज्यादा फिल्मे, वेब सीरिज बने। सरकारे इस कार्य के लिए बहुत सारी सुविधाओं के साथ अनुदान आदि भी दे रही है। अभी हाल ही में छत्तीसगढ़ सरकार ने अपनी फिल्म नीति घोषित करते हुए छत्तीसगढ़ में फिल्म बनाने वालों के लिए बहुत सारी घोषणाएं की।
 छत्तीसगढ़ की फिल्म नीति के तहत फिल्म निर्माण करने के लिए जरूरी सभी मंजूरी सिंगल विंडो सिस्टम के जरिए दी जाएगी। इतना ही नहीं सभी तरह की मंजूरियों के लिए लोक सेवा अधिनियम 2011 के तहत लाते हुए 30 दिन की समय सीमा भी तय की गई है। आधुनिक फिल्म सिटी बनाने के लिए नया रायपुर में 115 एकड़ भूमि चिन्हित की गई है। फिल्म नीति के तहत अगर किसी फिल्म की 50 प्रतिशत शूटिंग छत्तीसगढ़ में होती है तो छत्तीसगढ़ सरकार की ओर से फिल्म निर्माता को एक करोड़ रुपए तक का अनुदान दिया जा सकता है। यही अनुदान फिल्म प्रोडक्शन कंपनी पर लागू होता है, अगर वह 20फीसदी छत्तीसगढिय़ा कलाकारों को या छत्तीसगढ़ के मूल निवासियों को बतौर सहायक कलाकार या टेक्निकल टीम में शामिल करते हैं। जाहिर है इसका मकसद स्थानीय तौर पर कलाकारों और छत्तीसगढ़ के निवासियों को बेहतर मौके उपलब्ध कराना है। फिल्म निर्माता अगर अपनी दूसरी फिल्मी छत्तीसगढ़ में शूट करते हैं तो 50फीसदी शूटिंग का हिस्सा छत्तीसगढ़ में फिल्माने पर राज्य सरकार की ओर से 1.25 करोड़ का अनुदान दिया जाएगा और यही अनुदान बढ़कर दो करोड़ हो जाएगा अगर 75 फ़ीसदी हिस्सा छत्तीसगढ़ में फिल्माया जाए और 20 फीसदी स्थानीय या मूल निवासियों को मौका दिया जाए। इसी तरह फिल्म प्रोडक्शन कंपनी के लिए तीसरी और उसे आगे की फिल्में बनाने के लिए भी छत्तीसगढ़ सरकार की ओर से अनुदान की घोषणा की गई है। इसके पहले उत्तरप्रदेश सरकार ने भी इस तरह की सुविधाएं फिल्मकारों को दी जिसकी वजह से उत्तरप्रदेश की पृष्ठभूमि पर बहुत सी फिल्में बनी।  
 कोरोना संक्रमण के दौरान हुई तालाबंदी से सबसे ज्यादा सेक्टर प्रभावित हुई जिनमें लोगों की उपस्थिति सर्वाधिक रहती है। सिनेमा का समूचा कारोबार दर्शको के भरोसे चलाता है। यही वजह है कि लॉकडाउन के चलते सबके पहले सिनेमा हालो में ताले लगे और लॉकडाउन हटने के बाद सबसे आखिरी में उनके ताले खुले। पहले पीवीआर, आईनाक्स, फन सिनेमा, ग्लिट्ज सिनेमा,  बिग सिनेमा जैसे स्क्रीन आने से एकल सिनेमा हालो का बंद होना शुरू हुआ फिर ओटीटी प्लेटफार्म आने और कोरोना संक्रमण फैलने से सभी तरह के सिनेमा घरो में ताले बंदी हुई। कोरोना की तीसरी लहर और ओमीक्रोन के बढ़ते प्रकण को देखते हुए देश की राजधानी दिल्ली में एक बार फिर से सिनेमाघरो में तालाबंदी कर दी गई है। पिछले दो साल के दौरान साधन सम्पन्न लोगों ने हो थियेटर में, मध्यम वर्गीय दौर निम्न, मध्यम वर्गीय लोगों ने स्मार्ट फोन, मोबाइल, लैपटाप टैबलेट जैसे इलेक्ट्रानिक गजट पर सिनेमा देखने की आदत डाल ली है। बहुत से फिल्ममेकर ने अपनी फिल्मो को ओटीटी प्लेटफार्म पर रिलीज किया। धीरे-धीरे सिनेमाई दर्शकों का फिल्मों को लेकर मिजाज बदल रहा है। बंद घरों के भीतर भी खुली फिल्में देखने का चलन बढ़ा है। अब लोग गाली-गलौच, चुम्बन, सेक्स संबंधी दृश्यों से चौंकते नहीं है। बावजूद इसके संस्कृति, संस्कार और बहुत सारी वर्जनाएं लिहाज, शर्म, हया भी तो बची हुई है। यही वजह है कि सब अपने-अपने गोपन में अपने नेटवर्क के जरिए अंधेरे में सिर नीचा किया वो सब देख रहे हैं जिसकी वे सार्वजनिक रुप से आलोचना करते हैं।
प्रसंगवश ंिमत्र सूरज राय सूरज का यह शेर-

एक ही मौसम है इस घर के अंदर का
सबकी अपनी बारिश अपने छाते हैं।।
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