breaking news New

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - समाज में व्याप्त पाखंड

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - समाज में व्याप्त पाखंड

-सुभाष मिश्र

हमारे धार्मिक रीति-रिवाजों, पूजा-पद्धति में बहुत सी चीजों को पूजने की परंपरा प्रचलित है। हमने देवी पर्व में अष्टमी-नवमीं के दिन देवियों की पूजा के बहाने कुंवारी लड़कियों को बुलाकर उनकी पूजा-अर्चना की, उन्हें भोजन कराया, कुछ उपहार भी दिये। हमारा देश कृषि प्रधान है इसलिए हम कभी बैलों की, कभी गाय की, कभी अपने कृषि उपकरणों की, प्रकृति की, सांप की, नदी, तालाब, पहाड़ पर्वत, पेड़-पौधे आदि की पूजा करते हैं। शनिवार को बहुत से लोग शनि महाराज के बहाने तेल चढ़ाते हैं। मांगने आये व्यक्ति को श्रद्धा और क्षमता अनुसार दान-दक्षिणा देते हैं। हमें शनि डराता भी है। हमारे लिए जो भी लाभप्रद या भयकारी या अज्ञात अगोचर रहा है, वह हमारे पूजे जाने में शामिल है। हमने चांद, तारे, सूरज सभी को अपना आराध्य माना और उनकी पूजा-अर्चना की। हमारे ग्रह नक्षत्र, हमारी कुंडलियां तीज-त्यौहार भी हमारे ब्रम्हाण के चांद, तारों, नक्षत्रों की दशा और दिशा से तय होते हैं। हम मकान भी पूर्व मुखी चाहते हैं। बहुत सारे बिल्डर ऐसे मकानों का ज्यादा पैसा लेते हैं। ईद चांद दिखने के बाद ही मनाई जाती है। सूरज के डूबने और उगने से हमारी भोजन पद्धति उपवास, रोजा खोलने की शुरूआत होती है। कुल मिलाकर हमारे इर्द-गिर्द जो कुछ उपस्थित है हम उसे अपनी-अपनी पूजा पद्धति रीति-रिवाज के अनुसार पूजते हैं, मानते हैं।

निदा फाजली का दोहा है-
सब की पूजा एक सी, अलग-अलग हर रीत
मस्जिद जाये मौलवी, कोयल गाये गीत।

सांप को पूजने वाले हम सांप को देखते ही मारने दौड़ते हैं। पेड़-पौधों वनस्पति को पूजने वाले हम विकास के नाम पर तेजी से उन्हें नष्ट करने में लगे हैं। देवी पूजा में हमने जिन गरीब बच्चियों को अपनी कैंपस कालोनी, मल्टी स्टोरी बिल्डिंग परिसर या अपने घर में बुलाकर देवी पूजा के नाम पर 365 दिन में से एक दिन भोजन कराया, उनके पैर पूजे, उन्हें हम 364 दिन अपने बराबरी का नहीं समझते। उन्हें अपने आसपास बिना अपने स्वार्थ के भटकने तक नहीं देते। चूंकि, हमारे इर्द-गिर्द जो संपन्न परिवार रहते हंै या तो वे एकल हैं या उनके बेटे-बेटी बाहर पढ़ते हैं या अपने डाईट चार्ट के कारण त्यौहार में भी किसी पड़ोसी के यहां खाने नहीं जाते, ऐसे में हमें पितृपक्ष या श्राद्ध के समय संस्कृत विद्यालयों या अनाथालयों से बच्चे/पंडित बुलाकर भोजन कराना पड़ता है। उसी तरह हमें देवी पूजा में कन्या भोज कराना पड़ रहा है। बहुत सारे लोग त्यौहार या दिन विरोध पर प्रसादी या लंगर के नाम पर गरीबों और राहगीरों को भोजन कराते हैं। एक दृष्टि से देखा जाए तो यह अच्छी बात है, नेक काम है। इसी बहाने कुछ लोगों को साल में एक दो बार हल्वा-पूड़ी खाने मिल जाता है। खाने वाला खुश, खिलाने वाला भी खुश। एक को स्वादिष्ट भोजन मिल जाता है दूसरे के खाते में कुछ पुण्य जुड़ जाते हैं। वह क्षमा पर्व की तरह साल में अपने बाकी दिनों की गलती का पश्चाताप कर लेता है। अभी थोड़े दिन पहले पितृ पक्ष बीता। अपनी परंपरा में बहुत से लोग पितरों को तर्पण के नाम पर कौवे को खाना खिलाते हैं। आजकल कौवे भी दिखाई नहीं देते। अब कुछ लोगों ने कौवे पाल लिए हैं, वे किसी इवेंट एजेंसी की तरह आपके पूजने खिलाने के लिए सांप, कौवे सभी लेकर पहुंच जाते हैं।

अज्ञेय की एक कविता है-
हम लोगों से सच बोलने का आग्रह करते हैं।
किन्तु हम सच सुनना नहीं चाहते।
कबीरदास कहते हैं कि सांची कहूं तो मारन घावै, झूठे जग पतियाना। देखो जग बौराना।।
सांप तुम सभ्य तो हुए नहीं
शहर में बसना तुम्हें आया नहीं
एक प्रश्न पूछूं, उत्तर दोगे कहां से सीखा उसना
ये विष कहां से पाया?

एक कहावत है जब आये चेव, तब पूजो देव। कुछ लोग अपनी सुविधा और जरुरत के अनुसार देव पूजा करते हैं। कुछ लोगों के देव बदलते रहते हैं। वे अपने लाभ के लिए समय-समय पर अपनी भक्ति का प्रदर्शन अलग-अलग तरीके से करते हैं। लोगों का मानना है कि भक्ति से शक्ति मिलती है। वैसे भी यह समय एक  नई तरह की भक्ति का है। कई बार लगता है कि भक्त का मूर्ख होना जरुरी है। बहुत से बाबाओं, कथित साधु-संतों, धार्मिक गुरुओं के तमाम कारनामे, उल-जुलूल हरकतों के बावजूद उनके भक्तगण अंधभक्ति में लीन रहते हैं। भक्तगणों को सावन के अंधों की तरह हरा ही हरा सूझता है। भक्ति रस में डूबा आदमी अपनी बुद्घि, विवेक, तार्किक शक्ति खो देता है। कुछ लोगों का कहना है कि श्रद्घा भक्ति में किसी प्रकार के तर्क की गुंजाइश नहीं होती। आजकल सोशल मीडिया के जरिये भी एक नये तरह की राष्ट्र भक्ति का राग अलापा जा रहा है।

हम अपनी नदियों को मां के समान जीवनदायिनी समझकर पूजते हैं। बहुत सी नदियों में नहाकर हम अपने कथित पापों से मुक्ति पा लेते हैं किंतु उन्ही नदियों को प्रदूषित करने में, उनमें गंदगी डालने में कोई शर्म, झिझक महसूस नहीं करते। विदेशों में नदियां साफ-सुथरी रहती है क्योंकि वे उनकी पूजा नहीं केयर करते हैं। हमारी सबसे पवित्र समझे जाने वाली गंगा नदी को साफ-सुथरा रखने के लिए केन्द्र सरकार ने पृथक से नमामि गंगे जैसा एक मंत्रालय तक बनाया। देश में नदियों की सफाई का कार्यक्रम 1985 में गंगा एक्शन प्लान के साथ शुरू हुआ था। 275 नदियों के 302 प्रवाह प्रदूषित हैं जबकि साल 2018 की रिपोर्ट में 323 नदियों के 351 प्रवाह के प्रदूषित होने का जिक्र है। पिछले तीन सालों में देखा गया है कि खतरनाक रूप से प्रदूषित 45 प्रवाह ऐसे हैं, जहां के पानी की गुणवत्ता बेहद खराब है। गंगा की सफाई पर मार्च 2017 तक 7,304.64 करोड़ रुपए खर्च किए जा रहे हैं। यह खर्च निरंतर जारी है, किन्तु लोगों के दोहरे आचरण और लापरवाही के कारण गंगा प्रदूषित ही है।

शादी-ब्याह और मांगलिक अवसरों पर हम मेहमाननवाजी के नाम पर बहुत सा खाना बर्बाद करते हैं, किंतु हमें कभी आसपास के स्कूलों में चल रहे मध्यान्ह भोजन में थोड़ी मदद करके स्वादिष्ट और ज्यादा पोषक बनाने का, भूखों को खिलाने का ख्याल नहीं आता। हम गुरुद्वारों में चलने वाली लंगर प्रथा से भी कुछ नहीं सीखते। वहां बारहमासी बिना भेदभाव के लोगों को खिलाया जाता है।

निदा फाजली का एक दोहा है-
अंदर मूरत पर चढ़े घी, पूरी मिष्ठान्न
मंदिर के बाहर खड़ा, ईश्वर मांगे दान।

हम जिस पाखंडी समय, हिप्पोक्रेट समाज में जी रहे हैं वह बहुत दिखावा पसंद है। अपनी अवैज्ञानिकता और अज्ञानता के कारण जब तक पता नहीं है तब तक बहुत सारी चीजों की शुचिता और सात्विकता बनी हुई है, धर्म संकट की स्थिति निर्मित नहीं हुई है। कहावत है कि मुर्गा अपनी जान से जाये, खाने वाले को मजा नहीं आया। हमारे बहुत सारे नानवेज खाने वाले मित्र होटलों में हलाल और झटके का पूछने में कतई परहेज नहीं करते। मानो हलाल का खाकर वो कई बड़ा पुण्य कृत्य कर रहे हों।

हम देवी पूजा और अवसरों पर जिन लड़कियों, बच्चियों की पूजा करते हैं, उन्हें देवी का रुप मानते हैं, उन्ही बच्चियों में से बहुत सारी बच्चियों के साथ रेप और हत्या जैसे अपराध होते हैं। हमारे यहां कहा जाता है कि तत्र रमते देवता, तत्र पूज्यते नारी पर हमारे समाज के समूचे जीवन व्यवहार आचरण इससे ठीक उलट दिखलाई देता है। नेशनल क्राईम ब्रांच के आंकड़ों के अनुसार भारत में प्रतिदिन औसतन 80 मर्डर और 77 रेप के मामले दर्ज हुए। वहीं, पूरे देश में 2020 में बलात्कार के प्रतिदिन औसतन करीब 77 मामले दर्ज किए गए। पिछले साल दुष्कर्म के कुल 28,046 मामले दर्ज किए गए। देश में ऐसे सबसे अधिक मामले राजस्थान में और दूसरे नंबर पर उत्तर प्रदेश में दर्ज किए गए। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की ओर से जारी किए गए ताजा आंकड़ों के अनुसार, भारत में 2019 में हर दिन बलात्कार के 88 मामले दर्ज किए गए। साल 2019 में देश में बलात्कार के कुल 32,033 मामले दर्ज किए गए, जिनमें से 11 फीसदी पीडि़त दलित समुदाय से हैं। 2020-21 में लगा था लॉकडाउन फिर भी रोजाना 80 मर्डर और 77 रेप के मामले, राजस्थान और यूपी में सबसे अधिक मामले हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के नवीनतम आंकड़ों के मुताबिक 2018 में देश में हर चौथी दुष्कर्म पीडि़ता नाबालिग थीं, जबकि 50 फीसदी से ज्यादा पीडि़ताओं की उम्र 18 से 30 साल के बीच थी।
गायों को पूजने वाले हम अपनी गायों को यदि वे दुधारु नहीं हैं तो सड़कों पर आवारा छोड़ देते हैं। सड़कों पर चौराहों पर बैठी गायें, रात के अंधेरे में कुचलती गायें सरकार की रोका-छेका योजना को मुंह चिढ़ाती हैं और समाज के उस नजरिये को भी बताती है कि इनकी कथनी और करनी में कितना फर्क है।