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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से -एक बार फिर वही मंजर

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से -एक बार फिर वही मंजर

- सुभाष मिश्र
कोरोना संक्रमण के चलते जब पिछले साल लॉकडाउन हुआ तो सड़को पर, बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन पर हजारों प्रवासी मजदूरों की भीड़ दिखलाई दी। आज फिर मुंबई, दिल्ली के स्टेशन, बस स्टैंड पर वही मंजर दिखाई दे रहा है। लोकमान्य तिलक टर्मिनल पर घर वापसी के लिए जमा भीड़ पानी के लिए मारामारी कर रही हैं। तीन दिनों से स्टेशन पर है पर अभी तक रेल यात्रा  का टिकिट नहीं मिला। इस बीच 14 अप्रैल से महाराष्ट्र में पूर्ण लाकडाउन की बात हो रही है। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भी चेताया है कि यदि कोरोना संक्रमण नहीं रूका तो दिल्ली में भी पूर्ण लाकडाउन होगा। प्रवासी मजदूरों के सामने एक बार फिर काम धंधा बंद हो जाने से खाने-पीने के संकट खड़ा हो गया है। पिछले साल अपने अपने घरों को वापस नहीं लौटने की कसम खा कर गये मजदूरों को जब गांव में रोजगार नहीं मिला और स्थिति थोड़ी सुधरी तो वे वापस महानगर की ओर लौट पड़े। उन्हें क्या मालूम था कि कोरोना की दूसरी लहर छिपी बैठी है। यदि मान लें कि इस लहर के बाद भी यदि तीसरी लहर आ गई तो हम क्या करेंगे?

सवाल यहां यह है कि पिछले साल प्रधानमंत्री ने बड़े-बड़े आर्थिक पैकेजों की घोषणा करके इसे आपदा के अवसर तलाशने तथा लोकल को ग्लोबल बनाने की बात कही थी। उन्होंने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने गांव के लोगों को गांव में रोजगार मुहैय्या कराने के सपने भी दिखाए थे। एक साल में ना तो स्वास्थ्य सेवाएं सुधरी, ना ही आर्थिक मोर्चें पर हम गरीब मजदूर के लिए ही कुछ ठोस कर पाये। यही वजह की आज एक साल बाद भी हम फिर उसी मोड़ पर खड़े हैं, जो हम पीछे छोड़ आये थे।

सोशल मीडिया पर लोग पिछले साल के वीडियो डाल रहे हैं और लोग हालात को देखते हुए उसे आज के वीडियो मान रहे हैं। पिछले साल से ज्यादा खराब स्थिति इस साल है। दवाईयों की कालाबाजारी, अस्पतालों की मनमानी, प्रशासन की उदासीनता, टालमटोल की नीति, फिर वही लॉकडाउन, फिर वही पलायन सब कुछ एक जैसा है।

अपने घर पहुंचने की जद्दोजहद में लाईनों में लगे लोगों का फिर से एक बार वही स्वर सुनाई दे रहा है कि टिकिट नहीं है, गांव जाने मिल जाए। रोजी-रोटी को लेकर चिंता है ,काम धंधा बंद हो गया है। यहां रहकर भूखे मरेंगे क्या? गांव में काम होता तो इधर क्यों आते? ऐसी बहुत सारी बातें है, जो पिछले साल के दृश्य को सजीव कर रही है। हमारे हुक्मरान इन सब बातों पर चुप्पी साधे अपने अश्वमेघ के घोड़े पर सवार होकर बिहार की ही तरह बाकी पांच राज्यों में अपना परचम फहराने में लगे हैं। वे नये-नये वादों के साथ अलग-अलग मोर्च् पर हैं। जनता का क्या है जेहि विधि राखेराम, तेही विधि रहिये।

कोरोना संक्रमण से उपजी आर्थिक तंगी, बेरोजगारी और पलायन की स्थिति को रोकने गांव के लोगों को गांव में रोजगार देने के नाम पर बहुत से आर्थिक पैकेजों की घोषणा हुई। कोरोना के लिए अभी तक 29.87 लाख करोड़ के पैकेज जारी हो चुके है। आत्म निर्भर भारत रोजगार योजना के लिए 36 लाख करोड़ जारी किये गये हैं। प्रधानमंत्री गरीब कल्याण रोजगार के नाम पर 82911 करोड़ रुपये और आत्म निर्भर भारत तीन के लिये 265080 करोड़ रुपये के पैकेज की घोषणा हुई। पूरे देश को बताया गया की हम आपदा को अवसर में बदलेंगे। अब लोकल से ग्लोबल की यात्रा होगी। गांव के लोगों को जो हुनर मंद है, उन्हें रोजगार के लिये शहरों की ओर नहीं जाना पड़ेगा। फिर एक साल में ऐसा क्या हुआ की कोरोना के डर से शहरों से गांवों की ओर आये लोगों को फिर एक बार उसी नरक की ओर लौटना पड़ा, जिसे वे अलविदा कह कर आये थे। गांव में कम होते खेती के अवसर, किसानों के प्रति सरकार का रवैय्या और आर्थिक जरूरतों के कारण बार-बार लोगों को शहरों की ओर लौटना पड़ता है।

शासन, प्रशासन जिसने आपदा को अवसर में बदलने की बहुत बात की थी उससे लोग सामान्य सी गुहार कर रहे है कि शासन यदि हास्पिटल में उपचार की दरे कम करे तो मरीजों से अवैध वसूली बंद हो सकती है। केंद्र और राज्य की सरकारें आज भी पहले जैसा व्यवहार करके एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप करने में बाज नहीं आ रही है। रायपुर के सांसद सुनील सोनी ने कहा कि पिछले साल केंद्र सरकार ने मेडिकल कालेज को जो 230 वेंटिलेटर दिये थे, वे बेकार पड़े है। अब इस आरोप के बाद छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य मंत्री टी एस सिहंदेव कह रहे हैं कि उसमें से 70 वेंटिलेटर बेकार है। जनता समझ नहीं पा रही है कि उसके परिवारजनों को मरने से रोकने के लिए आक्सीजन सिलेंडर, वेंटिलेटर, अस्पताल में बेड और जीवन रक्षक इजेक्शन क्यों नहीं मिल रहा है, जबकि केंद्र और राज्य की सरकारें अपनी पुख्ता व्यवस्था की ढिंढोरा पीटते नहीं थकती है।

दरअसल इस पूरे मामलों का एक मानवीय पहलु भी है। चाहे वह सरकारी तंत्र का व्यक्ति हो या प्रायवेट जिसे मौका मिल रहा है वह या तो लाभ कमाना चाहता है या टालमटोल करके अपने कर्तव्यों की इतिश्री। यदि आप जिला प्रशासन द्वारा दिये गये सहायता नंबरों पर फोन करें तो आपके सामने सारी बाते खुलकर आ जायेंगी। सरकारी एंबुलेंस का ड्राइवर कहेगा हमारे पास पीपीई कीट नहीं है। हमारे पास तो स्कार्पियों है, साहब के निर्देश नहीं है। नगर निगम के जोन आफिस में फोन करो तो वो किसी एनजीओ की ओर आपको भेज देंगे। हर स्तर पर जहां से भी आपको मदद की उम्मीद है, वो आपको आगे का रास्ता बताएंगे और उनकी बाते सुनो, इंटरव्यू देखो तो लगता है इससे अच्छी व्यवस्था तो और कहीं हो नहीं सकती। प्रायवेट एंबुलेंस वाला बिना आक्सीजन के रायपुर के तेलीबांधा से एम्स तक ले जाने का 6 हजार रुपए मांगेगा और आक्सीजन वाली एंबुलेंस का 12 हजार। यदि आपका कोरोना पाजिटिव आ गए है तो आपके पास इतने बार फोन करके जानकारी मांगी जायेगी कि आपकी सांसे उखडऩे लगे। ऐसी पूछ परख से आप भयाक्रांत हो जायेगे। कोरोना का डर आपको जीने नहीं देगा और ये पूछताछ वाले आपको मरने नहीं देंगे।
दुष्यंत कुमार का एक शेर है-
उनकी अपील है कि हम उनको मदद करें।
चाकू की पसलियों से गुज़ारिश तो देखिये।।