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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से -छत्तीसगढ़ सिनेमा में नई संभावनाओं की शुरुआत

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से  -छत्तीसगढ़ सिनेमा में नई संभावनाओं की शुरुआत


-सुभाष मिश्र
भूलन द मेज को मिले राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार ने छत्तीसगढ़ में नया इतिहास रचते हुए यहां के फिल्मकारों के लिए एक टर्निंग पाइंट का, मील के पत्थर का काम किया है। मनोज वर्मा द्वारा निर्मित और निर्देशित इस फिल्म ने यह भी साबित किया है कि यदि फिल्मकार के पास दृष्टि और धैर्य हो, तो वह बेहतर उपन्यास को अच्छी स्क्रिप्ट में तब्दील करके एक ऐसी फिल्म बना सकता है, जो आपको याद रहे, भले ही आपने भूलन कांदा पर पैर रखा दिया हो।

संजीव बक्शी के उपन्यास में वर्णित तथ्य के अनुसार भूलन कांदा एक ऐसा पौधा है, जिस पर पैर पड़ जाए तो इंसान रास्ता भटक जाता है, उसकी याददाश्त तब तक नहीं आती, जब तक कि कोई उसे जगाता नहीं। हमारी न्याय व्यवस्था का पैर भी उस पौधे पर पड़ गया है, जो बहुत कुछ भूल गई है। सरकारी दफ्तरों में जगह-जगह भूलन कांदा पड़ा हुआ है, जहां लोग जनता के काम को भूल जाते हैं। यह फिल्म इस व्यवस्था पर प्रतीकों और बिम्बों के माध्यम से जीवंत व्यंग्य है।

क्षेत्रीय फिल्म केटेगरी में छत्तीसगढ़ की फिल्म भूलन द मेज को बेस्ट फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार मिलने से छत्तीसगढ़ सिनेमा में नई संभावनाओं की शुरुआत हुई है। भूलन द मेज की शूटिंग छत्तीसगढ़ के गरियाबंद के महुआ भाठा गांव के जंगल व रायपुर और आसपास की लोकेशन में शुरू हुई। इस फिल्म में जहां एक और मुंबई फिल्म दुनिया और नाटकों से जुड़े कलाकार राजेंद्र गुप्ता, मुकेश तिवारी, अशोक मिश्रा, अनिसा पगारे वहीं पिपली लाईव से चर्चा में आये ओंकार दास मानिकपुरी, पुष्पेन्द्र सिंह, संजय महानंद, आशीष सेन्दे, सलीम अंसारी, उपासना वैष्णव, अनुराधा दुबे सहित छत्तीसगढ़ के कलाकारों और महुआभ गांव के ग्रामीणों ने काम किया है। फिल्म का संगीत सुनील सोनी और पाश्र्व संगीत मोंटी शर्मा ने दिया है।   

भूलन द मेज का प्रीमियर शो रायपुर इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में हुआ। उसके बाद ये फिल्म इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल कैलिफोर्निया, कोलकाता, इटली जैसी जगहों पर भी दिखाई गई। रायपुर और आजमगढ़ फिल्म फेस्टिवल के दौरान फिल्म की लंबाई और कुछ दृश्यों को लेकर बातचीत हुई। फिल्म के स्क्रिप्ट राईटर और निर्देशक मनोज वर्मा ने फिल्म समीक्षकों की बातों का सम्मान कर फिल्म की लंबाई में दो घंटे 25 मिनट की इस फिल्म को एडिट करके दो घंटे 10 मिनट की अवधि में तैयार किया। आजमगढ़ फिल्म उत्सव में प्रदर्शित भूलन द मेज को देखर कथाकार फिल्म राईटर रामकुमार सिंह ने कहा कि फिल्म में भूलन के रुप में इस्तेमाल किए गए बिम्ब की और पूरी फिल्म प्रक्रिया और कलाकारों की प्रशंसा करते हुए फिल्म को अद्भुत और अविस्मरणीय बताया।

यूं तो छत्तीसगढ़ राज्य बनने के पहले 'कहि देवे संदेश और 'घरद्वार जैसी फिल्में बनीं, जिन्हें आज भी याद किया जाता है। मशहूर फिल्मकार सत्यजीत रे ने यहां प्रेमचंद की कहानी सद्गति पर फिल्म बनाई। मणिकौल ने विनोद कुमार शुक्ल के उपन्यास पर आधारित नौकर की कमीज फिल्म बनाई। अभी हाल ही में न्यूर्टन फिल्म का निर्माण छत्तीसगढ़ में हुआ। एक नवंबर 2000 को छत्तीसगढ़ राज्य बनने के साथ अपनी भाषा अपने क्षेत्र और अपनी अस्मिता को लेकर उठी भावना के बीच सतीश जैन की फिल्म मोर छईंया भुईंया ने सफलता का नया कीर्तिमान स्थापित किया। इसके बाद से तो छत्तीसगढ़ में फिल्में बनाने का जो सिलसिला प्रारंभ हुआ, वह अब एक फिल्म उद्योग की शक्ल ले चुका है। इस बीच छत्तीसगढ़ सरकार ने फिल्म विकास निगम बनाया। फिल्म सिटी बनाने की घोषणा की। छत्तीसगढ़ में फिल्म उद्योग की शुरुआत को देखते हुए निजी क्षेत्र का एक मीडिया इंस्टीट्यूट भी यहां प्रारंभ हो गया।

मनोज वर्मा की फिल्म भूलन द मेज ने छत्तीसगढ़ के फिल्मकारों को याद दिलाया है कि हमारे पास 'कहि देवे संदेश और 'घरद्वार की परंपरा रही है। हमारे पास किशोर साहू जैसे फिल्मकार रहे हैं। राज्य बनने के बाद बहुत से फिल्मकारों ने जिस तरह की दोयम दर्जे की फिल्में बनाई, उसे देखकर दर्शकों को निराशा हुई। छत्तीसगढ़ राष्ट्रीय स्तर पर निर्माण के क्षेत्र में अपनी कोई खास पहचान नहीं बना पाया। जबकि छत्तीसगढ़ के ही अशोक मिश्रा जैसे समृद्ध फिल्म लेखक  हैं, जिन्हें दो बार राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया। जिन्होंने नसीम, वेलडन अब्बा, वेलकम टू सज्जनपुर जैसी फिल्म लिखी। जयंत देशमुख जैसे समृद्ध आर्ट निर्देशक हैं, जिन्होंने एक से बढ़कर एक फिल्मों में टीवी सीरियल में आर्ट डायरेक्शन किया।

नाटक के क्षेत्र में समृद्ध छत्तीसगढ़ जहां हबीब तनवीर, सत्यदेव दुबे, शंकर शेष जैसे रंगकर्मि, लेखक रहे। विनोद कुमार शुक्ल जैसे कवि, उपन्यासकार जिनके उपन्यास नौकर की कमीज पर मणिकौल जैसे निर्देशक ने छत्तीसगढ़ में आकर फिल्म बनाई। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद अपनी बोली, भाषा और क्षेत्रीयता के नाम पर बहुत सारे लोगों ने मोर छर्इंया भुईंया की व्यवसायिक सफलता से प्रेरित होकर फिल्मे बनाने की सोची और औधे मुंह गिरे। इन लोगों के पास न तो सतीश जैन जैसी व्यवसायिक सिनेमा की दृष्टि और न ही फिल्में बनाने का अनुभव ही था। छत्तीसगढ़ सिनेमा में जहां सतीश जैन व्यवसायिक दृष्टि से कमाऊ फिल्में बनाने में कामयाब रहे वैसी कामयाबी बहुत कम लोगों को मिल गई। बिना किसी शोध, जानकारी और फिल्म तकनीक को जाने बिना बहुत से फिल्मकार आये और आ रहे हैं, उनके लिए मनोज वर्मा की फिल्म भूलन द मेज एक आईना है। फिल्म मैकिंग को समझकर कथानक पर काम करो, धैर्य रखकर फिल्म बनाओ जो अपनी जमीन से जुड़ी हो तो निश्चित ही वह राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सफल होगी। योगेंद्र चौबे जैसे निर्देशक भी है जिन्होंने गांजे की कली जैसी अच्छी फिल्म बनाई, जो बहुत से फेस्टिवल में पसंद की गई।

भूलन द मेज ने सिनेमा के क्षेत्र में नया और अनोखा मापदंड तय किया है। इस फिल्म ने छत्तीसगढ़ की अपार संभावनाओं की ओर भी फिल्मकारों का ध्यान खींचा है। अच्छी फिल्म बनाने की इच्छा लोगों के मन में इस फिल्म के पुरस्कृत होने के बाद जागेगा। यह विश्वास भी की यदि अच्छा सिनेमा बनेगा तो दर्शक भी बढ़ेंगे और फिल्म से सभी को कमाई भी होगी। सरकार अच्छी फिल्मों को बढ़ावा दे, उसके निर्माण के लिए अनुदान दें, तकनीकी सहायता प्रशिक्षण की सुविधा उपलब्ध कराए और सबसे ज्यादा ब्लाक स्तर पर सिनेमा गृह बनाएं ताकि छत्तीसगढ़ी फिल्मों का प्रदर्शन हो सके।

मराठी फिल्मों में जिस तरह का बदलाव हरिशचंदजी फैक्टरी और कोर्ट फिल्म के माध्यम से आया, उसी तरह पंजाब की फिल्मों में गुरविंदर सिंह की फिल्मों के बाद जो नवजागरण का दौर शुरू हुआ, भूलन द मेज के बाद उसी तरह का बदलाव छत्तीसगढ़ के सिनेमा में हो सकता है, बशर्तें कि यहां के फिल्मकार मनोज वर्मा की तरह गंभीर प्रयास करें। यहां कथानक, लोकेशन और प्राकृतिक संसाधनों की कमी नहीं है। यहां नकली फिल्म सिटी बनाने की भी जरुरत है। केवल नेशनल लेवल की वर्कशाप, फिल्म एपरिशियेशन कोर्स, अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल और फिल्म निर्माण व तकनीक से जुड़ी संस्था की है। छत्तीसगढ़ आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र है। आज पूरी दुनिया में आदिवासी विषय पर सिनेमा बन रहा है। यहां के फिल्मकार यहां की कला, संस्कृति, कथानक, लोकसंगीत आदि को ध्यान में रखकर यदि फिल्में बनायेंगे तो अवार्ड का जो सिलसिला अभी प्रारंभ हुआ है, यह निश्चित ही आगे बढ़ेगा।