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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - जबरा मारे और रोने भी न दें

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - जबरा मारे और रोने भी न दें

सुभाष मिश्र
अक्सर लोग कहते हैं कि जिसका कोई नहीं उसका खुदा है यारो या भगवान, सभी दीन दुखियों की सुनता है। किंतु यदि मंदिर मस्जिद के कपाट बंद हो, अल्लाह-ईश्वर के यहा सुनवाई फिलहाल स्थगित हो, आनलाईन कम्यूनिकेशन का कोई माध्यम न हो और लोग अपने लोगों को अस्पताल के बाहर बेड के लिए, आक्सीजन के लिए और जीवन रक्षक दवाईयों के लिए मरता देखे तो कहां गुहार करें? लोगों को लगा था कि मोदी है तो मुमकिन है। लोगों की यह गलतफहमी भी उसी तरह दूर हो गई जैसी अच्छे दिन आने वाले है, या शाइनिंग इंडिया की। इस समय दिल मांगे मोर की जगह, आक्सीजन मांगे मोर की तर्ज पर यहॉं-वहॉं से आक्सीजन का जुगाड़ कर रहा है।

हमारे यहां एक कहावत है कि जबरा मारे और रोने भी न दे। ऐसा ही कुछ हो रहा था सोशल मीडिया पर अपनी व्यथा या जमीनी सच्चाई बयान करने वालों के साथ। सरकार प्रलोभन, प्रताडऩा और कानूनी दांवपेंच के जरिये लोगों की अभिव्यक्ति की आजादी जो उन्हें सविंधान में प्रदत्त मौलिक अधिकारों के तहत मिली है, उस पर प्रतिबंध लगा रही है। जिन लोगों के परिजन इस समय कोरोना के संक्रमण से जूझ रहे है, या मौत के मुंह में समाकर अपने अंतिम संस्कार के लिए तरस रहे है, ऐसे लोगों की जब शासन-प्रशासन में सुनवाई नहीं हुई तो इन्होनें सोशल मीडिया पर पोस्ट डालनी शुरू की। जमीनी हकीकत से सरकारी इंतजामो का झूठ जब लोगों के सामने आने लगा तो सरकार ने सोशल साईड से ऐसी पोस्ट हटाने की कार्यवाही करते हुए संबंधित लोगों के खिलाफ कानून का सहारा लेकर कार्यवाही शुरू की। सरकारी स्तर पर मरने वालों के जो आकड़े बताये जा रहे है, और श्मशान में जो शव आ रहें है, दोनों की संख्या में भारी अंतर है। गोदी मीडिया द्वारा किया गया महिमा मंडन और झृठ की तस्वीरें सच के सामने बौनी पड़ गई। ऐसे में सरकार और उससे जुड़ें लोगो का बौखलाना शुरू हुआ। दुख, पीड़ा और तकलीफ से हलाकान लोगो के जख्मों पर मलहम लगाने की बजाय उन्हें जबरा मारे रोने भी ना दे की स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया गया। जब देश में सरकार न सुने, ईश्वर के कपाट बंद हो और लोगों की संवेदनाएं भोथरी होने लगे तो लोगों के पास एक मात्र सहारा न्यायालय ही बच जाता है। सोशल मीडिया पर दुख की अभिव्यक्ति को रोकने के लिए की जा रही पोस्ट के विरूद्ध जब कार्यवाही होने लगी तो कुछ लोगों को न्यायालय की शरण में जाना पड़ा। ये अच्छी बात है कि हमारे न्यायालय अब खुद ही संज्ञान भी लेने लगे है। ऐसे ही एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को सुनवाई करते हुए कहा कि कोई भी राज्य पहली सूचना रिपोर्ट (एफआईआर) दर्ज नहीं कर सकता है या लोगों से मदद की अपील करने या कोरोना वायरस महामारी के दौरान सोशल मीडिया या अन्य जगहों पर अपनी शिकायतें दर्ज करने के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हम इसे अपने न्यायालय की अवमानना मानेंगे। आइए हम अपने नागरिकों की आवाजें सुनें और दबें नहीं। एक नागरिक या न्यायाधीश के रूप में यह मेरे लिए गंभीर चिंता का विषय है। अगर नागरिक सोशल मीडिया पर अपनी शिकायतें दर्ज करते हैं, तो हम जानकारी पर रोक नहीं लगाना चाहते हैं।  

भारत में अभिव्यक्ति की आजादी के सवाल पर पुणे में आयोजित 84 वीं कांग्रेस के अंत में अपनी वार्षिक ''अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रिपोर्ट जारी करते हुए वैश्विक लेखकों ने कहा कि भारत में मुक्त अभिव्यक्ति के लिए माहौल बुरी तरह से बिगड़ गया है। मारे गए पत्रकार गौरी लंकेश को याद करते हुए, पेन इंटरनेशनल ने एक आधिकारिक बयान में कहा कि यह भारतीय अधिकारियों से अपने लेखकों, पत्रकारों और अन्य सभी को स्वतंत्र अभिव्यक्ति के अधिकार का प्रयोग करने के लिए कहता है, और अंतर्राष्ट्रीय कानून के तहत अपने दायित्वों के अनुरूप अपना कानून लाने के लिए। सरकार की कथनी करनी में अंतर है। एक लोकतांत्रिक देश में हिंसक माध्यम से मीडिया को चुप कराने का मतलब है कि एक कामकाजी लोकतंत्र का टूटना। महिला पत्रकारों को उनकी विवादास्पद राय के लिए ट्रोल किया जाता है, लेकिन कुछ महिला पत्रकारों को केवल इसलिए ट्रोल किया जाता है क्योंकि वे बोलती हैं। गौरी लंकेश की 5 सितंबर 2017 को बेंगलुरु में उनके घर के बाहर गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। कर्नाटक पुलिस ने एक दक्षिणपंथी समूह के कुछ सदस्यों को कथित तौर पर उनकी हत्या की साजिश रचने के आरोप में गिरफ्तार किया है। एक लोकप्रिय हिंदी और अंग्रेजी भाषा का टीवी चैनल, जिसने अपनी झूठी, पूर्वागत से ग्रसित खबरों के लिए आलोचना का सामना किया है, जिसमें जेएनयू विरोध प्रदर्शनों के कथित रूप से गलत तरीके से कैप्शन फुटेज के लिए शामिल है, जिसके कारण छात्र नेताओं की गिरफ्तारी हुई। ऐसे ही कुछ चैनलों को अभी किसान आंदोलन के दौरान गलत रिर्पोटिंग के लिए बहुत ही अपमानजनक स्थितियों से गुजरना पड़ा। जनता धीरे-धीरे जमीनी सच्चाई और मीडिया पर दिखाएं जा रहे झूठ या कटे प्रायोजित खबरों को समझने लगी है।

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एक याचिका पर केंद्र और ट्विटर को नोटिस जारी कर फर्जी खबरों पर और सोशल मीडिया प्लेटफार्मों के माध्यम से प्रसारित किए जा रहे अभद्र भाषा पर रोक लगाने की मांग की। ट्विटर का उपयोग अलगाववादी को बुलाने, समाज के कुछ वर्गों में दहशत पैदा करने, भारत की एकता, अखंडता और संप्रभुता को चुनौती देने के लिए किया जा रहा है, याचिका में कहा गया है। ऐसा आरोप है कि ट्विटर ''जानबूझकर उन संदेशों को बढ़ावा देता है।  

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म फेसबुक ने कहा है कि कथित तौर पर कोविद-19 महामारी के कुप्रबंधन को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस्तीफे की मांग करते हुए पोस्टों को गलत तरीके से हटा दिया। इस पर फेसबुक ने कहा कि कंपनी ने सरकार के इशारे पर ऐसी पोस्ट को नहीं छिपाया। आरोप है कि फेसबुक ने हैशटैग या टेक्स्ट प्तक्रद्गह्यद्बद्दठ्ठरूशस्रद्ब के साथ पोस्ट को अस्थायी रूप से छिपा दिया है क्योंकि उन पोस्ट में कुछ कंटेंट हमारे कम्युनिटी स्टैंडर्ड्स के खिलाफ जाते हैं। हैशटैग देखने की कोशिश करने वाले फेसबुक उपयोगकर्ताओं ने एक संदेश देखा जिसमें कहा गया था कि समुदाय को सुरक्षित रखने के लिए फेसबुक अस्थायी रूप से पदों को छिपा रहा है। एक बयान में, फेसबुक ने कहा कि उसने अब पदों को बहाल कर दिया है और हैशटैग को गलती से अवरुद्ध कर दिया गया। कंपनी ने कहा कि भारत सरकार ने हैशटैग हटाने के लिए नहीं कहा। फेसबुक ने यह भी कहा कि ब्लॉक हैशटैग का उपयोग करने वाली कुछ सामग्री का परिणाम था, लेकिन यह निर्दिष्ट नहीं करता था कि किस तरह की सामग्री है। ट्विटर ने भारत सरकार के इशारे पर कम से कम 50 ट्वीट्स खींचे, जिसमें चल रहे कोविद -19 महामारी के खराब संचालन के लिए सरकार की आलोचना की।

एक ट्विटर प्रवक्ता कहना है कि , ''अगर सामग्री ट्विटर के नियमों का उल्लंघन करती है, तो सामग्री को सेवा से हटा दिया जाएगा। सभी मामलों में, हम खाताधारक को सीधे सूचित करते हैं ताकि वे जान सकें कि हमें खाता से संबंधित कानूनी आदेश प्राप्त हुआ है। फरवरी में, ट्विटर ने भारत सरकार द्वारा अपने नियमों के स्पष्ट उल्लंघन के लिए 500 से अधिक खातों को हटाने का आदेश देने के बाद कुछ ट्विटर खातों के खिलाफ प्रवर्तन कार्रवाई की एक सीमा ले ली।

सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) मंत्री रविशंकर प्रसाद ने अपने राज्यसभा के संबोधन में यह दलील दी कि भारत में कारोबार करने वाली सोशल मीडिया कंपनियों को भी भारतीय कानूनों का पालन करना होगा। उन्होंने कहा, हमारे पास सोशल मीडिया के लिए बहुत सम्मान है क्योंकि इसने नागरिकों को सशक्त बनाया है लेकिन आज, मैं स्पष्ट रूप से यह कहना चाहता हूं कि यह ट्विटर, फेसबुक, लिंक्डइन या व्हाट्सएप है जो वे भारत में काम करने के लिए स्वतंत्र हैं, लेकिन उन्हें भारत के संविधान का पालन करने की आवश्यकता है। अगर सोशल मीडिया का उपयोग नकली समाचार फैलाने, हिंसा फैलाने या भारत की चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करने के लिए किया जाता है, तो सख्त कार्रवाई की जाएगी। इस समय हमारे देश में गोदी मीडिया और जनमीडिया के बीच एक तरह की जंग जारी है। एक ओर भाड़े के टट्टू है तो दूसरी ओर जनता की आवाज बनकर निकलने वाले बहुत सारे लोग। सोशल मीडिया पर जारी इस जंग में झूठ फैलाने वाले कभी इतिहास को, कभी मुसलमानों को, कभी धार्मिक आस्थाओं, स्थानों और घटनाओं का सहारा लेकर बहुसंख्यक जनसंख्या को बरगलना चाहते है। वे कथित रूप से बहुत सारे भावनात्मक मुद्दों से लोगों का ध्यान हराना चाहते है। ऐसे लोगों के लिए आंदोलनकारी किसान देशद्रोही है। जनलोग सरकार की नाकामी की बात उठाते है वे राष्ट्रद्रोही है जो हॉं में हॉं मिलाकर भक्त मंडली या अंतभक्ति में शामिल नहीं है, उन्हे इस देश में रहने का हक नहीं है। ऐसी सारी बातों के बावजूद लोग तथ्यों के साथ सच को सामने लाकर अपनी बात कह रहें है।
कवि गजानन माधव मुक्तिबोध कहते भी है-
अब अभिव्यक्ति के सारे खतरे
उठाने ही होंगे।
तोडऩे होंगे ही मठ और गढ़ सब।
पहुँचना होगा दुर्गम पहाड़ों के उस पार
तब कहीं देखने मिलेंगी बाँहें
जिसमें कि प्रतिपल काँपता रहता
अरुण कमल एक
ले जाने उसको धँसना ही होगा
झील के हिम-शीत सुनील जल में
चाँद उग गया है
गलियों की आकाशी लंबी-सी चीर में
तिरछी है किरनों की मार
उस नीम पर
जिसके कि नीचे
मिट्टी के गोल चबूतरे पर, नीली
चाँदनी में कोई दिया सुनहला
जलता है मानो कि स्वप्न ही साक्षात्
अदृश्य साकार।