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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - बॉस इज ऑलवेज़ राइट

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - बॉस इज ऑलवेज़ राइट


राजनीति हो या अफ़सरशाही सभी जगह यह बात अक्सर सुनने को मिलती है कि बॉस इज ऑलवेज़ राईट। प्राइवेट सेक्टर में तो मालिक ही खुदा है। ऐसी सेवाएं, संस्थान जहां वरिष्ठ अधिकारियों, बॉस के हाथ में खुश होकर ईनाम देना, पुरस्कृत करना होता है और नाराज होने पर पनीशमेंट देने का प्रावधान होता है, वहां तो बॉस इज आलवेज राईट का ही फार्मूला ही काम करता है। यस सर, यस सर सुनने के आदि हो चुके कानों को नो सर सुनना नागवार गुजरता है। वर्दी वाले संस्थानों, विभागों ये तो अनुशासन के नाम पर बॉस के सामने सेल्यूट बजाते-बजाते यस सर-सर कहते-कहते ही बहुतो की जिदंगी बीत जाती है।

कवि कुम्भन दास ने यस बॉस वाली इस मानसिकता से तंग आकर ही शायद बहुत पहले ये दोहा लिखा होगा।

    आवत जात पनहियाँ टूटी, बिसरि गयो हरि नाम।।

    जिनको मुख देखे दुख उपजत, तिनको करिबे परी सलाम।।

हमारा मन जिसे जूते मारने का, गालियां सुनाने का होता है और वह गलती से यदि हमारा बॉस है,  मालिक है, या दबंग है, या समरथ है तो हम उसे अदब से सलाम बजाते हैं। भले ही अकेले में मन ही मन उसे सौ गालियां निकालें।

शायर दुष्यंत कुमार लिखते हैं -

हिम्मत से सच कहो तो बुरा मानते हैं लोग, रो-रो के बात कहने की आदत नहीं रही। 

हमने तमाम उम्र अकेले सफऱ किया, हम पर किसी ख़ुदा की इनायत नहीं रही ।

नौकरी ठीक से करने के लिए किसी न किसी गॉड फॉदर की जरूरत होती है। कम ही लोग होते हैं जो अपने बूते अपने तेवर के साथ अपनी नौकरी कर पाते हैं। ऐसे लोग अक्सर प्रबंधन की आंखों में किरकिरी की तरह चुभते हैं। अपने आपको भारत भाग्य विधाता समझने वाले, खुदा, भगवान और मसीहा समझने वाले लोगों को आलोचना से डर लगता है। वे किसी भी निंदक को नियरे नहीं रखना चाहते। वे कबीर की उल्टबासी, दोहे को कुछ यूं सुनना चाहते हैं -

भला जो देखन मैं चला, भला ना मिल्या कोए

जो दिल खोजा आपना, मुझसे भला ना कोए।

प्रशंसा भाव और चाटुकारिता में बहुत बारीक सा अंतर होता है। जब हमें कोई बात, काम या कोई कृत्य अच्छा लगता है, दिल को छूता है तो हम प्रशंसा के भाव से भरकर तारीफे  करते हैं। यहां हमारा निहितार्थ किसी की खुशामद या चिचौरी करने नहीं होता। मन खुश हो गया, मजा आ गया, नंद भये आनंद करो का होता है। किन्तु जब हम डेलीब्रेटली किसी की हर बात पर वाह-वाह करने लगें, बात-बेबात तारीफे  करने लगे तो ये बटरिंग लगाने की श्रेणी में आता है। बहुत सारे लोग जहां बोलना चाहिए, विरोध दर्ज करना चाहिए, वहां भी चुप रहते हैं। आफिस अनुशासन, पार्टी अनुशासन, पारिवारिक अनुशासन के नाम पर अक्सर लोग बहुत से मामलों में जहां हस्तक्षेप जरूरी है वहां भी चुप रहते हैं। आफिस में बॉस की मनमानी, घर में बहू के साथ मां-बाप की ज्यादती और बाकी जगह पर सिस्टम की ज्यादती को भी लोग हमें क्या करना या कौन बोले के नाम पर चुप्पी अख्तियार कर लेते हैं। बहुत बार चुप्पी को, अन्याय को, अनुशासन का नाम देकर विरोध करने वालों को बाहर का रास्ता दिखाया दिया जाता है।

अभी हालिया घटनाक्रम में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अधीर रंजन चौधरी ने बिहार चुनाव में हार को लेकर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल की 'आत्म-विश्लेषण' की टिप्पणी पर गहरा एतराज़ जताते हुए कहा है, कि कांग्रेस से नाखुश नेता कहीं भी जाने को आजाद है। कुछ इसी तरह की बात पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा ने भी मोदी सरकार की नीतियों के बारे में कही थी, उन्हें पार्टी आलाकमान ने किनारे बिठा दिया। अधिकांश राजनीतिक पार्टियों, संगठनों और संस्थाओं में जो भी व्यक्ति खुलकर अपनी बात या विचार रखता है, तो उसे पार्टी अनुशासन के नाम पर बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है। यही वजह है की मामला पार्टी का हो, ऑफिस का हो, या फिर घर का ही क्यों न हो सबको एक ही गीत पसंद आता है -

जो तुमको हो पसंद वही बात कहेगें ।

तुम दिन को यदि रात कहो तो हम रात कहेंगे।

हम, और हमारी समुची व्यवस्था में हमेशा से लोग केवल हां जी-हां जी सुनना पसंद करते हैं, कोई भी ऐसी बात जो उनको अच्छी नहीं लगती, वो सुनना ही नहीं चाहते। इसलिए जो समझदार व्यक्ति होता है वो कहता है कि 'जैसी चले बयार, पीठ को तैसी कीजै।

और यदि जब मामला आपके बॉस का हो या आपके राजनीतिक आका का हो, तो वो चाहे जितनी भी गलत बात क्यों न करे या कोई गलत डिसीजन क्यों न ले आपको उसकी बात को सही ठहराना ही पड़ता है। यही वजह है कि धीरे-धीरे राजनीतिक कार्यकर्ता भक्त मंडली में तब्दील होते जा रहे हंै। पार्टी में हाई कमान और सुप्रीमो का निर्णय ही अंतिम होता है, चाहे वह कितना ही गलत निर्णय क्यों न लें। कांग्रेस के एक बड़े नेता ने एक बार चाटुकारिता की सारी हदें पार कर इंदिरा इज इंडिया तक कह दिया था और लोग चुप रहे। ऐसे बहुत सारे लोग है जो अपने बॉस को खुश करने के लिए, उनकी हर सही-गलत बात में भी हामी भरते हैं, और ये परम्परा नौकरशाही में और विस्तारित  होती है। वहां पर आप कितने ही प्रतिभाशाली हों, आपको कितना ही नवाचार आता हो, आपके पास कितने ही आईडिया हो, पर आपका बॉस चाहे वो कितना ही गधा क्यो न हो, और किसी भी तरह चाहे साम-दाम-दंड-भेद से प्रमोशन पाकर ऊपर पहुँच गया हो, वो जो कुछ कहेगा, वो आपको मानना होगा। यदि अपने किसी भी तरह से उसकी बात को गलत साबित करने, की कोशिश की, तो वो आपका त्वरित नुकसान करेगा।  बहुत सारे तकनीकी और विशेषज्ञ सेवा के विभागों में पदस्थ अधिकारियों को जब कोई नया आईएएस आकर जिसे इस सेवा का कोई ज्ञान नहीं है अपना बॉसिज्म दिखाता है, ज्ञान पेलता है। तो यह जानते हुए कि इसे कुछ नहीं आता, लोग मारे डर के यस सर-यस सर कहते हैं। उन्हें भी उसकी हां में हां मिलानी पड़ती है। ये दृश्य ब्यूरोक्रेसी में आम है।

कई बार हम देखते हैं कि घर पर भी लोग यस मैन बन जाते हैं, वहां वो अपनी पत्नी के यस मैन होते हैं, वो अपने घर में किसी न किसी के यस मैन होते हैं।   बहुत सारे लोग पत्नी को यस बॉस बोलते है, या पत्नी अपने पति को यस बॉस बोलती है, जबकि दोनों की बराबरी की हिस्सेदारी होती है। दोनों के विचारों में आदान-प्रदान होना चाहिए। चाहे मामला, व्यवसयिक क्यों न हो। यदि बिना विचार विमर्श के निर्णय होते हैं तो इसके परिणाम दूरगामी दिखलाई देते हैं। नोटबंदी में काला धन वापस लाने की जो बात हुई थी वो फेल हुई है , लेकिन पूरी भाजपा में कोई नहीं कह पा रहा है कि ये एक बहुत ही अविवेकपूर्ण निर्णय था। आज कांग्रेस गाँधी परिवार से बाहर नहीं निकल पा रही है। कभी सोनिया गाँधी, कभी राहुल, तो कभी प्रियंका गाँधी का नाम आता है। क्योंकि उन्हें लगता है कि ये जो बॉस का परिवार है,  यही कांग्रेस को अच्छा से चला सकता है। यहां भी 'बॉस इस ऑलवेज राइट' की परंपरा दिखलाई देती है। जो इनके खिलाफ बोलता है उसे इनके लोग बाहर का रास्ता दिखा देते हैं।

लोग कहते हैं कि अफसर की 'अगाड़ी और घोड़े की पिछाड़ी' से बच के रहना चाहिए। हम एक डेमोक्रेटिक देश हैं और हम यह मानते हैं कि व्यक्ति को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार है, वो अपनी बात रख सकता है। विधानसभा- संसद में हमारे विधायक-सासंद हमारी बात रखते हैं, जिनको नहीं सुनना होता, वो सत्ता नहीं सुनती और वो चीजों को नकारती है, और सब चीजों को नकार के जो पार्टी हाई कमान चाहता है वहीं मानती है। भले ही वह आत्मघाती निर्णय क्यों न हो, पर बॉस के खिलाफ  नहीं जाना। ये हमारी मान्य परंपरा है, इसीलिए कहा गया है कि 'बॉस इस ऑलवेज राइट '।

साहब और साहेब में बहुत अंतर है। साहेब की बंदगी की जाती है, और साहब की चाटुकारिता। बहुत काम साहब की अपने लोगों के बीच साहेब का दर्जा पाते हैं। अक्सर साहब पद और पॉवर के साथ आते हैं और उसी के साथ चले भी जाते हैं। अच्छे साहब, बॉस कान के कच्चे नहीं होते। वे अपनी बुद्धि, विवेक और संवेदनात्मक ज्ञान से चीजों को देखते हैं। वे खालिस साहब नहीं, मनुष्य भी होते हैं। वे चौबीस घंटे बॉस, साहब नहीं होते। वरना तो लोग घर बाहर सब जगह साहब ही होते हैं। उनके घर के लोग, वाईफ  भी उन्हें साहब ही बुलाती हैं। साहबियत भी एक बुरी आदत की तरह है, जो आसानी से नहीं जाती। साहबों की रिटायर्ड लाईफ  बहुत खराब होती है। लोग अक्सर उन्हे रिटायरमेंट और कई बार तो तबादले के बाद ही साहब मनाने से इंकार कर देते हैं। हां जी-हां जी, यस सर- यस सर सुनने के आदि कान इन शब्दों को सुनने तरस जाते हैं। साहब लोग रिटायरमेंट के बाद ज्यादा नहीं जी पाते। वे साहबियत जाने के अफसोस में जल्दी मर जाते हैं। बहुत सारे साहब अपनी फजीयत कराकर संविदा पर भी साहब बने रहना चाहते हैं। उन्हें मुफ्त की गाड़ी बंगले और हाली-मुहाली की आदत संविदा पर बने रहने मजबूर करती है। वे संविदा में वो सब करने को तैयार हो जाते, जिससे उन्हें आने वाले साल की संविदा के लिए जरूरी ऑक्सीजन मिलती रहे। ये अपने आका के काले-पीले कामों को नियम कायदों को ताक पर रखकर खुशी-खुशी करने के लिए तत्पर रहते हैं। ऐसे लोगों को लगता है कि 'बॉस इस ऑलवेज राइट '।