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किशोर साहू राष्ट्रीय अलंकरण एक सम्मान है या कलाकारों का अपमान ?

किशोर साहू राष्ट्रीय अलंकरण एक सम्मान है या कलाकारों का अपमान ?

पंकज शर्मा

रायपुर।  छत्तीसगढ़ का संस्कृति विभाग किस तरह सम्मान के नाम पर देश भर के विख्यात कलाकारों का अपमान कर रहा है इसकी बानगी एक राष्ट्रीय समाचार पत्र में छपे विभाग के विज्ञापन से देखने को मिली. दरअसल आज एक बड़े समाचार पत्र में संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग द्वारा विज्ञापन प्रकाशित किया गया ये विज्ञापन पूरी तरह से विरोधाभास से भरा हुआ है. ये विज्ञापन “ किशोर साहू राष्ट्रीय अलंकरण “ से जुड़ा हुआ है. ये विज्ञापन अस्पष्ट एवं भ्रामक है. एक ओर जहाँ इसमें प्रकाशित है किशोर साहू राष्ट्रीय अलंकरण दूसरी ओर हिंदी/छत्तीसगढ़ी फिल्मों के लिए इसे बताया गया है।



क्या है विरोधाभास का कारण
सन 2016 में जब इस सम्मान का आरंभ हुआ तब इसे दो रूपों में बांटा गया था
1.    किशोर साहू राष्ट्रीय अलंकरण ( हिंदी सिनेमा के लिए ) 10 लाख रुपए
2.    किशोर साहू प्रादेशिक अलंकरण ( छत्तीसगढ़ी सिनेमा के लिए )  2 लाख रुपए

जिसके तहत सन 2017 में राष्ट्रीय अलंकरण श्याम बेनेगल को तथा प्रादेशिक अलंकरण मनोज वर्मा को प्रदान भी किया गया था. संस्कृति विभाग द्वारा जारी आज के विज्ञापन में राष्ट्रीय और प्रादेशिक अलंकरण की कोई चर्चा ही नही है। विज्ञापन स्पष्ट ही नहीं है। साथ ही आवेदन पत्र मंगाए जाने कि प्रक्रिया भी स्पष्ट नहीं है जिससे लोगो को विरोधाभास हो रहा है.

सम्मान देने की प्रक्रिया को लेकर बुलंद हो रहे विरोध के स्वर
जब इस सम्मान की घोषणा 2016-17 में हुई तब उस समय तत्कालीन संस्कृति सचिव निहारिका बारीक ने इन सम्मानों के लिए आवेदन मंगवाए जाने की सलाह भी दी थी जिसका विरोध भी कला क्षेत्र से जुड़े लोगो ने किया था. उनमे से कुछ लोगो ने सुझाव दिया था कि मध्यप्रदेश की तर्ज पर तीन सदस्यीय जूरी बनाकर पुरुस्कार का निर्धारण किया जाए. लेकिन ऐसा हो नहीं पाया और इस सम्मान के लिये कलाकारों से आवेदन मंगवाये गये अब ये बात समझ से परे है कि 10 लाख के पुरस्कार के लिए कोई बड़ा निर्देशक आवेदन पत्र भेजकर कहेगा कि मुझे पुरस्कार दिया जाए ?

ये सम्मान अपमान क्यों ?
अगर विभाग को सम्मान देना ही है तो कलाकारों से आवेदन क्यों मंगवाया जा रहा है. विभाग के अधिकारी आखिर इस बात को क्यों समझ नहीं पा रहे की जब किसी भी क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने वालो को सम्मान दिया जाता है तो उनके कार्यों का मूल्यांकन कर उनका चयन किया जाता है न की उनसे आवेदन मंगाये जाते हैं भला कोई कलाकार स्वयं ही सम्मान पाने आवेदन भेजे तो ये सम्मान तो स्वयं लिया गया सम्मान कहलायेगा न जो एक तरह से उनकी कला साधना और उनके उत्कृष्ट कार्यों का अपमान है. इस तरह आवेदन मंगा कर विभाग अब उनका अपमान कर रहा है ये बात प्रदेश के कलाकार खुल कर कहने लगे हैं.

कला क्षेत्र से जुड़े लोगो ने सुझाया कि कैटेगिरी अनुसार जूरी तय कर उनके माध्यम से हो चयन

फ़िल्म जगत और कला के क्षेत्र से जुड़े लोगो ने अब इस पुरे मामले में अपने सुझाव भी खुलकर विभाग के सामने रखे हैं उनकी माने तो अलंकरण के लिए कैटेगिरी अनुसार जूरी तय कर उन्हें सम्मानित कलकारों का नाम देना चाहिए जिसके बाद कलाकारों का सम्मान किया जाय. ताकि छत्तीसगढ़ राज्य के सम्मान पर कोई छींटा न पड़े.

संस्कृति मंत्री अमरजीत भगत की घोषणा महज दिखावा
संस्कृति मंत्री अमरजीत भगत ने बीते दिनों ऑस्कर जैसा अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार जीतने वाली छत्तीसगढ़ी फिल्म, निर्देशक, अभिनेता-अभिनेत्री को पांच करोड़ रुपए का प्रोत्साहन अनुदान देने की घोषणा की थी वहीँ सूचना और प्रसारण मंत्रालय की ओर से आयोजित राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार की प्राइम श्रेणियों में पुरस्कृतों को एक करोड़ रुपए दिए जाने की भी घोषणा की थी. संस्कृति मंत्री द्वारा की गई ये घोषणा कलाकारों को सम्मान देने का कोई कारगर कदम नहीं है ऐसा कलाकार मान रहे हैं. इस परिपेक्ष्य में कलाकारों का तर्क है कि अंतर्राष्ट्रीय फ़िल्म समारोह में भारतीय फिल्मों की उपस्थिति नगण्य है।

सुप्रसिद्ध फ़िल्म समीक्षक और पत्रकार अजीत राय का कहना है कि बीते 90 सालों से हर साल ऑस्कर अवॉर्ड दिया जा रहा है.  जब से विदेशी भाषा की सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म का ऑस्कर अवार्ड शुरू किया गया,तब से हर साल भारतीय फ़िल्में प्रतियोगिता में भाग लेती रही है . दुर्भाग्य से पिछले 60 सालों में केवल तीन भारतीय फिल्मे ही अंतिम दौर तक पहुंच पाई जिनमें महबूब खान की " मदर इंडिया " , मीरा नायर की " सलाम बॉम्बे " , और आशुतोष गोवारिकर की आमिर खान स्टारर फ़िल्म लगान शामिल है वहीं रिचर्ड एटनबरो की फ़िल्म गांधी में बेस्ट कॉस्ट्यूम डिजाइन के लिए भानु अथैया को 1983 में और डैनी बॉयल की फ़िल्म " स्लम डॉग मिलेनियर " में बेस्ट साऊंड के लिये ए आर रहमान , बेस्ट सांग के लिये गुलज़ार और बेस्ट साउंड मिक्सिंग के लिये रसूल पोकुट्टी को जरूर ऑस्कर अवॉर्ड से नवाजा गया है । भारत और ऑस्कर का किस्सा यहीं खत्म हो जाता है ।

अब ऐसे में ऐसी घोषणा समझ से परे है. वहीँ हाल ही में प्रसिद्ध फ़िल्म निर्देशक तिग्मांशु धूलिया एक वेबसिरिज की शूटिंग के सिलसिले में राजधानी रायपुर पहुंचे थे इस दौरान उन्होंने राज्य सरकार के प्रदेश में फ़िल्म सिटी के निर्माण की घोषणा को महज़ एक प्रोजेक्ट करार दिया उनका मानना है कि, साउथ में फ़िल्म मेकिंग का स्ट्रांग कल्चर था इसलिए वहां रामोजी राव स्टूडियो बना दिया गया. वहां फ़िल्म इंडस्ट्रीज ग्रो कर रही थी जबकि छत्तीसगढ़ में ऐसा कुछ नहीं है. यहाँ आप स्टूडियो खोल भी दोगे तो लोग क्यूँ आयेंगें.

बरहाल तिग्मांशु जैसे दिग्गज फ़िल्म निर्देशक की बातें सही भी लगती है. सूबे के संस्कृति मंत्री को कलाकारों को सब्जबाग दिखाने की बजाये धरातल पर आकर उनकी वास्तविक समस्या को समझते हुए उनसे मार्गदर्शन लेकर छत्तीसगढ़ में फ़िल्म जगत की स्थिति को सुधारने सार्थक प्रयास करना चाहिए.