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प्रेम का अनुभव

प्रेम का अनुभव


संसार में सबसे अधिक चर्चा प्रेम की होती है। जन्म के साथ ही मनुष्य में आकर्षण का भाव भी पनपता है और यह आकर्षण ही प्रेम का बीज है। पहले मनुष्य माता-पिता और परिजनों के संपर्क में आता है, फिर अन्य प्रिय वस्तुएं उसे अपनी ओर खींचती हैं। आकर्षित होना आदमी की विशेषता है। चुंबक और लोहे की तरह संसार के साथ उसका संबंध प्रगाढ़ होता जाता है।

महाभारत में दो प्रकार के संबंधों की चर्चा हुई है। एक है- बध संबंध और दूसरा है, बंधन संबंध। जैसे कोई चिड़िया किसी मांसाहारी के लिए खाद्य वस्तु होती है और किसी के लिए पिंजडे़ में रहकर उसका मनोरंजन करती है। यह बंधन दोनों को रुचता है। नारद भक्ति सूत्र इस प्रेम को ‘अशब्द’ और अनिर्वचनीय’ कहता है। कबीर इसी को अकथ कहानी प्रेम की कहते हैं। यह गूंगे के गुड़ का आस्वाद है। इसका सीधा मतलब हुआ कि प्रेम अनुभूति है- विशुद्ध चैतन्य अनुभूति, अर्थात वह एक समृद्ध अनुभव है। 

शास्त्रों ने कई बार बड़ी क्रांति की बातें की हैं। यह भी कहा है कि परमात्मा की पूजा के लिए कर्मकांड भी छोड़ो। पंचोपचार या षोडशोपचार की भी आवश्यकता नहीं है। बस मानस पूजा करो। मन के सिंहासन पर उसे बिठाओ- कहीं भी बैठे-बैठे अंजलि में गंगाजल उठाओ, स्वर्ग के नंदन वन से पारिजात के फूल चुन लाओ, सूर्य को आरती का दीपक बना लो, बस मन के मंदिर में यह पूजा संपन्न हो जाएगी। शरीर की सीढ़ियों पर चढ़कर यह प्रेम उदात्त हो जाता है। सभी जीवों के प्रति करुणा का भाव जगता है। यही प्रेम विराट होकर देशप्रेम बनता है और अखिल मानवता तक जा पहुंचता है।