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मोदी की कोविड पाठशाला में राज्यों के मुख्यमंत्री एक महत्वपूर्ण राजनीतिक पाठ सीख रहे

मोदी की कोविड पाठशाला में राज्यों के मुख्यमंत्री एक महत्वपूर्ण राजनीतिक पाठ सीख रहे

डीके सिंह 

भविष्य में जब भी कोरोनोवायरस के खिलाफ भारत की लड़ाई का अध्ययन किया जाएगा, तो इस दौर को याद किया जाएगा कि कैसे ‘हमने मिलकर काम किया’ और सहकारी संघवाद का ‘बेहतरीन उदाहरण’ पेश किया- ये प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शब्द हैं जो उन्होंने 16 जून 2020 को मुख्यमंत्रियों के समक्ष एक वीडियो सम्मेलन में कहा था. जब वह सोमवार को फिर उनके साथ वर्चुअल बैठक कर रहे होंगे, वास्तव में कोविड-19 की महामारी फैलने के बाद के 10 महीनों में 10वीं बार, ये शब्द उनके कानों में गूंज रहे होंगे. उनमें से कई तीन केंद्रीय कृषि कानूनों के खिलाफ विधानसभाओं में प्रस्ताव पेश करने और अपने राज्यों में जांच के लिए केंद्रीय जांच ब्यूरो को प्राप्त आम सहमति वापस लेने के बाद प्रधानमंत्री के साथ बैठक में शामिल हो रहे होंगे.

इसके अलावा, पीएम-सीएम बैठकों की प्रक्रिया भी कई प्रतिभागियों के लिए एक रहस्य होगी. आखिरकार, पहले से ही एक अंतर-राज्य परिषद की व्यवस्था भी तो है. प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली इस परिषद के सदस्यों में छह केंद्रीय कैबिनेट मंत्रियों के साथ ही सभी मुख्यमंत्री शामिल हैं. लेकिन, परिषद की अंतिम बैठक जुलाई 2016 में हुई थी. ये अलग बात है कि गुजरात का मुख्यमंत्री रहते हुए, 2012 में, मोदी ने मांग की थी कि अंतर-राज्य परिषद की बैठकें साल में कम से कम दो बार होनी चाहिए.

योजना आयोग के उन्मूलन के साथ ही राष्ट्रीय विकास परिषद (एनडीसी) अप्रभावी हो गई है, हालांकि इस बारे में औपचारिक घोषणा अभी तक नहीं की गई है. इस परिषद की अध्यक्षता भी प्रधानमंत्री के पास है और इसमें भी सभी मुख्यमंत्री सदस्यों के रूप में शामिल रहे हैं. एनडीसी के बारे में आखिरी बार जून 2019 में सुना गया था जब पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इसे ‘गुपचुप निपटाए जाने’ का मुद्दा उठाया था. प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली नीति आयोग संचालन परिषद, जिसमें सारे मुख्यमंत्री भी सदस्यों के रूप में शामिल हैं, के एनडीसी का स्थान लेने की उम्मीद की जा रही थी. संचालन परिषद की आखिरी बैठक जून 2019 में हुई थी.

नौ बैठकें और बढ़ता संशय

केंद्र-राज्य परामर्श और सहयोग के मौजूदा तंत्र की निष्क्रियता के साथ ही कोविड-19 को लेकर पीएम-सीएम बैठकें धीरे-धीरे खुद एक अलग तंत्र के रूप में स्थापित हो रही हैं. लेकिन अगर आप मुख्यमंत्रियों से, खासकर विपक्षी दलों के मुख्यमंत्रियों से, प्राइवेट में बात करें तो नौ बैठकों के बाद भी वे इसके बारे में संदेह ही जताते हैं.

पीएम-सीएम बैठकों को लेकर उनमें उत्साह की कमी की एक वजह है- इन बैठकों का मुख्यतया प्रधानमंत्री और उनके भाषणों पर केंद्रित होना, जिसमें मुख्यमंत्रियों की भूमिका महज माहौल बनाने वालों की होती है. प्रधानमंत्री के भाषणों को लाइव स्ट्रीम किया जाता है और सारे टीवी चैनल उसे प्रसारित करते हैं, जबकि मुख्यमंत्रियों के भाषणों को सार्वजनिक नहीं किया जाता है. जब प्रधानमंत्री इन बैठकों के अंत में समापन वक्तव्य देते हैं, तो वो राष्ट्र को उनके संबोधन की तरह होता है, और मुख्यमंत्रियों ने क्या कहा उसमें उसकी चर्चा बिल्कुल नहीं, या नहीं के बराबर होती है. बाद में इन मुख्यमंत्रियों के मीडिया प्रबंधकों को उनकी बातों, चाहे वो कितनी भी संक्षिप्त क्यों ना हों, को सामने लाने में काफी मशक्कत करनी पड़ती है. स्वाभाविक है कि इन बैठकों में प्रधानमंत्री की भूमिका एक शिक्षक जैसी होती है, जिसने अपना लेक्चर दे दिया है और अब छात्रों (यानि मुख्यमंत्री) के ऊपर है कि वे उससे सबक लें या उसकी अनदेखी कर माता-पिता (यानि मतदाता) का कोपभाजन बनें. ये पूरी प्रक्रिया समर्पित शिक्षक के प्रति सम्मान भाव बढ़ाने वाली है. रिजल्ट के लिए छात्रों को जवाबदेह ठहराया जाएगा और उन्हें होमवर्क करना होगा - पॉजिटिविटी दर को 5 प्रतिशत से नीचे और मृत्यु दर 1 प्रतिशत से नीचे लाना, आरटी-पीसीआर टेस्ट बढ़ाना, रोगी के संपर्कों को ढूंढ़ना, आदि-आदि.

मुख्यमंत्रियों की दुविधा

कांग्रेस नेता राहुल गांधी के 2008 के एक भाषण से शायद प्रधानमंत्री के साथ बैठकों में मुख्यमंत्रियों की दुविधा को समझा जा सकता है. कांग्रेस नेता ने दावा किया था कि जब वह सेंट स्टीफंस कॉलेज में छात्र थे, तो वहां सवाल पूछने को प्रोत्साहित नहीं किया जाता था और अधिक सवाल पूछने वालों को हेय दृष्टि से देखा जाता था. उनकी इस बात से पूर्व छात्रों में भारी नाराजगी पैदा हुई थी.

मोदी की पाठशाला में भी कुछ छात्र  गैर-भाजपा दलों के के मुख्यमंत्री तो ज़रूर ही  अधिक सवाल पूछते हैं. हालांकि उन्हें नीचा नहीं दिखाया जाता है. उन्हें बस नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है. इसलिए भले ही प्रधानमंत्री के साथ बैठकों में ये मुख्यमंत्री जीएसटी बकाया की लगातार मांग करते रहें, जवाब में उन्हें प्रधानमंत्री की चुप्पी ही मिलेगी.

प्रधानमंत्री ने कोविड-19 के संबंध में मुख्यमंत्रियों से अपनी पहली बातचीत 20 मार्च 2020 को की थी. उस बैठक के एक दिन पहले, उन्होंने 22 मार्च के ‘जनता कर्फ्यू’, जो कि राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन का अभ्यास था, की घोषणा के लिए राष्ट्र को संबोधित किया था. लेकिन बैठक में मोदी ने मुख्यमंत्रियों को लॉकडाउन की अपनी योजना की हवा तक नहीं लगने दी. प्रधानमंत्री के साथ बाद की बैठकों में, मुख्यमंत्री अलग-अलग मुद्दे उठाते रहे लेकिन वे तत्काल कोई जवाब पाने में विफल रहे. ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक चाहते थे कि राज्यों को लॉकडाउन दिशानिर्देशों को विकेंद्रीकृत तरीके से लागू करने की अनुमति हो. उनके केरल के समकक्ष पिनाराई विजयन ने भी यही बात उठाई थी. पंजाब के मुख्यमंत्री चाहते थे कि शराब की बिक्री पर रोक हटा दी जाए. छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी सहित कई अन्य चाहते थे कि मोदी सरकार जीएसटी का तुरंत भुगतान करे. बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार प्रवासी मज़दूरों के संकट का समाधान चाहते थे. ऐसे कई मुद्दे उठाए गए. यदि इन मुख्यमंत्रियों ने प्रधानमंत्री मोदी से टीवी चैनलों पर लाइव जाने वाले उनके समापन वक्तव्यों में न मुद्दों को संबोधित करने की अपेक्षा की होगी, तो उन्हें शायद बेहतर पता होना चाहिए था.

हालांकि मोदी सरकार ने सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए स्वास्थ्य ढांचे को चुस्त बनाने में राज्यों का समर्थन किया. यह केंद्रीय हस्तक्षेप के कारण ही संभव हुआ कि पश्चिम बंगाल और दिल्ली जैसे राज्यों ने अपने तरीके बदलते हुए संक्रमण एवं मृत्यु के सही आंकड़े देने शुरू किए. बेशक, राजनीतिक पूर्वाग्रह और प्रतिशोध के आरोप भी सामने आते रहे. लेकिन फिर से पीएम-सीएम बैठकों की बात करें तो उनमें खास कुछ भी नहीं है. लेकिन बैठकों का पीएम मोदी की एक विशेष सार्वजनिक छवि निर्मित करने में बड़ा योगदान रहा है- एक ऐसे तपस्वी प्रधानमंत्री की छवि जिसने कि कोविड-19 के खिलाफ भारत की लड़ाई का नेतृत्व किया और अंतत: भारतीयों को ‘मेड-इन-इंडिया’ टीकों की सौगात दी.