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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से- लोकल से ग्लोबल महज एक जुमला है

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से- लोकल से ग्लोबल महज एक जुमला है


सरकारें अलग-अलग समय पर जनता को बहकाने या अपनी कथित प्राथमिकता को दर्शाने के लिए कुछ नारे व जुमले गढ़ती हैं। इस तरह के नारे, जुमले लिखने और बनाने वाले भी पलट कर नहीं देखते कि इनका आगे जाकर हश्र क्या होगा। इस समय आपदा को अवसर में बदलने तथा लोकल को ग्लोबल बनाने की बहुत बात हो रही है। सबके साथ सबका विकास अब पुरानी बात हो गई। इसी तरह बाकी नारो और जुमलों की तरह जब हम जमीनी स्तर पर इनकी सच्चाई की पड़ताल करते हैं तो हकीकत कुछ और ही नजर आती है। लोकल स्तर पर जो लोग उत्पादन से जुड़े हुए हैं, उनके पास विपणन के लिए न तो संसाधन हैं, ना ही पूंजी है। लोकल से ग्लोबल की इस यात्रा में सबसे महत्वपूर्ण तथ्य है उसकी सेटलाइट यात्रा। बिना सेटलाइट यात्रा और वैश्विक संपर्क से कोई भी सामग्री स्थानीय बाजार से बाहर प्रदर्शित और बिक्री नहीं की जा सकती।

बहुराष्ट्रीय पूंजी के दैत्य प्रसार के साथ स्थानीयता और वैश्विकता के बीच अंतर्विरोध लगातार गहरा रहा है। दरअसल, स्थानीय स्तर पर और अपेक्षाकृत सीमित पैमाने पर उत्पादन करने वाले लघु उत्पादकों द्वारा उत्पादित वस्तु के बड़े स्तर पर विपणन के लिए एक व्यापक मार्केटिंग नेटवर्क की आवश्यकता होती है जिस पर बड़ी कंपनियों का कब्जा है। वे अपनी शर्तों पर उन्हें खरीद कर अधिक मुनाफ़ा कमाने का प्रयत्न करेंगी। साथ ही बड़ी कम्पनियों के उत्पाद की तुलना में उनकी उत्पादन लागत भी अधिक होगी। अगर कोई बड़ा मार्केटिंग नेटवर्क उन्हें लेता भी है, तो मूल उत्पादक अपने उत्पाद के नगण्य मुनाफ़े का ही हकदार होगा। ज़ाहिर है, इस भीषण प्रतियोगिता के वातावरण में छोटे उत्पादकों का टिकना मुश्किल है। बड़ी पूंजी की ताकत से आज कौन वाकिफ़ नहीं है।

यदि लोकल से ग्लोबल का नारा देने वाला सत्ता-प्रतिष्ठान स्वयं स्थानीय उत्पादों को प्रोत्साहित करने के ध्येय से विपणन नेटवर्क क़ायम करता है तो यह भी नव-उदारवादी शासन के इस दौर में अजूबा होगा। क्योंकि प्रकट रूप में सरकार की नीतियां संरक्षणवादी न होकर मुक्त स्पर्धा के पक्ष में हैं। ऐसे हालात में स्वदेशी की बात करना प्रवंचन मात्र है। कहने की ज़रूरत नहीं है कि लोकल से ग्लोबल दीगर जुमलों की तरह महज़ एक और जुमला है। वास्तविकता यह है कि जुमले धोखा देने के लिए गढ़े जाते हैं। जनता आसानी से उसका शिकार हो जाती है। आजादी के बाद से हमारे देश की सरकारें अलग-अलग जुमले, नारे गढ़ती रही है। दुष्यंत कुमार का एक शेर

भूख है तो सब्र कर रोटी नहीं तो क्या हुआ 

आजकल दिल्ली में है ज़ेर-ए-बहस ये मुद्दआ।

यदि हम हाल ही में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा दिये गये नारे की बात करें तो हम लोकल से ग्लोबल तक की यात्रा की बात करें तो महान यात्रा है। आप अंतरिक्ष देख रहे हो तो यहाँ से उड़ान भर के ऊपर जाओगे और ऊपर से आपको कोई देश छांटेगा, क्योंकि किसी भी देश के खरीददारी को आपके प्रोडक्ट खरीदना पड़ेगा, जब वो प्रोडक्ट इंटरनेट पर आएगा। हम देखते है यह एक्सपोर्ट का जो धंधा है उसमें केवल वो लोग इन्वॉल्व है जो बड़े शहरों में रहते हैं, या वो लोग पैसे वाले है, या जिनकी नेटवर्किंग अच्छी है। यदि हम छत्तीसगढ़ कि ही बात करें तो हम पाते हैं कि रायपुर , बिलासपुर के जांजगीर-चांपा, कोरबा के व्यापारी उत्पादक हैं जिनके पास में अपने लोगों का जयपुर, मुम्बई, दिल्ली, बैंगलौर में और बाकी जगह का नेटवर्क है। जो भागा दौड़ी कर सकते है वही एक्सपोर्ट का क्लीरेंस ले सकता है, लाइसेन्स ले सकेगे और अपने उत्पाद को शीप में, जहाज में भिजवाने की व्यवस्था कर सकेगे। विशाखापट्नम समुद्र तटीय व्यापार के लिए है जहां से माल भेजने वाले केरल व दिल्ली के व्यापारी है। एक्सपोर्ट एक बड़ा गोपनीय धंधा है जिसको ये लोग कम्प्लीट करते है। इस काम को वो किसान या वहां का कोई लोकल व्यक्ति हमारे यहाँ का कोई व्यक्ति समझ ही नहीं सकता।

सरकारें जो बिचोलिये खत्म करने की बात करती है बेफिजूल की बात है। हमारी अर्थव्यवस्था की सीढ़ी ही बिचोलिये की है। हिन्दुस्तान की जनसंख्या इतनी ज्यादा है की वो अर्थव्यवस्था की रीढ़ की हड्डी है। इस जनसंख्या के लिए संचालित बाजार में आपूर्ति के लिए एक ऐसे तंत्र की जरूरत है जो सब जगह हो और बिचौलिए सब जगह हैं।

किसी भी स्थानीय प्रोडक्ट को यदि हम ग्लोबल प्रोडक्ट में तब्दील करना चाहते है तो हमें इसके लिए नीचे से ऊपर तक एक कारगर सीढ़ी बनानी पड़ेगी। यह सीढ़ी गांव से लेकर राज्य और फिर देश-विदेश तक होगी। जैसा कि निर्यात करने वालों के पास होती है। ऐसा करने के लिए एक्सपोर्ट की प्रक्रिया को सरल बनाना होगा। उन उत्पादों को चिन्हित करना होगा जिन्हें हम निर्यात करके लोकल से ग्लोबल बनाना चाहते हैं। यदि हम छत्तीसगढ़ के उत्पाद की ही बात करें तो हमारे यहां घर-घर में मुनगा के पेड़ हैं। जो लोग मुनगा का निर्माण करते हैं वे लोग इसके लिए बेहतर पैकेजिंग करके इसे जैविक उत्पाद के रूप में अरब देशों में बेचते हैं। इस पूरी प्रक्रिया के बीच में बहुत से लोग होते हैं, जो प्रोडेक्ट को अलग-अलग से खरीदकर उसकी छटनी और पैंकेजिंग करके उसे उन निर्यातकों के जरिये अरब देशों तक भिजवाते हैं जो, इसकी वहां पर बिक्री करते हैं। इसी तरह हमारे यहां के बाकि उत्पाद भी मीडिलमेन और चैन सिस्टम के माध्यम से निर्यात होते हैं। जो उत्पादक है और जिसके पास किसी प्रकार का सरकारी सपोट सिस्टम नहीं है वह अपनी उपज या उत्पाद को उन्हीं लोगों को बेचने के लिए विवश है, जो स्थानीय बाजार में खरीदने के लिए तैयार है। आज जोर शोर से कहा जा रहा है कि लोकल को ग्लोबल बनाना है तो हमें सबसे पहले यह देखना होगा कि हमारे पास लोकल स्तर पर कौन-कौन से उत्पाद हैं और उनके संग्रहण की क्या व्यवस्था है। जिस तरह सेव के बगीचों से स्थानीय व्यापारी निर्यात के अनुबंध के जरिये से खरीद लेते हैं और जो सेव निर्यात करने योग्य होती है, उसे पेकिंग के माध्यम से निर्यात करते हैं। इसी तरह चाय बागवान से चाय, देशी मसाले पूरी एक चैन के माध्यम से निर्यात होते हैं। कम ही जगह ऐसी होगी जहां से बिना किसी चैन सिस्टम के बड़े व्यापारिक संस्थान के यहां निर्यात का काम चलता हो। जो लोग पूरे देश में लोकल से ग्लोब की बात करते हैं, दरअसल वे लोग लोकल से ग्लोबल की इस यात्रा को जुमले की तरह इस्तेमाल करके लोगों को सब्जबाग दिखा रहे हैं। उनकी बातें सुनकर तो यही कहा जा सकता है कि

ये इश्क़ नहीं आसाँ इतना ही समझ लीजे

इक आग का दरिया है और डूब के जाना है ।

लोकल से ग्लोबल की यात्रा को महानगर से संभागीय तक के एक्सपोर्ट पार्क सिंगल डेवलपमेंट के बिना असंभव है। एक्सपोर्ट की प्रक्रिया का सरलीकरण, प्रचार-प्रसार और नए लोगों को आगे आने देने का मौका सुलभता से मिलने की व्यवस्था जरूरी है। लोकल वो आइटम जो ग्लोबल हो सकता है, उसकी पहचान, गुणवत्ता का मानकीकरण करना व राज्यों से तालमेल करके उसे अंतराराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचाना जरूरी है। इस कार्यक्रम जो रुकावटें हैं उनमें सबसे बड़ी रुकावट है राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी, स्थानीय नेताओं के स्वार्थ। कहीं लोकल निर्माता को लाभ से वंचित कर दैनिक मजदूरी पर न रख लें, प्रशासनिक कमीशनखोरी से दुगुना नुकसान संभव है। एक तरफ वहीं लोकल ग्लोबल होगा जिसमें कमीशन है दूसरे अंतराराष्ट्रीय स्तर पर साख खराब होगी।

ठोस नीति, सटीक क्रियान्वयन व पारदर्शी व्यवस्था, समर्पित प्रशासनिक अमले के बिना लोकल से ग्लोबल की यात्रा असंभव है।