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व्ही.एस.भदौरिया की कविताः किसान

 व्ही.एस.भदौरिया की कविताः किसान


खेतों में दिन रात बहाता,

अपना खून पसीना,

उस किसान का सड़कों पर,

बीता एक महीना ।


मालिक जब ट्राली के नीचे,

करवट बदल रहा होता है,

नौकर अपने राजमहल में,

मखमल पर सोता है ।


मेहनत की कीमत चाही,

सौगात नहीं मांगी है,

अपना हक मांगा है,

खैरात नहीं मांगी है ।


तुम्हीं बताओ किसे सुनायें ?

चोट बहुत गहरी है,

जिसे बनाया खुद हमने,

सरकार वही बहरी है ।


सिर्फ चुनाव के समय,

जनता मालिक होती है,

पांच साल तक वह फिर,

अपनी किस्मत पर रोती है ।


अंधेरे का डर दिखला कर,

दिन में ठग लेता है,

किसे पता था ? चाय बेंचने वाला,

देश बेंच देता है ।


किसके कारण सन्नाटा है ?

आजकल इस देश में,

दिल्ली में एक आदमी है,

साधु के वेश में ।