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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-प्रतिबंधों की अवहेलना की मनोवृत्ति

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-प्रतिबंधों की अवहेलना की मनोवृत्ति


बहुत सारे लोग नियम के विरुद्ध, प्रतिबंधों के विरुद्ध सामाजिक अनुशासन के विरुद्ध काम करके गौरव का अनुभव महसूस करते हैं। युवा पीढ़ी में ये माचो मैन कहलाते हैं। इन्हें किसी प्रकार की रोका-टोकी, अनुशासन पसंद नहीं। जहां जिस बात के लिए रोक होगी, वहां ये लोग वहीं करेंगे। अभी घर से बिना मास्क नहीं निकलने गाड़ी चलाने समय हेलमेट लगाने, सावर्जनिक स्थान पर धूम्रपान नहीं करने और सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए लोगों से मिलने की लाख समझाईश के बावजूद बहुत सारे लोग वहीं कर रहे हैं जो वो करना चाहते हैं

इनका स्लोगन है मैं चाहूं ये करूं, मैं चाहे वो करूं मेरी मर्जी।

ये धनतेरस और दीपावली का समय है। प्रदूषण से स्वास्थ्य संबधी खतरे को देखते हुए पटाखे फोडऩे पर प्रतिबंध की समझाईश, न्यायालय और सरकार के आदेश के बावजूद बच्चे तो बच्चे बड़े भी पटाखे फोडऩे पर आमदा हैं। हमारी यह प्रदर्शन प्रियता की सामूहिक मनोवृत्ति बनती जा रही है जिसमें क्या गरीब, क्या अमीर सब शामिल होकर अपने भीतर के उत्सव या भड़ास का प्रदर्शन करना चाहते हैं। धीरे-धीरे लोगों में आत्म नियंत्रित बोध कम हो रहा है।

जहां लिखा वो यहां पेशाब करना मना है लोग वहीं खड़े होकर पेशाब करते दिखेंगे। बहुत सारी बिल्डिंगों में लोग सीढिय़ों पर थूकते हैं। इसे रोकने लोगों ने सीढिय़ों पर भगवान की मूर्तियां तक लगा रखी हैं पर लोग हैं कि  मानते नहीं। लोगों में तेजी से फैलती इस मनोवृति की वजह से ही पिछले कुछ सालों में सरकार और न्यायालयों द्वारा प्रतिबंध के बावजूद लोग दीपावली पर पटाखे फोडऩे से अपने आपको रोक नहीं पाते हैं। अलग-अलग माध्यमों से बार-बार लोगों से यह कहा जा रहा है कि दीपावली खुशियों का त्यौहार है। इस दिन दीये जलाकर अपनी खुशी व्यक्त करें। त्यौहार के नाम पर आतिशबाजी कर पर्यावरण को प्रदूषित करना सही नहीं है। प्रदूषण खतरनाक रूप ले चुका है। अगर अब भी नहीं संभले, तो आने वाले समय में परिणाम घातक होंगे। दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में लगातार दूसरे साल भी दिवाली के मौके पर सर्वोच्च न्यायालय ने पटाखोंपर प्रतिबंध बरकरार रखा है। दिल्ली की तर्ज पर बॉम्बे हाईकोर्ट ने मुंबई के रिहायशी इलाकों मेंअस्थायी पटाखा विक्रेताओं को पटाखे की ब्रिकी की इजाजत देने से इंकार कर दिया है।

पटाखों में बारूद, चारकोल और सल्फर के केमिकल्स का इस्तेमाल होता है जिससे पटाखे सेचिनगारी, धुआं और आवाज निकलती है, इनके मिलने से प्रदूषण होता है। पर्यावरण विशेषज्ञों कामानना है कि आतिशबाजी से प्रदूषण में करीब 85 फीसदी इजाफा हो जाता है। आतिशबाजी से निकली गैस श्वांस नलिका के जरिए प्रवेश कर अस्थमा व एलर्जी बढ़ा देती है।

विशेषज्ञों के अनुसार, पटाखों से वातावरण में सल्फर डाई आक्साइड, कार्बन डाई आक्साइड, नाइट्रोजन व मीथेन तथा अन्य गैस निकलती है। ये गैस वायुमंडल में हवा के साथ फैल जाती हैऔर स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होती है। डॉक्टर भी मानते हैं कि दिवाली के बाद अचानक दिलके मरीजों की तादात अस्पताल में बढ़ जाती है। धुएं में पाए जाने वाले सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रो ऑक्साइड जैसे केमिकल एलिमेंट की वजह से अस्थमा, लंग्स, सांस संबंधी, हार्ट, आंख, चेस्ट वगैरह की दिक्कतें हो सकती हैं।

नेशनल ग्रीन ट्रिब्युनल ने उन शहरों में, जहां पिछले साल नवंबर में हवा की औसत क्वालिटी खऱाबÓ या उससे आगे थी, 30 नवंबर तक तक सभी तरह के पटाख़ों की बिक्री पर रोक लगा दी। कोलकाता हाईकोर्ट ने भी दख़ल देते हुए, पटाख़ों पर बैन लगा दिया। दीपावली का त्यौहार भारत के 5,000 करोड़ के पटाख़ा उद्योग का आधार है। अभी पटाख़ों पर पाबंदी पश्चिम बंगाल, राजस्थान, ओडिशा और महाराष्ट्र जैसे ग़ैर-बीजेपी शासित राज्यों और केंद्र-शासित क्षेत्र दिल्ली में लागू है।

हरियाणा ने, इसमें आंशिक ढील देते हुए दिवाली के दिन 2 घंटे के लिए, पटाख़े जलाने कीअनुमति दे दी. एक और बीजेपी शासित राज्य कर्नाटक ने भी, पाबंदी को वापस ले लिया और जनता के दबावÓ का हवाला देते हुए ग्रीन पटाख़ों के इस्तेमाल की इजाज़त दे दी। दीपावली पर पटाखों पर लगाए गये प्रतिबंध को लेकर विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) ने सवाल किया कि पटाख़े हिंदू त्यौहारों पर ही क्यों बैन किए जाते हैं।
स्वदेशी जागरण मंच के राष्ट्रीय सह-संयोजक अश्वनी महाजन ने कहा कि पटाख़ों के इस्तेमालका दिवाली उत्सव से गहरा नाता है। उन्होंने सवाल किया कि सूबे सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्वीकृत ग्रीनपटाख़ों की अनुमति क्यों नहीं दे रहे हैं।

हमारे देश में तीज त्यौहार विशेषकर दीपावली के अवसर पर बिकने वाले पटाखों का भारत कापटाख़ा उद्योग कऱीब 5,000 करोड़ रुपए का है, जिसका अधिकांश उत्पादन तमिलनाडु केशिवकाशी में होता है. तमिलनाडु फायरवक्र्स एंड एमॉर्सेस मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन(टीएनएफएएमए) का अनुमान है कि शिवकाशी में 1,000 लाइसेंसशुदा पटाख़ा इकाई हैं, जिनका मार्केट साइज़ 2,500 करोड़ से 3,000 करोड़ के बीच है।
दीपावली के पटाखों उन लोगों पर असर पड़ेगा, जिन्हें सांस की बीमारी है, और वो वायरस काशिकार हो सकते हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने दिवाली के दौरान आतिशबाजी से परहेज करने कीअपील की है क्योंकि इसके कारण प्रदूषण के साथ-साथ कोविड-19 संक्रमण का खतरा भी बढ़ सकता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि ठंड और प्रदूषण के कारण स्मॉग बढऩे लगा है और अगर आतिशबाजी से दूरी नहीं बनाई गई तो स्थिति और बिगड़ सकती है जिससे कोविड-19 के फैलने और इसकेकारण मौत होने की दर में तेजी आ सकती है।

प्रदूषण वाले क्षेत्रों में कोरोना से ज्यादा मौतें सामने आई हैं। पटाखों के विस्फोट से होने वालाप्रदूषण खासकर सांस के मरीजों के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकता है। इससे सीओपीडी व अस्थमा के मरीज बढ़ सकते हैं। ऐसे में चिकित्सों की राय है कि, बेहतर होगा कि इस बारदीपावली पर पटाखे न जलाए जाएं।

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने ऐलान करते हुए कहा कि मध्य प्रदेश खुशियों का प्रदेश है। यहां हम खुशियों पर कभी भी किसी तरह का प्रतिबंध नहीं लगाते। प्रदेश में पटाखों पर प्रतिबंध नहीं है, लेकिन चीनी पटाखों पर प्रतिबंध जरूर है। अब भगवान राम के अयोध्या लौटने की खुशी मनाएं, पटाखे जलाए एवं धूमधाम से दीपावली मनाएं।

यहां सवाल यह नहीं है कि कौन सा त्यौहार किस बात का है । भगवान राम के अयोध्या लौटने और रावण का वध करके असत्य पर सत्य की विजय के इस पर्व को सदियों से मनाया जाता रहा है। तब पटाखों का चलन नहीं था। आज जैसा दिखावा भी नही था और प्रदूषण भी नहीं था। कोरोना संक्रमण जैसी बीमारी भी नहीं थी। यदि यह प्रदर्शन प्रियता और नियमों की अवहेलना यूंही जारी रही तो पता नही आगे क्या होगा। वैसे भी हमने प्रकृति से बहुत खिलवाड़ करके अपने आसपास खतरनाक दुनिया निर्मित कर ली है।