प्रधानमंत्री विकट परिस्थिति में अपनी नाकामी छुपा पहले थाली ताली बजवाया अब दिया जलवा रहे - दीपक दुबे

 प्रधानमंत्री विकट परिस्थिति में अपनी नाकामी छुपा पहले थाली ताली बजवाया अब दिया जलवा रहे - दीपक दुबे

रायपुर, 5 अप्रैल। भारतीय राष्ट्रीय मजदूर कांग्रेस (INTUC) छत्तीसगढ़ प्रदेशाध्यक्ष दीपक दुबे ने प्रेस को विज्ञप्ति जारी कर कहा कि कोरोना कोविड 19 से निपटने के प्रधानमंत्री पास कोई योजना नहीं है,न प्राप्त कोरोना फाइटर डॉक्टरों के लिए सुरक्षा दस्ता है ,न ही देश के करोड़ो लोगो के लिए कोई व्यवस्था है विश्व स्वास्थ्य संगठन दिसम्बर से लगातार चेतावनी देने के बावजूद देश से मास्क सेनेटाइजर और जरूरी चिकित्सा उपकरण की निर्यात करते रहे केंद्रीय गृह मंत्रालय के लगातार पत्राचार के बाद भी विदेश से आने वालों के रोकथाम नही किये टूरिस्ट वीजा पर आए अलग अलग देश के कट्टरपंथी अपने धर्म की प्रचार देश के अलग अलग महानगरों पर जाकर करते रहे इन सब नाकामी को प्रधानमंत्री देश से क्यों छुपा रहे पहले ताली थाली बजवाया अब दिया जलवा कर लोगों का ध्यान भटका रहे हैं।

श्री दुबे ने कहा कि प्रधानमंत्री ने कोरोना वायरस से लड़ने के लिए 24 मार्च की रात 8 बजे पूरे देश में 21 दिन के लॉकडाउन का ऐलान में कहा गया कि यह रात 12 बजे से प्रभावी हो जाएगा ऐसे में देश भर के लोगों को खाने-पीने की चीज़ें और दवाएं लेने के लिए बमुश्किल कुछ घंटों का ही समय मिल पाया. आज भी प्रवासी मज़दूर के काम ठप्प हो जाने और बुनियादी चीज़ें नहीं मिलने की दिक्क़तों से जूझ रहे हैं और पीएम के भाषण में कहीं भी इस बात का ज़िक्र नहीं था कि कंस्ट्रक्शन और असंगठित क्षेत्र के मज़दूर इससे कैसे निपटेंगे आज भूख, बीमारी, ज़्यादा पैदल चलने की वजह से और सड़क हादसों में कई मज़दूरों की मौत हो गई और कोरोना वायरस संक्रमण से अब तक 77  लोगों की मौत हो चुकी है क्या केंद्र सरकार के पास बड़े शहरों में मौजूद प्रवासी मज़दूरों की आबादी के आँकड़े नहीं थे। महामारी से लड़ने के लिए पश्चिमी देशों की देखादेखी यहां भी अचानक लॉकडाउन को लागू कर दिया गया दूसरे देशों में प्रवासी मज़दूरों की बड़ी तादाद नहीं है जबकि हमारे देश के शहरों में ऐसा एक बड़ा तबका है जो रोज़ाना की मज़दूरी पर जीवनयापन करते है सर्वे के अनुसार प्रवासी मज़दूरों की संख्या क़रीब 1.39 करोड़ है, जबकि कंस्ट्रक्शन सेक्टर में काम करने वाले क़रीब चार करोड़ प्रवासी मज़दूर है एवं घरेलू कामकाज में क़रीब दो करोड़ मज़दूर (आदमी-औरतें) काम करते हैं. टेक्सटाइल में यह आंकड़ा 1.1 करोड़ है जबकि ईंट-भट्ठे के काम से एक करोड़ लोगों काम करते है इसके अलावा ट्रांसपोर्टेशन, खनन और खेतीबाड़ी में भी बड़ी तादाद में प्रवासी मज़दूर लगे हुए थे प्रवासी मज़दूरों की लॉकडाउन के बाद उनकी नौकरियां छूट गई कंस्ट्रक्शन और दूसरी इंडस्ट्रीज में काम बंद हो जाने की वजह से उन्हें वहां से जिस स्थिति में थे भगा दिया गया ! 

प्रधानमंत्री इस मानवीय संकट का अंदाज़ा क्यों नहीं लगा पाई?

सरकार ने ग़रीब तबके के लिए कैश ट्रांसफ़र और राशन वितरण जैसे उपायों का ऐलान किया है लेकिन कई मज़दूरों के पास न तो बैंक खाते हैं न ही राशन कार्ड न ही श्रमिक पंजीयन कार्ड है न किसानों की पंजीकरण है।श्री दुबे ने आगे कहा कि इस घोषणा की तुलना 2016 की नोटबंदी से की जानी उचित होगा जिस तरह अचानक से प्रधानमंत्री ने देश की 80 फ़ीसदी करेंसी को अमान्य बना दिया उसके बाद देश भर में भगदड़ जैसी स्थिति पैदा हो गई थी वही स्थिति आज भी हो गई।

आज इस विकट स्थिति से निपटने के लिए प्रधानमंत्री के पास कोई शब्द नहीं है देश के लोगो की ध्यान भटकाने के लिए पहले थाली और ताली बजवाए अब दिया जलाओ जैसे कह रहे हैं जबकि इस विकट परिस्थिति में चाहिए कि हम अधिक से अधिक लोगों की कोरोना टेस्ट करें कोरोना वायरस से निपटने के लिए अधिक से अधिक चिकित्सा उपकरणों की व्यवस्था करें और लोगों को सीधे उन तक राहत पहुंचाएं आज भी देखने को मिल रहा है कि करोना के जो राहत सामग्री है उसमें गिध्दों की नजर लगी हुई है, जिस प्रकार की किसी के मौत को गिद्ध अपनी भोजन बनाते हैं वैसे स्थिति है खुद प्रधानमंत्री महोदय बताएं कि उनको प्रधानमंत्री राहत कोष के अलावा अन्य कोस बनाने की क्यों जरूरत पड़ी क्या प्रधानमंत्री राहत कोष में लोग अपने दान के पैसा जमा करते तो उसकी हिसाब देश को बताना पड़ता उस पर राहत कोष के सदस्यों को हिसाब देना पड़ता क्या इस लिये नया कोष बनाना पड़ा कि किसी को पता न चले कि कितने पैसे जमा हुए  और वह कहा खर्च हुई आज राहत कोष में भ्रष्टाचार फैल गई है यहां तक बच्चों को मिलने वाले चावलों पर भी दलाली व भ्रष्टाचार कर रहे हैं आज उज्ज्वला योजना जो प्रधानमंत्री जी ने जोर-शोर से वितरण किया था वह पूरी पूरी तरह ठप हो चुका है लोग गैस नहीं मिलने की वजह से गैस सिलेंडर को बेच दिए हैं आज के पैसा सीधे उन गैस एजेंसियों में जाएगी ना कि गरीबों के खाते में इस विकट परिस्थिति से निपटने मैंने पूर्व में ही मांग किया था कि देश के हर खाताधारकों के खाता में 5000 रुपये राहत राशि जमा करें जिससे लोग स्वयं अपने जरूरत की सामग्री खरीद सकें ।