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नजरिया: धर्मक्षेत्रे निजीक्षेत्रे...

नजरिया: धर्मक्षेत्रे निजीक्षेत्रे...

ध्रुव शुक्ल

भारत में धर्म की धारणा सार्वजनिक क्षेत्र की नहीं रही। वह प्रत्येक व्यक्ति के निजी क्षेत्र का मामला है। इसीलिए धर्म के तत्व की अपनी प्रतीतियों को प्रकट करने वाले ज्ञानियों ने उसे स्वधर्म ही जाना है। इस सृष्टि में सूर्य, पृथ्वी, जल, वायु और आकाश अपने स्वधर्म में स्थित हैं। उनके स्वधर्म के निर्वाह से ही मनुष्य सहित सभी प्राणियों की जीवन प्रणालियाँ अपने आप संचालित होती हैं। सभी प्राणी अपने-स्वभाव से अपने स्वधर्म का निर्धारण स्वयं ही करते हैं। कोई दूसरा नहीं।

सृष्टि के स्वधर्म निर्वाह के मार्ग में बाधा डालना ही अधर्म कहा जाता है। क्योंकि इसके द्वार समानरूप से सभी प्राणियों के उपकार के लिए खुले हैं। सृष्टि के इसी उपकारी स्वभाव को गहराई से जानकर भारतीय मनीषा ने जीवन में सह-अस्तित्व के मूल्य को पहचाना। राज्य और समाज को यह उपदेश भी किया कि देवताओं को उन्नत करते रहने से ही सबका अस्तित्व दीर्घकाल तक संभव है। धरती, आकाश, अग्नि, जल और वायु ही देवता हैं। इन देवताओं के माध्यम से ही जगत की प्रभुता बिना किसी जाति-वर्ण का भेद किये अपने आपको विविध शरीरों में प्रत्यक्ष करती रहती है।

क्षिति-जल-पावक-गगन-समीर नहीं जानते कि किस देशकाल में धरती पर कौन राज्य कर रहा है। वे अपने स्वभाव और स्वधर्म से बस इतना जानते हैं कि जिस राज्य में उन्हें सदा उन्नत बनाये रखने की दीर्घकालीन प्रणाली बनी रहती है। वहाँ वे उपकारी बने रहते हैं। उनका स्वधर्म इसी तरह अपना सार्वजनिक क्षेत्र प्रत्येक संवत्सर में रचकर सबके निजीक्षेत्र में सहयोगी बन जाता है। जिसे राज्य के द्वारा किसी को ठेके पर नहीं दिया जा सकता। सब अपने-अपने निजीक्षेत्र के खेतों की क्यारियाँ गोड़ने और खरपतवार हटाने के लिए पूरी तरह जिम्मेदार हैं। जीवन को अपने-अपने कर्म की खेती के रूप में पहचाना गया है। उसे अधिया-बटिया से किसी और को नहीं सौंपा जा सकता। सब सहजीवी होकर अपना-जीवन जीते हैं। उन्हें जिलाये रखने की जिम्मेदारी कोई दूसरा नहीं ले सकता।

सृष्टि के स्वधर्म में केवल जीते रहने की नहीं, अपने स्वधर्म में मरने की अनिवार्यता भी है। जीवन के निजीक्षेत्र की यह समझ ही प्रत्येक हृदय में रामराज्य को बसाती है।  इस स्वराज्य में सब अपना सामना करके ही अपने आत्मबल

से अन्याय का प्रतिकार कर सकते हैं। स्वधर्म की इस अनिवार्यता को भूलकर संयमित जीवन की कोई योजना नहीं बनायी जा सकती।