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व्यंग्य: शब्दकोश का राजनैतिक परिदृश्य - अखतर अली

व्यंग्य: शब्दकोश का राजनैतिक परिदृश्य - अखतर अली


घोषणा – यह एक असत्यकथा है यदि किसी को यह सत्य लगती है तो इसके लिये पूरी तरह से उसका विवेक और जागरूकता ज़िम्मेदार है लेखक नहीं|

सत्यवाणी– कहानी में से झूठ और व्यंग्य में से सत्य को नहीं निकाला जा सकता|

निवेदन-  जिसे प्यास लगी हो वे पानी पी ले , जिसे बाथरूम जाना है वे हो आये , कोई ज़रूरी फ़ोन करना है तो कर ले , रचना के बीच से कोई उठ कर नहीं जायेगा| 

हाँ तो किस्सा यह है कि बहुत समय पहले की बात है जब पृथ्वी के एक हिस्से में शब्दकोश नामक देश था , वहाँ व्याकरण की सरकार थी | इस देश में शब्द रहते थे जिनकी मुख्य जाति भाषा थी और रस , छंद , अलंकार, संधि, कारक , वचन , लिंग इसकी उपजातियां थी| इस देश का प्रमुख उत्पादन अर्थ यानि मीनिंग था, सम्पूर्ण विश्व को यही से अर्थ की पूर्ति की जाती थी| शब्द समुदाय के लोग पूरे विश्व में फैले हुए थे| कविता से लेकर संविधान लिखने तक अर्थवान शब्दों की पूर्ति शब्दकोश से ही की जाती थी| शब्दकोश में लोकतंत्र था और लोकतंत्र के आधार पर शब्दकोश में चुनाव संपन्न हुए| शब्दों ने सोचा अब सत्ता नये हाथो में सौपी जाये, हो सकता है ये और ज़्यादा बेहतर सरकार साबित हो| 

शब्दकोश में नई सरकार के गठित होते ही शब्दकोश दो समुदायों में बट गया , शब्द समुदाय और अंक समुदाय| अंक समुदाय अल्पसंख्यक था और जैसा विश्व में होता है वहाँ भी अल्पसंख्यक पर अत्याचार होने शुरू हो गये| बड़े शब्द छोटे शब्द पर हिंसा करने लगे, धनी शब्द निर्धन शब्दों के अर्थ नष्ट करने लगे| सत्ता समर्थित गुंडे शब्दों ने रातो रात भावार्थ पुरम और अनुवाद नगर को जला कर राख कर दिया| कई शब्दों ने जान बचाने के लिये धर्म परिवर्तन कर लिया है तो कई शब्दों ने अपने अर्थ बदल लिये है , सैकड़ो शब्द लापता हो गये | प्रेम, आस्था, विश्वास , नैतिकता , सत्य , सहयोग , अपनत्व जैसे रसूखदार शब्दों ने अपने अर्थ बदल लिये | त्याग , विश्वास , उम्मीद , उमंग , प्रगति , सुरक्षा , जैसे शब्द अंडरग्राउंड हो गये | न्याय , कानून , सत्ता , साहित्य , शिक्षा जैसे शब्दों ने होठ पर उंगली रख ली | शब्दों के समुद्र में भाषा के गोताखोरों ने पचासों बार डुबकी लगाईं लेकिन दोस्त शब्द मिला ही नही | मेरे को तो शंका हो रही है कि कही आदर , सत्कार , स्नेह और त्याग जैसे शब्दों ने सामूहिक रूप से आत्महत्या तो नहीं कर ली? 

देखते ही देखते शब्दकोश में खराब शब्दों का बोलबाला हो गया , सभी प्रमुख संस्थाओं पर खराब शब्दों का कब्जा हो गया | अच्छे शब्दों के भविष्य के बारे में खराब शब्द फ़ैसला करने लगे | अच्छे शब्द सहम गये वो समझ नहीं पा रहे थे कि उनसे गलती क्या हुई ? अगर अच्छे शब्द किसी बात का विरोध करते तो उनके बंगलो पर बुलडोज़र चला दिया जाता , उनके खिलाफ़ जांच समिति गठित कर दी जाती , उन्हें देशद्रोही घोषित कर जेल में डाल देते | देखते ही देखते शब्दों में दहशत पैदा हो गई , हो गई दूरियां मजबूरियाँ तन्हाइयां | हर शब्द संदिग्ध लगने लगा , शब्दों का शब्दों पर से विश्वास उठ गया | जितने भी प्रभावशाली और अर्थवान शब्द थे उन्हें सरकार ने निजी संस्थानों को बेच दिया | विचारवान शब्द दबे स्वर में एक दूसरे से पूछने लगे  – यदि वो शब्द लाभकारी थे तो इन्होने बेचा क्यों और हानिकारक थे तो उन्होंने खरीदा क्यों ? देखते ही देखते शब्दकोश के सैकड़ो शब्द सूखे तालाब पर बैठे हुए हंस हो गये | हो गया था वहां का हर शब्द एक टूटी कश्ती | सैकड़ो शब्दों को वहाँ बोरियां में भर का समुद्र में बहा दिया गया , यह देख कई शब्दों की आँखों में पानी भर आ आया था पर उससे जलते हुए मुल्क को बुझाया तो नहीं जा सकता था |

अब वहाँ भाषा का एक नया जादू इन दिनों देखने को मिल रहा था , शब्द कुछ लिखो या कहो तो उसका अर्थ कुछ पढ़ा और सुना जाता है | अब वाक्य के भावार्थ बदल गये है , क्या इसे भाषा में शब्दों का विद्रोह या भाषा का आधुनिक बोध या भाषा की क्रान्ति समझा और कहा जाये ? समझ नहीं आता यह भाषा की राजनीति है या राजनीति की भाषा है | अब वहाँ एक  शब्द लिखो तो भाषा में उसका जो अर्थ है वह तो गुम हो जाता है और एक नया अर्थ और दृश्य उभर कर आता है , जैसे अगर अच्छे दिन बोलो तो उसका अर्थ अब अच्छे दिन नहीं होता और उसके बदले में दृश्य रूप में एक शक्ल दिखाई देती है , खादी बोलो तो एक प्रकार का कपड़ा नहीं बल्कि एक प्रकार का चरित्र नज़र आता है | जांच लिखो तो एक सच्ची प्रक्रिया नज़र आनी चाहिये तो यहाँ पर एक झूठा परिणाम नज़र आता है | हास्य कहो तो फूहड़ता का बोध होता है , बीवी को बोलो कि मौसम कितना सुहाना है तो इसका अर्थ वह निकालती है कि आज फिर पीने का इरादा है क्या? 

एक बुज़ुर्ग पुलिस थाने में पहुचे और रिपोर्ट दर्ज करानी चाहि कि मेरे घर में से किसी ने सेवा शब्द का अपहरण कर लिया है| मैंने अपने बच्चो के अंदर अच्छे से तलाश किया पर सेवा का कही अता पता नहीं चल रहा है| किड्नेपर जितना पैसा मांगे मै देने को तैयार हूँ, बस सेवा को सही सलामत लाकर मेरे बच्चो के मन में डाल दो , सेवा के बिना मै जी नहीं पाउगा | फिर वह शख्स अखबार के दफ्तर गया और गुमशुदा का इश्तेहार दिया – प्रिय सेवा तुम जहां कही भी हो तुरंत लौट आओ | तुम्हारे बिना मेरी हालत बहुत खराब होती जा रही है| जिस किसी को भी सेवा मिले इस नम्बर पर सूचित करे | सूचना देने वाले को उचित ईनाम दिया जायेगा| 

देखते ही देखते शब्दकोश में बहुत बड़ा गड़बड़ घोटाला हो गया , अब जुलूस का मतलब भीड़ , भाषण का मतलब नौटंकी  , विरोध का मतलब हिंसा , प्यार का मतलब वासना ,नेता का मतलब अपराधी , टोपी का मतलब साम्प्रदायिकता , दाढी का मतलब मज़हब , अधिकारी का मतलब भ्रष्टाचारी , पार्टी का मतलब गैंग , मनोरंजन का मतलब बेशर्मी हो गया था | अब वहाँ एक नई साज़िश रची जाने लगी थी गीत लिखो तो उसे पैरोड़ी , निबंध को भाषण और व्यंग्य को हास्य कहा जाने लगा | पाठक भी क्या करे शब्द में से अर्थ तो संगीत में से ठुमरी की तरह गायब थे | पुलिस का मतलब झंझट और इंसाफ़ का अर्थ नाइंसाफ़ी मानने वाले उस वक्त में तात्कालिक रचनाये तो फिर भी लिखा जा रही थी लेकिन कालजयी रचना की संभावना ही मिट गई थी |

मैंने आरंभ में ही इसे असत्यकथा कहा है क्योकि शब्दकोश नामक देश का लिखा हुआ कोई इतिहास मौजूद नहीं है , हो सकता है तात्कालिक सरकार ने लिखने वालों को कैद कर उनका रचा साहित्य नष्ट कर दिया हो , यह बाते जो मैंने कही वह तो लोककथा की तरह एक पीढ़ी ने दूसरी पीढ़ी को कही और नानी – दादी की कहानी परंपरा के तहत यह मेरे तक पहुची और मैंने इसे आप तक पंहुचा दिया | कहते है शब्दकोश में गड़बड़ियां इतनी बढ़ी कि फिर वहाँ कुछ भी नियंत्रण में नहीं रहा और फिर एक दिन पृथ्वी पर से शब्दकोश नामक देश का आस्तित्व की मिट गया|

तो पाठको मै अब अपनी रचना खत्म करता हूँ और आपको धन्यवाद कहता हूँ कि आपने यह जानते हुए भी कि यह एक व्यंग्य है इसे पढ़ा क्योकि मौजूदा समय में व्यंग्य पढ़ना हिम्मत और साहस का काम है | या अल्लाह व्यंग्य के पाठको को सदा सलामत रखना , इनकी जान , माल और आन की रक्षा करना , बुरी नज़र वालों से इनकी हिफ़ाज़त करना|