breaking news New

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - सत्ता को अनुकूल मीडिया चाहिए

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - सत्ता को अनुकूल मीडिया चाहिए

- सुभाष मिश्र
सत्ता को हमेशा ठकुर सुहाती अच्छी लगती है। वह वही सुनना देखना चाहती है जो उसके अनुकूल हो। अधिकांश मीडिया जनता की आवाज के नाम पर किसी पुलिस रोजनामचे की तरह उसे जैसा बताया जाता है, वैसा दिखा, बता देता है। कोई इस बात की पड़ताल नहीं करता की सच क्या है। जो सच दिखायेगा, सच की पड़ताल करेगा उसे सजा मिलनी तय है।

कबीर का दोहा है -
सांच कहूं तो मारन धावै
झूठे जग पतियाना साधो ।
आप कोरोना का सच दिखाओगे। आप जलती हुई लाशों, नदी के किनारे बने बने श्मशानो, देश के भीतर हो रही बातों की जासूसी का कच्चा चिठ्टा उजागर करोगे तो आप सजा भी भुगतोगे। सत्ता का चरित्र हमेशा से ऐसा रहा है -
हक मांगोगे ज़ुबाँ कटेगी
सच लिखोगे हाथ कटेगा।
देश के बड़े मीडिया संस्थान पर हुई छापे की कार्यवाही तब की गई जब वह सत्ता के सुर से अलग सुर अलापने लगा। पूंजी के बढ़ते प्रभाव और सरकार पर बहुत तरह की निर्भरता के कारण मीडिया हाउस कदम-कदम पर समझौते को विवश रहते हैं। कभी मामला टीआरपी का होता है तो कभी सरकुलेशन का। सनसनी पैदा करने वाले मीडिया के इस दौर में जब कोई मीडिया समूह जनपक्ष धरता की बातें करेगा तो उसे उसकी कीमत चुकानी ही होगी।
दुष्यंत कुमार का एक शेर है-
जैसा जी चाहो बजाओ इस सभा में
हम नहीं हैं आज भी हम झुनझुने हैं।
सत्ता झुनझुना चाहती है। उसे नगाड़ा पसंद नहीं आता।

यह सच्चाई अब छिपी नही रह गयी है कि भारतीय मीडिया का एक बड़ा हिस्सा पिछले कुछ वर्षों से निर्लजता पूर्वक सत्ता का हिमायती रहा है और उसके रचे झूठ में बराबर का हिस्सेदार भी रहा है। गोदी मीडिया शब्द मीडिया की इसी वास्तविकता को व्यक्त करता है। लोकतंत्र में मीडिया की भूमिका सत्ता का गुणगान करने की नहीं, उस पर उंगली उठाने की होती है। यही उसकी सकारात्मक भूमिका है लेकिन सत्ता की नजऱ में उसका गुणगान करने वाला मीडिया सकारात्मक होता है, अपनी आलोचना को वह नकारात्मक पत्रकारिता करार देती है। मौजूदा दौर में सत्ता की ताक़त के आगे ज़्यादातर अखबारों ने झुकना मुनासिब समझा, लेकिन कुछ ऐसे भी थे, जिन्होंने सच्चाई को सामने लाने के लिए समझौता करने से इंकार किया। ऐसे अखबारों और मीडिया संस्थानों को, जो स्वाभाविक तौर पर अल्प संख्या में ही रह गये हैं, सत्ता की कोप दृष्टि का सामना करना पड़ रहा है। ज़ाहिर है,  भास्कर के दफ़्तरों पर आयकर के छापों को बदले की कार्रवाई के रूप में उचित ही देखा जा रहा है।

सत्ता के कोप का सामना उससे असहमत उन सामान्य नागरिकों को भी करना पड़ा है जिन्होंने मुखर होकर उसका विरोध किया। ऐसे लोगों में बुद्धिजीवी और सामाजिक कार्यकर्ता हैं जो झूठे आरोप गढ़कर जेलों में डाल दिये गये हैं। उनके पक्ष में आवाज़ उठाने वाले और नागरिक अधिकारों के हनन के विरुद्ध गिनती के अख़बार होंगे। दरअसल, खबरों का कारोबार भी सुविधानुसार किया जाता है। जब लगभग समूचा मीडिया जगत आत्मसमर्पण की मुद्रा में हो तब कुछ असुविधाजनक खबरें सरकार की नींद भले न उड़ाये, उसकी शान में गुस्ताखी तो ज़रूर कर सकती हैं। कोरोना की दूसरी लहर में गंगा किनारे की लाशों की तस्वीरें हों, या आक्सीजन की कमी से हुई दारुण मौतें, अगर वे सच्चाई बयान कर रही थीं तो सरकार को वह नागवार क्यों लगती थीं? दरअसल, इसके पीछे अपनी अकर्मण्यता जो छिपाने के लिये प्रत्याक्रमण करने की रणनीति काम कर रही थी। भास्कर पर पड़ा छापा इसी रणनीति के तहत है। सरकार को नागरिकों की सुरक्षा की बजाय छबि-प्रबंधन की चिंता ज़्यादा है। छबि-प्रबंधन में अड़ंगा आने पर प्रतिशोधात्मक कार्रवाई करना सरकार की फि़तरत बन गयी है।

राजनीतिक सफलता के लिए समाज का सब-कुछ दांव पर लगा देने में भी नहीं हिचकतीं। अपने क्षुद्र उद्देश्य की पूर्ति के लिए सबसे पहले मीडिया पर कब्ज़ा कर उसे पूरी तरह निर्विवेक और अबुद्धिवाद के हवाले कर दिया गया। दूसरे शब्दों में कहें तो मीडिया को अहर्निशझूठ और अर्धसत्य उगलने के यंत्र में तब्दील कर दिया। जनमत निर्माण करने में मीडिया की भूमिका और उसकी ताक़त का अनुमान तो मीडिया-अध्ययन के विशेषज्ञों ने बहुत पहले कर लिया था लेकिन भारतीय समाज में बड़े पैमाने पर पहली बार किसी राजनीतिक दल ने अपने एजेंडे को राष्ट्रव्यापी स्वीकृति दिलाने के लिए मीडिया का इस्तेमाल झूठ की प्रयोगशाला के उपकरण के रूप में किया। विडम्बना है कि इस प्रयत्न में स्वयं मीडिया की विश्वसनीयता पर भी प्रश्न उठता है लेकिन निर्बुद्धिका यदि अमोघ राजनीतिक अस्त्र के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा हो और उसमें कामयाबी भी हासिल हो रही हो तो विश्वसनीयता का सवाल आखिऱ कौन उठाएगा? उपभोक्ता में तब्दील होते पाठक, दर्शक को बाजार और सत्ता के झूठ को सच समझने के लिए विवश करने वाला मीडिया जब जनतांत्रिक मूल्यों की वकालत करेगा, तो उसका यह विद्रोही चरित्र सत्ता को कतई पसंद नही आयेगा।

आयकर विभाग दैनिक भास्कर ग्रुप पर आयकर विभाग के छापे को इसी नाराजी से जोड़कर देखा जा रहा है। आयकर विभाग की अपनी कार्यप्रणाली है जिसके तहत उसने यह छापा मारा है। इस समय सोशल मीडिया में यह मामला सार्वधिक चर्चा में है। लोग इस छापे के पीछे की कहानी अपने अपने ढंग से बयां कर रहे हैं। आयकर विभाग की यह छापेमारी कर चोरी के मामले में की गई है। नोएडा, जयपुर, भोपाल, इंदौर, मुंबई और पटना समेत देश के सभी जगहों पर स्थित ऑफिस में यह छापेमारी की गई है। दैनिक भास्कर ग्रुप का कहना है कि कोरोना में सरकार की खामियां बताने वाली खबरों के कारण सरकार ने ये दबिश डाली है। सरकार सच्ची पत्रकारिता से डर गई है और बदला ले रही है। भास्कर ने अपनी उन खबरों का स्क्रीनशॉट भी प्रकाशित किया है। जिनमें प्रमुख रुप से जो खबरें प्रकाशित की गई है उनमें जासूसी की दूसरी सूची में राहुल, प्रशांत किशोर और पूर्व चुनाव आयुक्त लवासा, भारत में जासूसी... पहली लिस्ट में 40 पत्रकार, 3 विपक्षी नेता, 2 मंत्री, 1 जज। नीती-वैक्सीन का 25 प्रतिशत कोटा निजी अस्पतालों का, हकीकत-निजी अस्पतालों के लिए 70 प्रतिशत से ज्यादा टीके इस्तेमाल नहीं हुए। राजस्थान के स्वास्थ्य मंत्री ने खबर को झूठ बताया, भास्कर के पास कचरे में पड़ी 500 वायल का फोटो इसका सबूत। सरकार ने 50 दिनों में जिन 25 जिलों में बताई 3912 कोरोना मौत उनके सिर्फ 512 गांव-ब्लॉक से उठी 14,482 अर्थियां। गंगा किनारे 1140 किलोमीटर में 2 हजार से ज्यादा शव। सरकार के मौतों के आंकड़े झूठे हैं, ये जलती चिताएं सच बोल रही हैं। 98241-27694.. यह नंबर इंजेक्शन सरकार सी.आर पाटील का है। घटे 16 लाख रोजगार..ऊपर से महंगाई की मार शामिल हैं।
सूचना एवं प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर ने कहा है कि एजेंसियां अपना काम करती हैं और उन पर हमारा कोई हस्तक्षेप नहीं होता है। छापे की कार्यवाही पर जो अलग-अलग प्रतिक्रियाएं आई हैं उनमें कांग्रेस के मुख्य प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने ट्वीट कर कहा है कि कितना और गला घोटेंगे मीडिया का? कितनी और दबिश मानेगा मीडिया? कब तक सच पर सत्ता की बेडिय़ां रहेंगी? दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने छापों को मीडिया को डराने की कोशिश बताते हुए मांग की कि ऐसी कार्रवाई तुरंत रुकनी चाहिए और मीडिया को स्वतंत्र तरीके से काम करने देना चाहिए। कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने पत्रकारिता पर मोदी शाह का प्रहार, मोदी शाह का एकमात्र हथियार आईटी, ईडी, सीबीआई। मुझे विश्वास है अग्रवाल बंधु डरेंगे नहीं। वहीं राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने छापों की आलोचना करते हुए इसे केंद्र सरकार द्वारा मीडिया को दबाने का प्रयास बताया।  

मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने कहा है कि मोदी सरकार में प्रजातंत्र के चौथे स्तंभ को दबाने का, सच को रोकने का काम शुरू से ही किया जा रहा है। अभी पेगासस जासूसी मामले में भी कई मीडिया संस्थान व उससे जुड़े लोग बड़ी संख्या में निशाने पर रहे हैं और अब सरकार की निरंतर पोल खोल रहे हैं।  
प्रसिद्घ वकील प्रशांत भूषण ने कहा है कि ये कार्रवाई मोदी सरकार के दौरान कोरोना से मौतें और जासूसी की खबर एक्सपोज करने के बाद की गई है। सरकार कितनी बेशर्म हो जाएगी? आज लोकतंत्र और अधिकारों का गला घोंटना निश्चित रूप से आपातकाल के दौरान से भी बदतर है।

वरिष्ठ पत्रकार अजीत अंजुम ने कहा है कि अगर आप सत्ता से सवाल करने वाली पत्रकारिता करते हैं तो सलाखों के पीछे जाने को भी तैयार रहें। छापे तो ट्रेलर हैं। अगर मोदी और शाह की सत्ता के सामने लोटने/ लेटने और उनकी भजन/आरती वाली पत्रकारिता कर रहे हैं तो मस्त रहिए। आप तय कर लीजिए कि क्या करना है।  मोदी सरकार मीडिया को दबाकर संदेश देना चाहती है कि यदि गोदी मीडिया नहीं बनेंगे तो आवाज कुचल दी जाएगी। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा है कि पत्रकारों और मीडिया घरानों पर हमला लोकतंत्र को कुचलने का एक और क्रूर प्रयास है।