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भरोसा ही खोलेगा सुधार की राह

भरोसा ही खोलेगा सुधार की राह


जयंतीलाल भंडारी

इस समय जब सरकार बैंकिंग सुधारों की डगर पर तेजी से आगे बढ़ रही है, तो बैंक कर्मियों के बीच प्रस्तावित सुधारों का विरोध भी बढ़ता नजर आ रहा है। बैंकों के निजीकरण के विरोध में 15 और 16 मार्च को राष्ट्रव्यापी बैंक हड़ताल रही। ऐसे में यह जरूरी है कि सरकार बैंकिंग सुधारों और बैंक कर्मचारियों के हितों के बीच तालमेल बिठाते हुए आगे बढ़े। हाल ही में फाइनेंस सेक्टर से जुड़े एक वेबिनार में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि सरकार बैंकिंग क्षेत्र को मजबूत, प्रतिस्पर्धी और जनहितैषी बनाने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने रेखांकित किया कि बैंकों द्वारा गैर-पारदर्शी तरीके से कर्ज दिए जाने की संस्कृति को समाप्त करके एनपीए की एक-एक पाई का लेखा-जोखा सामने लाना सरकार की नीति है।

बदलाव का परिदृश्य

देश में बैंकों की बदलती भूमिका के तीन परिदृश्य दिखाई दे रहे हैं- एक, निजी क्षेत्र के सभी बैंकों को सरकार से जुड़े विभिन्न कार्यों के लिए अनुमति देना, दो, छोटे और मझोले आकार के सरकारी बैंकों का चरणबद्ध निजीकरण करना और तीन, कुछ सरकारी बैंकों को मिलाकर बड़े मजबूत बैंक के रूप में स्थापित करना। पिछले महीने 24 फरवरी को वित्त मंत्रालय ने निजी क्षेत्र के सभी बैंकों को सरकार से जुड़े विभिन्न कार्यों जैसे कर संग्रह, पेंशन भुगतान आदि में हिस्सा लेने की अनुमति दे दी। अब तक निजी क्षेत्र के केवल कुछ बड़े बैंकों को ही सरकार से संबंधित कामकाज करने की अनुमति थी। स्वाभाविक ही इस फैसले से अर्थव्यवस्था के विकास और कल्याणकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में निजी बैंकों की भागीदारी बढ़ जाएगी।

याद रहे कि वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने 1 फरवरी को बजट प्रस्तुत करते हुए सरकारी बैंकों के निजीकरण की घोषणा की थी। उनके मुताबिक कुछ सरकारी बैंकों का निजीकरण अपरिहार्य है क्योंकि सरकार के पास पुनर्पूंजीकरण की राजकोषीय गुंजाइश नहीं है। इससे पहले पी जे नायक की अध्यक्षता वाली भारतीय रिजर्व बैंक की समिति भी सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को सरकार के नियंत्रण से बाहर निकालने की सिफारिश कर चुकी है। इसी सिलसिले में सरकार ने छोटे एवं मझोले आकार के चार सरकारी बैंकों को निजीकरण के लिए चिह्नित किया है। ये हैं- बैंक ऑफ महाराष्ट्र, बैंक ऑफ इंडिया, इंडियन ओवरसीज बैंक और सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया। इनमें से दो बैंकों का निजीकरण 1 अप्रैल से शुरू हो रहे वित्त वर्ष 2021-22 में किया जाएगा। कहा गया है कि जिन बैंकों का निजीकरण होने जा रहा है, उनके खाताधारकों को कोई नुकसान नहीं होगा। निजीकरण के बाद भी उन्हें सभी बैंकिंग सेवाएं पहले की तरह मिलती रहेंगी।

सच पूछा जाए तो यह महज एक शुरुआत है। यदि इन चार छोटे-मझोले बैंकों के निजीकरण में सरकार को सफलता मिल जाती है तो आगामी वर्षों में कुछ अन्य सरकारी बैंकों को भी निजी हाथों में सौंपने की प्रक्रिया शुरू की जा सकती है। यह भी उल्लेखनीय है कि सरकार निजीकरण के साथ-साथ चार बड़े मजबूत सरकारी बैंकों को आकार देने की रणनीति पर भी आगे बढ़ रही है। वर्ष 1991 में बैंकिंग सुधारों पर एमएल नरसिम्हन की अध्यक्षता में समिति का गठन हुआ था। इस समिति ने बड़े और मजबूत बैंकों की सिफारिश की थी। समिति ने कहा था कि देश में तीन-चार अंतरराष्ट्रीय स्तर के बड़े बैंक होने चाहिए। इस समिति की रिपोर्ट के परिप्रेक्ष्य में छोटे बैंकों को बड़े बैंक में मिलाने का फॉर्म्युला केंद्र सरकार पहले ही अपना चुकी है। सरकारी बैंकों की संख्या जो मार्च 2017 में 27 थी, वह अब घटकर 12 रह गई है। माना जा रहा है कि कल्याणकारी योजनाओं के संचालन में भूमिका होने के कारण देश में सरकारी बैंकों की मजबूती भी जरूरी है।

दूसरी ओर बैंकों का निजीकरण भी वक्त की जरूरत है। चूंकि सरकारी बैंकों के निजीकरण की डगर पर सरकार पहली बार आगे बढ़ी है, इसलिए इस बारे में स्पष्ट खाका पेश करना होगा। अपेक्षाकृत छोटे और मध्यम बैंकों के निजीकरण से शुरुआत करके हालात का जायजा लिया जा सकता है। हालांकि मजबूत सरकारी बैंकों के गठन की तुलना में बैंकों का निजीकरण अधिक कठिन काम है। सबसे पहले सरकार को रिजर्व बैंक के साथ विचार मंथन करके यह निर्धारित करना होगा कि बैंकों के निजीकरण के लिए संभावित खरीदारों की क्या पात्रता तय की जाए। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के कार्य समूह की इस अनुशंसा पर भी ध्यान देना होगा कि बड़े कॉर्पोरेट और औद्योगिक घरानों को खरीदार बनने की इजाजत दी जा सकती है।

बैंकों के निजीकरण के लिए सरकार को अगले वित्त वर्ष 2021-22 में शीघ्र शुरुआत करनी होगी क्योंकि पूरी प्रक्रिया में काफी समय लगेगा। इसके अलावा सरकार को परिचालन के कई मुद्दों पर भी विचार मंथन करना होगा। सरकार को तय करना होगा कि चयनित सरकारी बैंक में वह अपनी पूरी हिस्सेदारी बेचेगी या कुछ हिस्सेदारी अपने पास रखकर प्रबंधन का कार्य खरीदार को सौंपेगी। सरकार को कर्मचारियों के मसले से निपटने के लिए भी रणनीति बनानी होगी। सरकारी बैंकों में कर्मचारी बड़ी तादाद में हैं इसलिए निजीकरण के बाद खरीदार कर्मचारियों को किस तरह रोजगार में बनाए रखेगा, इसका भी विस्तृत खाका तैयार करना होगा। साथ ही सरकारी बैंकों के सफल निजीकरण के लिए परिचालन के मसलों को भी सरकार को प्रभावी ढंग से निपटाना होगा।

पुनर्पूंजीकरण की चुनौती

उम्मीद करें कि सरकार बैंकिंग सुधारों की डगर पर आगे बढऩे के साथ-साथ बैंक कर्मचारियों के हितों पर भी पर्याप्त ध्यान देगी। निजी क्षेत्र के बैंकों को सरकार से जुड़े कार्यों के लिए अनुमति देने से निजी क्षेत्र के बैंक भी सामाजिक क्षेत्र की पहल को आगे बढ़ाने में बराबर के भागीदार होंगे और देश के करोड़ों बैंक उपभोक्ताओं को इसका लाभ मिलेगा। छोटे और मध्यम आकार के सरकारी बैंकों का निजीकरण पुनर्पूंजीकरण की राजकोषीय चुनौतियों से जुड़ी चिंताओं को भी कम करेगा। निस्संदेह बैंकिंग सुधारों से देश के आम आदमी और उद्योग-कारोबार सहित संपूर्ण अर्थव्यवस्था को लाभ होगा।