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शहीद हेमु कालाणी की शहादत को याद किया सिंधी समाज ने, महापौर एजाज ढेबर भी पहुंचे, चौक पर स्थित प्रतिमा पर किया माल्यार्पण, अंग्रेजी सेना के हथियारों से भरी ट्रेन रोकने के प्रयास में हुई थी फांसी

शहीद हेमु कालाणी की शहादत को याद किया सिंधी समाज ने, महापौर एजाज ढेबर भी पहुंचे, चौक पर स्थित प्रतिमा पर किया माल्यार्पण, अंग्रेजी सेना के हथियारों से भरी ट्रेन रोकने के प्रयास में हुई थी फांसी

जनधारा समाचार
रायपुर. सिंधी समाज ने आज शहीद हेमु कालाणी जयंती समारोह आयोजित किया. इस अवसर पर महापौर एजाज ढेबर ने प्रतिमा स्थल पर पहुंचकर माल्यार्पण किया और कालाणी के बलिदान दिवस को याद किया.


सिंधु सूचना केंद्र कार्यक्रम का संयोजक था. कार्यक्रम की शुरूआत झण्डा वंदन से हुई. शहीद हेमु कालाणी चौक शास्त्री चौक के आगे, जेल रोड़ में स्थित है. यहीं पर झंडा वंदन व श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित हुआ. सभी वक्ताओं ने कालाणी के देश और समाज के प्रति योगदान को याद किया. हेमू कालाणी भारत के एक क्रान्तिकारी एवं स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी थे. अंग्रेजी शासन ने उन्हें फांसी पर लटका दिया था.

हेमू कालाणी सिन्ध के सख्खर में २३ मार्च सन् १९२३ को जन्मे थे. उनके पिताजी का नाम पेसूमल कालाणी एवं उनकी माँ का नाम जेठी बाई था. जब वे किशोर वयस्‍क अवस्‍था के थे तब उन्होंने अपने साथियों के साथ विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया और लोगों से स्वदेशी वस्तुओं का उपयोग करने का आग्रह किया। सन् १९४२ में जब महात्मा गांधी ने भारत छोड़ो आन्दोलन चलाया तो हेमू इसमें कूद पड़े। १९४२ में उन्हें यह गुप्त जानकारी मिली कि अंग्रेजी सेना हथियारों से भरी रेलगाड़ी रोहड़ी शहर से होकर गुजरेगी. हेमू कालाणी अपने साथियों के साथ रेल पटरी को अस्त व्यस्त करने की योजना बनाई। वे यह सब कार्य अत्यंत गुप्त तरीके से कर रहे थे पर फिर भी वहां पर तैनात पुलिस कर्मियों की नजर उनपर पड़ी और उन्होंने हेमू कालाणी को गिरफ्तार कर लिया और उनके बाकी साथी फरार हो गए।

हेमू कालाणी को कोर्ट ने फांसी की सजा सुनाई. उस समय के सिंध के गणमान्य लोगों ने एक पेटीशन दायर की और वायसराय से उनको फांसी की सजा ना देने की अपील की। वायसराय ने इस शर्त पर यह स्वीकार किया कि हेमू कालाणी अपने साथियों का नाम और पता बताये पर हेमू कालाणी ने यह शर्त अस्वीकार कर दी। २१ जनवरी १९४३ को उन्हें फांसी की सजा दी गई। जब फांसी से पहले उनसे आखरी इच्छा पूछी गई तो उन्होंने भारतवर्ष में फिर से जन्म लेने की इच्छा जाहिर की। इन्कलाब जिंदाबाद और भारत माता की जय की घोषणा के साथ उन्होंने फांसी को स्वीकार किया.

कार्यक्रम के संयोजक सिंधी समाज के प्रमुख नेता किशोर आहूजा, अनेश बजाज और दादा त्रिलोकचंद चिमनानी थे.