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छत्तीसगढ़ एक खोज, 32वीं कड़ी: हिंदी सिनेमा का नायाब सितारा : किशोर साहू - रमेश अनुपम

छत्तीसगढ़ एक खोज, 32वीं कड़ी: हिंदी सिनेमा का नायाब सितारा : किशोर साहू - रमेश अनुपम


किशोर साहू इससे पहले कांग्रेस के मार्च 1939 के त्रिपुरी कांग्रेस अधिवेशन में हिस्सा ले चुके थे। उस अधिवेशन के बारे में लिखते हुए उन्होंने कहा है ' उस समय गांधी और सुभाष चंद्र बोस दो नायक थे पर लोगों की नजरें पण्डित नेहरू से हटती नहीं थी। '

किशोर साहू त्रिपुरी अधिवेशन में तीन दिनों तक शामिल रहे। वे मात्र सिनेमाई नहीं थे बल्कि स्वाधीनता की चेतना से भरे हुए नौजवान भी थे। देश की राजनीति में उनकी गहरी दिलचस्पी थी।

इसलिए जाहिर है उन्होंने अपनी फिल्म ' वीर कुणाल ’ के उद्घाटन के लिए लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल को चुना।

पर मुश्किल यह थी कि जिस दिन (1 दिसंबर 1945) नावेल्टी थियेटर में ' वीर कुणाल ’ का उद्घाटन होना था, उसी दिन शाम को कलकत्ता में कांग्रेस की वर्किंग कमेटी की बैठक भी थी, जिसमें सरदार वल्लभ भाई पटेल को भी शामिल होना जरूरी था।

सरदार वल्लभ भाई पटेल ' वीर कुणाल ' के उद्घाटन में शरीक होना चाहते थे। किशोर साहू उन्हें भा गए थे। सो तय हुआ कि 1 दिसंबर को सरदार पटेल ' वीर कुणाल ’ का उद्घाटन करेंगे और मध्यांतर तक फिल्म देखने के बाद स्पेशल चार्टर प्लेन से कलकत्ता निकल जायेंगे।

बंबई कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष एस.के.पाटिल ने सरदार पटेल की इच्छा के अनुरूप ऐसा ही कार्यक्रम सुनिश्चित किया।


1 दिसंबर सन 1945 को नॉवेल्टी थियेटर बंबई में ' वीर कुणाल ' का शानदार प्रीमियर शो हुआ। सरदार वल्लभ भाई पटेल ने फिल्म से पहले भाषण दिया। अंग्रेजों को ललकारते हुए उन्होंने कहा : 

" जिस दिन विदेशी पूंजीपति हमारे देश में आकर स्टूडियो खोलने की कोशिश करेंगे, कांग्रेस पूरी ताकत के साथ उसका विरोध करेगी। '

भाषण के बाद सरदार पटेल मध्यांतर तक ' वीर कुणाल ’ देखते रहे, इसके बाद ही वे कलकत्ता की बैठक के लिए रवाना हुए।

' वीर कुणाल ’ ऐतिहासिक रूप से एक सफल फिल्म साबित हुई। 

6 जनवरी 1946 को किशोर साहू की सुपुत्री नयना का जन्म हुआ। नयना साहू जो बाद में उनकी फिल्म ' हरे कांच की चूड़ियां ’ की नायिका बनी।

इसके बाद किशोर साहू ने फिल्मिस्तान के बैनर तले ' सिंदूर ’ फिल्म का निर्देशन किया। नायक वे स्वयं थे नायिका थी शमीम। नायिका शमीम उस जमाने में एक फ्लॉप हीरोइन मानी जा रही थी। फिल्मिस्तान के निर्माता राय बहादुर चुन्नीलाल शमीम की जगह किसी दूसरी हीरोइन को इस फिल्म में लेना चाहते थे, पर किशोर साहू इसके पक्ष में नहीं थे। 

राय बहादुर चुन्नीलाल को लगा किशोर साहू उनकी बात न मानकर उनकी लुटिया डुबो देंगे। इसलिए उन्होंने इस फिल्म में पैसा लगाना बंद कर दिया और अपने प्रोडक्शन की दूसरी फिल्म ' शहनाई ’ जिसका निर्देशन प्यारे लाल संतोषी कर रहे थे में ज्यादा से ज्यादा पैसा लगाने लगे।


 ' सिंदूर ' 7 जून 1947 को रॉक्सी थियेटर में रिलीज हुई। यह फिल्म अद्भुत रूप से सफल रही। यह फिल्म 32 सप्ताह तक टॉकीज से नहीं उतरी। सिल्वर जुबली से भी आगे 7 सप्ताह ज्यादा चली। इस फिल्म को देखकर कई लोगों ने विधवा विवाह किया। ' शहनाई ’ फिल्म फ्लॉप फिल्म साबित हुई। 

राय बहादुर चुन्नीलाल ने प्यारेलाल संतोषी द्वारा निर्देशित फिल्म ' शहनाई ' के प्रचार-प्रसार में पानी की तरह पैसा बहाया था और पूरी बंबई नगरी को इस फिल्म के पोस्टर से पाट दिया था। जबकि ' सिंदूर ' के प्रचार-प्रसार में एक ढेला भी खर्च नहीं किया। राय बहादुर चुन्नीलाल को लग रहा था कि ' सिंदूर ' एक फ्लॉप फिल्म साबित होगी और ' शहनाई ' एक सुपर-डुपर हिट फिल्म। लेकिन हुआ ठीक इसके उल्टा ही।

किशोर साहू आगे की सोच रखने वाले एक प्रगतिशील और गंभीर फिल्म निर्देशक थे। वह जमाना ही कुछ और था, आज जैसी मसाला और फूहड़ फिल्मों का दौर नहीं था, सोद्देश्य फिल्मों का जमाना था।


यह था किशोर साहू की फिल्मों का जादू जो बीसवीं सदी के 30 और 40 के दशक में लोगों के सिर चढ़कर बोलता था। हिंदी सिनेमा के दर्शक और पूरी फिल्मी दुनिया किशोर साहू की फिल्मों की दीवानी हो चुकी थी। किशोर साहू तब तक हिंदी सिनेमा के आकाश में ध्रुव तारे की तरह चमकने लगे थे।

यह बात बहुत कम ही लोगों को मालूम है कि हिंदी सिनेमा के महान अभिनय सम्राट कहे जाने वाले ट्रेजडी किंग यूसुफ खान उर्फ दिलीप कुमार का फिल्मी कैरियर पचास के दशक में गर्दिश में था। 

' ज्वारभाटा ' ( सन 1944 ) और ' जुगनू ' ( सन 1947 ) जैसी फिल्में दिलीप कुमार के कैरियर में कुछ खास नहीं कर पाई थी। 


नए नवेले दिलीप कुमार की नैया मंझधार में हिचकोले खा रही थी।उस समय फिल्मी दुनिया में नए-नए आए हुए दिलीप कुमार को एक ऐसे प्रतिभाशाली निर्देशक की जरूरत थी जो उसके भीतर छिपी हुई अभिनय प्रतिभा को समझकर उसे एक नया जीवनदान दे सके।

दिलीप कुमार के ऐसे दुर्दिनों में ही उनके जीवन में किशोर साहू एक फरिश्ता बनकर आए। जिसके चलते दिलीप कुमार आजीवन किशोर साहू के मुरीद हो गए।

दिलीप साहब आजीवन किशोर साहू की यादों को अपने दिल में संजोए रहें।  

किशोर साहू द्वारा निर्मित और निर्देशित फिल्म ' नदिया के पार’ (सन 1948) दिलीप कुमार के लिए वरदान साबित हुई।


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