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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-सिमटते खेल मैदान, अब वर्चुअल हो रहे हैं खेल

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-सिमटते खेल मैदान, अब वर्चुअल हो रहे हैं खेल


जिस तरह ग्रामीण इलाकों में चारागाह, निस्तार की जमीनें अलग-अलग योजनाओं, कब्जाधारियों की भेंट चढ़ गई, उसी तरह शहरी क्षेत्र के खेल मैदान भी धीरे-धीरे सिमटने लगे हैं। गैजेट के साथ फेमिलियर से गेम बच्चे अब मैदान में नहीं अपनी स्क्रीन पर वर्चुअल दोस्तों, ऐप के जरिये गेम खेल रहे हैं जो बहुत ही हिंसक और मानवीय संवेदना को नष्ट करने वाले हैं। सीबीएसई और छत्तीसगढ़ बोर्ड द्वारा स्कूलों को दी जाने वाली मान्यता में चाहे मैदान की अनिवार्यता क्यों ना हो, अधिकांश स्कूलों में खेल मैदान नदारद हैं। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वर्ष 2019 में अपने एक फैसले में साफ-साफ कहा है कि जिन स्कूलों में खेल का मैदान नहीं है, उनको मान्यता और ग्रांट न दिया जाये। कोर्ट ने स्कूलों में खेल मैदान, पेड़ लगाने का स्थान आदि भी निर्धारित करने कहा है।

कोरोना लॉकडाउन के चलते बंद स्कूलों द्वारा अपने छात्र-छात्राओं से वसूली जाने वाली फीस पर अभिभावकों की शिकायत के आधार पर स्कूल शिक्षा विभाग ने फीस वसूली पर रोक लगाई थी जिसके विरूद्ध प्रायवेट स्कूल हाईकोर्ट गये थे। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने स्कूलों को केवल ट्यूशन फीस लेने की अनुमति दी है। अधिकांश निजी स्कूल अपने छात्र-छात्राओं से कई तरह की फीस वसूलते हैं। कोर्ट ने ट्यूशन फीस के अलावा अन्य फीस लेने पर कार्यवाही करने की बात कही है।

गायब होते बच्चों के खेल के मैदान-हमारे बचपन को जऱा याद कीजिये। घर के आजू-बाजू में सौ मीटर की दूरी पर खेल के बड़े-बड़े मैदान हुआ करते थे। शाम को स्कूल से आते ही मैदानों में पहुंचने की जल्दी हुआ करती थी। पिठ्ठू, गिल्ली डंडा से लेकर फुटबाल और क्रिकेट तक के खेल इन मैदानों में हुआ करते थे, जो बॉल गुमायेगा वही वापस लाएगा। बॉल गुम जाने पर गुमाने वाला ही नई खरीदकर लाएगा। ये सब नियम होते थे। खेल के ये मैदान बच्चों के लिए बड़ी महत्वपूर्ण जगह होती थी। जिम का नामोनिशान नहीं था और जिम के कसरत की पूर्ति ये मैदान प्राकृतिक रूप से करते थे। आज खेलों के मैदान गायब होते जा रहे हैं। इसके पीछे कोई एक कारण नहीं छुपा है। गगनचुम्बी इमारतों और शॉपिंग मॉल्स की संस्कृति विकास की पहचान बन गई है। सरकारों का ध्यान विकास के नाम पर शहरों के आधुनिकीकरण पर चला गया। स्मार्ट सिटी के प्रोजेक्ट्स में बच्चों के खेलने के नाम पर मैदानों को विकसित करने की जगह क्लब हाउस और स्पोट्र्स क्लब को बढ़ावा दिया जा रहा है। नई विकसित होती कॉलोनियों में भी क्लब हाउस और उद्यान बनाये जाते हैं। खेल मैदान के अभाव और अपनी कथित व्यस्तता के चलते माता-पिता ने वीडियो गेम्स, मोबाइल गेम्स, पी एस-4 और वर्चुअल प्लेटफॉर्म को बढ़ावा दे दिया है।

जहां तक खेल गतिविधियों और खेल मैदान का सवाल है। अधिकांश सरकारी स्कूलों में खेल के मैदान नहीं है। यदि कहीं पर मैदान हैं भी तो वहां बाउंड्रीवाल नहीं है, या फिर खेल मैदानों में अन्य गतिविधियां संचालित हैं। खेल गतिविधियों के अभाव में ऐसे बच्चे जो खिलाड़ी बनना चाहते हैं, वे खेल नहीं पाते।
सीबीएसई एफिलेटेड स्कूलों के लिए
अनिवार्य मानक के अनुसार
(1) शहरी क्षेत्र के लिए :- कम से कम 1 एकड़ जमीन होना जरुरी है जिसमें भवन एवँ खेल हेतु मैदान शामिल है।
(2) अध्य्यन हेतु कक्ष आकार कम से कम 400 वर्गफुट।
(3) अलग अलग विषयों के प्रयोग शाला कक्ष आकार 500 वर्गफुट।
(4) लाइब्रेरी कक्ष आकार 1500 वर्गफुट।
(5) लड़के, लड़कियों के लिए अलग-अलग टॉयलेट अनिवार्य है।
ग्रामीण क्षेत्र के लिए ढाई एकड़ जमीन के साथ ये सब अनिवार्य है।

यदि हम खेल मैदान के संबंध में राजधानी रायपुर का ही उदाहरण लें तो हमें मालूम पड़ेगा कि अधिकांश सरकारी स्कूलों में खेल गतिविधियों को पहले से ही ग्रहण लगा हुआ है। कोरोना के चलते जब स्कूल बंद हैं तो खेल गतिविधियों के होने का सवाल ही नहीं उठता। स्कूली छात्र-छात्राओं के पास ऑनलाइन पढ़ाई के लिए गैजेट हैं, उससे वे दिनभर बहुत तरह के खेल स्क्रीन पर खेल रहे हैं। ऐतिहासिक बूढ़ातालाब यानी विवेकानंद सरोवर के सौंदर्यीकरण के नाम पर दो स्कूलो के मैदान कम किये गये। आधा दर्जन से अधिक सरकारी स्कूलों व तीन दर्जन से अधिक निजी स्कूलों में खेल की स्थिति लगभग खत्म होने को है। निजी स्कूल संचालकों द्वारा स्कूल में खेल मैदान, स्वीमिंग पुल, कंम्प्यूटर लैब, सहित सभी प्रकार की गतिविधियां चलने की बात कहकर मोटी फीस वसूल कर प्रवेश दिया जाता है। सरकारी स्कूलों में खेलों के लिए बजट नहीं के बराबर होता है। स्वीकृत बजट से किसी भी एक खेल का सामान जुटा पाना कठिन होता है। शहर में दर्जनों से अधिक प्राइवेट स्कूल में से एक-दो को छोड़ दिया जाए तो एक अदद खेल मैदान भी नहीं है। ऐसी जगहों पर शासकीय स्तर की केवल खो-खो, कबड्डी, बॉलीवाल आदि की प्रतियोगिताएं ही संभव है। शहर के बीचों-बीच स्थित गॉस मेमोरियल मैदान को भी बहुत तरह की गतिविधियों के लिए किराये पर दिया जाता है। लाखे नगर चौक स्थित हिंद स्पोर्टिंग मैदान एक समय में फुटबाल खिलाडिय़ों का सबसे खास मैदान हुआ करता था, लेकिन अब मैदान की हालत काफी दयनीय हो चुकी है। राजधानी के हृदय स्थल पर नेताजी सुभाष स्टेडियम काफी पुराना खेल मैदान है। यह हॉकी का मैदान हुआ करता था। यहां एक से बढ़कर एक मुकाबले खेले जाते थे। फुटबॉल के मैच हुआ करते थे। यहां से कई खिलाड़ी राष्ट्रीय स्तर पर पहुंचे और अलग पहचान बनाई। वर्ष 2018 में नगर निगम ने लगभग 15 करोड़ की लागत से सुभाष स्टेडियम का नवनिर्माण किया। बड़ी बिल्डिंग तैयार की गई। अब ग्राउंड इतना छोटा हो गया है कि हॉकी, फुटबॉल के मैच नहीं खेले जा सकते। यहां केवल कुश्ती प्रतियोगिता ही करवाई जा सकती है। यहां दुकानें भी बनाई गई है, लेकिन कोई लेने वाला नहीं है। अब इस मैदान का उपयोग लगभग न के बराबर है। पहले जेएन पांडेय स्कूल का मैदान काफी बड़ा हुआ करता था, लेकिन सड़क चौड़ीकरण के नाम पर उसका दायरा कम कर दिया गया। गंज मैदान, यह काफी पुराना मैदान है, लेकिन अब इसका अस्तित्व खत्म हो गया है। गांधी मैदान, यह मैदान अब पार्किंग में तब्दील हो गया है। फुटबॉल ग्राउंड, यह ग्राउंड धरना स्थल बन गया है। पुलिस लाइन मैदान, यहां स्कूल बना दिया गया है। जेआर दानी स्कूल मैदान, यह काफी बड़ा हुआ करता था। यहां एक साथ फुटबॉल के दो-दो मैच आसानी से हो जाया करते थे, लेकिन अब दायरा सिमट गया है। साइंस कॉलेज मैदान, यह काफी बड़ा है, लेकिन खेल के लिए कोई उपयोग नहीं हो रहा है। बी टी आई मैदान खेल के कम बाकी गतिविधियों के ज्यादा काम आता है। न्यूशांति नगर स्कूल मैदान, चौड़ीकरण के नाम बलि चढ़ गई। अमूमन, हर शहर में खेल मैदानों का यही हाल है। अब बच्चे अलग-अलग खेल एकेडमी या क्लबों में जाकर थोड़ी बहुत खेल गतिविधियों में हिस्सा ले पा रहे हैं। धीरे-धीरे सिमटते खेल मैदानों की तरह ही गरीब बच्चों के लिए खेल के अवसर भी खेल गतिविधियां भी सिमटती जा रही हैं। खेल संगठनों पर ऐसे लोगो का कब्जा है जिन्होने कभी भी उस खेल को नहीं खेला। हमारे देश में अधिकांश खेल संधो में वे लोग हैं जो राजनीति में हैं या जिनके पास पैसा, पहुंच है। जो लोग मैदान में नहीं खेल सकते वे बाहर बड़े-बड़े खेल, खेल रहे हैं और सही खिलाड़ी रिटायर्ड हर्ट होकर मैदान से बाहर हैं।