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किसान आंदोलन वाया बारहसिंगों की लड़ाई - डॉ राजाराम त्रिपाठी

किसान आंदोलन वाया बारहसिंगों की लड़ाई  - डॉ राजाराम त्रिपाठी


 सितंबर 2020 के तीसरे हफ्ते में एक साथ आई दो खबरों पर जरा गौर करिएगा :

*एक : तीनों किसान बिल संसद में पारित ,नए कृषि कानूनों को लेकर सरकार और किसान संगठन आमने-सामने,*

तथा

*दो : "दो नर बारहसिंगा आपस में भिड़े, लड़ाई में दोनों की हुई दुखद मौत " (खबर 21 सितंबर 2020, गांव अघईया थाना: निगोहां थाना लखनऊ उप्र)*

 हालांकि उपरोक्त दोनों खबरों के संदर्भ और निहितार्थ बिल्कुल ही अलग-अलग हैं, पर उनमें एक अद्भुत किंतु दुखद साम्यता भी है। जिस तरह जब दो गर्वीले नर बारहसिंगा अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने भिड़ते हैं, तो कई बार यह लड़ाई किसी एक की मौत के साथ ही खत्म होती हैं। देश का किसान और वर्तमान केन्द्र सरकार दोनों ठीक ही सींग अब उलझ गए प्रतीत होते हैं। पर कोई भी समझदार पक्ष  इस दुर्भाग्यपूर्ण लड़ाई का अंत उपरोक्त बारहसिंगों की लड़ाई की तरह का दुखद अंत  कोई नहीं चाहेगा। जंगल का यह कानून आज के सभ्य समाज में विशेषकर लोकतंत्र में तो बिल्कुल ही लागू नहीं होते और ना ही इन्हें लागू किया जाना चाहिए।

   बिना मांगे और बिना किसानों से चर्चा किए ,उन पर थोपे जा रहे, तीनों किसान बिलों को लेकर अधिकांश किसान संगठनों ने शुरू से ही विरोध जताया था। अखिल भारतीय किसान महासंघ (आईफा) ने तो 5 जून 2020 को जब यह कृषि कानून अध्यादेश की शक्ल में ताबड़तोड़ लाए गए थे, तभी देश में सर्वप्रथम 24 घंटे के भीतर ही इन कानूनों के तथाकथित लाभकारी प्रावधानों का पोस्टमार्टम कर इनकी बिंदुवार खामियां गिनाते हुए, इन्हें पूरी तरह से कारपोरेट के पक्ष में गढ़ा हुआ बताया था तथा इन नामुराद कानूनों के बजाय न्यूनतम समर्थन मूल्य पर बाध्यकारी क़ानून लाने की सलाह दी थी, साथ ही इन तीनों कानूनों पर अपना प्रबल विरोध भी  दर्ज कराते हुए इनमें जरूरी संशोधन हेतु सुझाव भी दिए थे। पर जैसा कि पूरा देश देख ही रहा है कि अपने दूसरे कार्यकाल में पूर्ण बहुमत के मद में चूर यह सरकार  किसी भी समस्या पर बातचीत कर समस्या के हल निकालने के लोकतांत्रिक तरीकों पर विश्वास रखने वाली साबित नहीं हुई है। इसलिए किसान संगठनों के विरोध तथा उनके सुझावों को सरकार ने नाक पर बैठी मक्खी की तरह हवा में उड़ा दिया। किसानों में न्यूनतम समर्थन मूल्य भी न मिल पाने और खेती में लगातार बढ़ते घाटे तथा नाना प्रकार की परेशानियों को लेकर असंतोष तो लंबे समय से सुलग ही रहा था, पर ज्यादातर किसान संगठन तब जागे जब पिछले सितंबर के तीसरे हफ्ते में येन केन प्रकारेण इन बिलों को सरकार ने संसद में भी पारित करवा लिया। अब तक किसानों की समस्याओं तथा इन कृषि कानूनों को लेकर कान लपेटे सो रही राजनीतिक पार्टियां की भी नींद की खुमारी भी कुछ टूटी,अब उन्होंने भी इस विरोध को हवा दी। तत्कालीन 5 प्रदेशों के चुनाव में भी किसानों के असंतोष को भुनाने के लिए अलग अलग राजनीतिक पार्टियों ने अलग अलग तरीके से इसमें अपनी भूमिका निभाई,(आने वाले दिनों में संपन्न होने वाले दो बड़े प्रदेशों के चुनाव को लेकर भी इन दलों की शतरंज की बाजियां बिछी हुई हैं जिनमें  किसान असंतोष व किसान संगठन भी प्रमुख मोहरे बनाए जा रहे हैं) । आईफा ने भी इस दरम्यान सरकार को इसके समाधान हेतु पत्र लिखे पर मदमत्त सरकार के कानों पर जूं नहीं रेंगना था सो सारे पत्र और सुझाव पुनः डस्टबिन के हवाले हो गए। असली जमीनी विरोध तब शुरू हुआ जब दिल्ली के निकटवर्ती पंजाब हरियाणा तथा पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान नवंबर के अंतिम हफ्ते में दिल्ली की सीमाओं पर डट गए। विनाश काले विपरीत बुद्धि, सरकार की अब भी  किसान संगठनों के साथ बात करने के बजाए उन पर लाठी-डंडे तथा वाटर केनन की बौछारें कर दी, सड़कें आदि खोदकर,खीले गाड़कर अभूतपूर्व दमन चक्र के जरिए किसानों के असंतोष की आग में घी डालने का काम ही किया। एक जन आंदोलन को तोड़कर समाप्त करने के लिए इतनी हिकमतें और तिकड़में लगाई जा सकती हैं, सरकार ने लगभग सभी को आजमाया। आगे सरकार तथा किसान संगठनों की 11 दौर की  निरर्थक वार्ताएं तो बस बग्गी के घोड़े के आगे गाजर लटका कर बग्गी दौड़ाने की व्यथा कथा मात्र है। सरकार की हठधर्मिता तो मूर्खता की सीमा रेखा को कब की पार कर ही चुकी है,पर बारह दौर की वार्ताओं में सम्मिलित होने के बावजूद देश के किसानों के लिए कोई भी सार्थक परिणाम निकाल पाने में असमर्थ रहने के लिए चुनिंदा किसान संगठनों भी निश्चित रूप से कटघरे में खड़े किए जाएंगे, क्योंकि इतिहास के शब्दकोश में माफी नामक शब्द होता ही नहीं। किसान संगठनों ने वार्ता में केवल दिल्ली सीमा पर पहुंचे किसान संगठनों को ही सम्मिलित करते हुए किसान संगठनों के महासंघ आईफा सहित देश के अन्य अधिकांश महत्वपूर्ण किसान संगठनों को जानबूझकर दरकिनार करते हुए वार्ता में सरकार के सन्मुखअपने महत्व व क्षमता को न केवल सीमित किया बल्कि देश के किसानों के बहुत बड़े वर्ग का जरूरी सक्रिय समर्थन भी खो दिया। एक सही मुद्दे पर 8 महीने की लगातार जद्दोजहद के बावजूद आज भी किसान आंदोलन अगर संपूर्ण जन आंदोलन में नहीं बदल पाया है, तो इसके पीछे सरकार की किसी कारगर रणनीति के बजाय इसे दिल्ली मोर्चे पर बैठे चुनिंदा किसान नेताओं की अदूरदर्शिता,अहंकार,निहित स्वार्थों के तहत देश के अन्य बहुसंख्य संगठनों को मुख्य परिदृश्य से दरकिनार रखने की क्षुद्र सोच भी जिम्मेदार मानी जाएगी।


   उल्लेखनीय है कि जब यह अध्यादेश लाए गए थे तो ज्यादातर किसान संगठनों ने सरकार की मंशा पर भरोसा करते हुए उन्हें किसानों के हित में ही समझा था। यहां तक कि, सरकारी फुलपेजिया विज्ञापनों से भ्रमित होकर आज आंदोलन रत किसान संगठनों में से कुछेक ने तो इन कानूनों का स्वागत तक कर दिया था,तब आइफा के राष्ट्रीय संयोजक डॉ राजाराम त्रिपाठी ने पहल करते हुए देश के प्रमुख किसान संगठनों की एक बैठक बुलाकर इन किसान कानूनों की बिंदुवार तार्किक व्याख्या करते हुए इनकी गंभीर खामियों की ओर सभी किसान संगठनों का ध्यान आकर्षित किया था , उसी की परिणति वर्तमान किसान आंदोलन के रूप में हम देख रहे हैं। इसीलिए कुछ किसान संगठनों ने दबे स्वर में तो कुछ ने मुखर स्वर में आईफा के राष्ट्रीय संयोजक राजाराम त्रिपाठी तथा कुछ अन्य वरिष्ठ किसान नेताओं को भी किसान संगठनों और सरकार की वार्ता में अनिवार्य रूप से सम्मिलित करने का सुझाव दिया था। पर दिल्ली बार्डर के किसान संगठनों ने अपने 40-41 सदस्यों के कोर ग्रुप के अलावा अन्य किसी भी किसान नेता को इसमें शामिल करने में गहन अनिच्छा प्रदर्शित की । उल्लेखनीय है कि इसी सरकार के पिछले कार्यकाल में जब विवादास्पद "भूमि अधिग्रहण बिल" लाया गया था तो भी वार्ताओं में तर्कपूर्ण ढंग से सरकार को समझाकर, निरुत्तर कर उसे वापस करवाने में अन्य किसान नेताओं के साथ ही डॉ राजाराम त्रिपाठी (आईफा) की भी बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका थी जिससे पूरा देश विशेषकर किसान तथा किसान संगठन भली-भांति परिचित हैं। किंतु संयुक्त किसान मोर्चे के कोर ग्रुप का रवैया तो कुछ यूं ही रहा मानो इनकी 40अथवा 41 थालियां लग गई हैं और अब यदि किसी भी अतिरिक्त व्यक्ति की थाली और लगेगी तो, इन बेचारों की प्लेट से भोजन की  मात्रा कुछ कम हो जाएगी, जो कि इन्हें बर्दाश्त नहीं। दूसरी ओर किसान आंदोलन के कंधों पर सवार होकर राज्यों तथा केंद्र की सत्ता की कुर्सियों तक काबिल होने की संभावना को देखते हुए अन्य सभी राजनीतिक पार्टियों ने भी अपने-अपने घोड़े खोल दिए हैं। निश्चित रूप से यदि सरकार तथा किसानों के बीच कोई  समाधान परक समझौता हो जाताता है तो,  इससे विपक्षी राजनीतिक पार्टियों की आगे की राजनीतिक योजनाओं के उबलते दूध में खटाई पड़ जाएगी,जो कि ये राजनीतिक पार्टियां कभी नहीं चाहेंगी। कुल मिलाकर हालात कुछ यूं बन रहे हैं, कि इस सरकार ने इन तीनों कृषि कानूनों के वापस लेने के सवाल  को मानो अपने मूंछ के बाल का सवाल बना लिया है। इन कृषि कानूनों को वापस लेने में सरकार की एक दुविधा यह भी हो सकती है कि, यदि इन कृषि बिलों को वापस ले लिया जाता है तो इससे पूर्व पारित अन्य विवादास्पद कानूनों को भी वापस लेने की मांग जोर पकड़ सकती है। जबकि सरकार के अहंकारी सोच व अड़ियल रवैए तथा उक्त तथ्यहीन आशंका दोनों को ही उचित नहीं कहा जा सकता। कोढ़ में खाज की तरह विपक्षी राजनीतिक पार्टियां आगामी राज्यों के तथा केंद्र के चुनावों तक यह कभी नहीं चाहेंगे कि इस मुद्दे का कोई ऐसा सर्वमान्य समाधान  निकल आए जिससे कि किसान भी संतुष्ट हो जाए और सरकार का सम्मान भी बच जाए। क्योंकि सीधे-सीधे इससे वर्तमान सरकार के वोटों में सीधा इजाफा होगा, और विपक्षी पार्टियां जो पहले ही लगभग मूर्छित पड़ी हैं, उनमें पुनः प्राण तथा उर्जा फूंक कर उन्हें सत्ता सुंदरी तक पहुंचाने में सक्षम,उनके हाथ अनायास लगा किसान आंदोलन व असंतोष का यह एकमात्र "अमोघ  ब्रम्हास्त्र " भी निकल जाएगा। और किसान आंदोलन के स्पष्ट फायदे को देख समझ रही यह पार्टियां भी ऐसा कभी नहीं चाहेंगी, यह तो तय है। ऐसी दशा में मोर्चे पर बैठे अपने किसान संगठनों का हौसला व ताकत बढ़ाते हुए,देश के अन्य सभी किसान संगठनों तथा उसके नेतृत्व को इन मुद्दों पर सार्थक तथा सकारात्मक हल निकालने हेतु एक सार्थक पहल करनी ही होगी। बातचीत कर समस्याओं का कारगर हल निकालना लोकतंत्र का एक उजाला पक्ष रहा है। लोकतंत्र में सरकार तथा जनपक्ष की लड़ाई का अंत "जंगल कानून" के तहत उपर दी गई खबर के दोनों ही बारहसिंगों की दुखद मौत के गैरजरूरी निर्णय के लिए जगह नहीं है। पर जाने अंजाने में यह दुविधाग्रस्त सरकार और सुविचारित योजना के तहत कुछ स्वार्थी घटक दोनों इसे उसी दिशा की ओर खींचे लिए जा रहे हैैं, जिसकी अंतिम परिणीति ना तो सरकार के लिए हितकारी होगा, ना किसानों के लिए,और ना ही देश के लिए।

     वर्तमान किसान व सरकार के टकराव के समाधान की अगर बात करें तो, यूं तो वर्तमान में किसानों की भिन्न-भिन्न प्रकृति की बेशुमार तथा बहुस्तरीय समस्याएं हैं, पर वर्तमान सबसे बड़ी समस्या किसानों को उनकी कड़ी मेहनत और अपार जोखिम के बाद उगाए गए कृषि उत्पादों का वाजिब मूल्य न मिल पाना है। 'कृषि मूल्य तथा लागत आयोग' (CACP) हर साल मूल्य नीति रिपोर्ट के रूप में कुछ प्रमुख फसलों का आधे अधूरे त्रुटिपूर्ण आंकड़ो के आधार पर न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करती है सरकार को यह मूल्य अपनी अबाध्यकारी सिफारिश के रूप में प्रस्तुत करती है। यह न्यूनतम समर्थन मूल्य वास्तविकता में  प्रायः न्यूनतम लागत से भी कम तथा अन्यायकारी होता है। कोढ़ में खाज तो यह है कि, इस तथाकथित "न्यूनतम समर्थन मूल्य" पर भी सरकारें केवल  कुछ चुनिंदा उत्पाद, लगभग बाइस जिन्स ही खरीद पाती हैं, वह भी सकल उत्पादन का केवल 7 से 10  प्रतिशत मात्र । देश के किसानों का इन जिन्सों का शेष 90 प्रतिशत तथा अन्य सभी कृषि उत्पादों की 100% यानी कि शत प्रतिशत मात्रा की खरीदी हेतु निरीह किसानों को देश के निजी व्यापारियों की खुली लूट के लिए बाजार के रहमो करम पर छोड़ दिया जाता है। सुनने में यह कड़वा लग सकता है पर हकीकत यही है कि, किसान और बाजार का रिश्ता कसाई और गोश्त का बन गया है। यह कसाई बाजार एकजुट होकर किसान को जितना ज्यादा काटता है व्यापारियों का मुनाफा उतना ही बढता है। यह घृणित अन्यायकारी समीकरण बदलकर इसे किसान तथा व्यापारी दोनों के लिए सम हितकारी बनाया जाना अब बेहद जरूरी हो गया है। किसानों को  यदि स्वामीनाथन कमेटी की मंशा और अनुशंसा के अनुरूप सही रूप से कृषि लागत की गणना कर, उस पर 50% लाभ जोड़कर, समुचित न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारण करते हुए, उनके समस्त कृषि उत्पादों को इस उचित "न्यूनतम समर्थन मूल्य" की दर पर खरीदी हेतु "बाध्यकारी सक्षम क़ानून" लाकर उसे सख्ती से लागू करवाया जाता है तो, इससे एकबारगी ही किसानों की कई समस्याएं हल हो सकती हैं। अतः सरकार और देश के किसान संगठनों की पहली प्राथमिकता  हर हाल में " उचित न्यूनतम समर्थन मूल्य" पर असरदार बाध्यकारी क़ानून लाने को लेकर होनी चाहिए। तीनों कानूनों को लेकर   दिल्ली मोर्चे पर बैठे किसान संगठनों के साथ ही देश के अन्य सभी जिम्मेदार किसान संगठन जो अभी भी नदी के सुरक्षित किनारों पर खड़े होकर इस विनाशकारी बाढ़ का अवलोकन कर रहे हैं, उन्हें ध्यान रखना होगा कि “समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याघ्र, जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध” (रामधारी सिंह दिनकर)। इसलिए इनको भी दुविधा छोड़ कर अब आगे आना चाहिए तथा सरकार तथा अपने साथी आंदोलन पर बैठे किसान संगठनों से सीधी वार्ता कर सकारात्मक समाधान हेतु पहल करनी चाहिए। दिल्ली बार्डर की 40 सदस्यीय कोर कमेटी को भी अपने दिमाग की खिड़की दरवाजे खुले रखकर सकारात्मक अग्रगामी निर्णय लेने होंगे, क्योंकि कृषक आंदोलन के इतिहास में इनकी भूमिका को लेकर पूरा एक पन्ना अभी लिखा जाना शेष है। सरकार को भी दीवार पर लिखी इबारत को पढ़ना आना चाहिए और अगर ये आगे भी सत्ता चाहते हैं तो अपनी पार्टी के भविष्य तथा देश के हित में अहंकार तथा अन्य व्यामोह से ऊपर उठकर, सभी तरह के किसान संगठनों से तत्काल वार्ता कर कृषि एवं किसानों के दूरगामी व्यापक हितों के अनुरूप, तत्काल समुचित सकारात्मक निर्णय लेना चाहिए। यही इस देश में गलत कृषि नीतियों के कारण अब तक आत्महत्या कर अपनी जान न्योछावर कर चुके लगभग तीन लाख से ज्यादा अभागे किसानों एवं इस किसान आंदोलन में शहीद होने वाले सैकड़ों किसानों को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

(लेखक अखिल भारतीय किसान महासंघ (आईफा) राष्ट्रीय संयोजक हैं)