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छत्तीसगढ़ हम सबकी आंखों का एक हसीन ख्वाबगाह

छत्तीसगढ़ हम सबकी आंखों का एक हसीन ख्वाबगाह

रमेश अनुपम

छत्तीसगढ़ हम सबके सपनों का एक खूबसूरत घरौंदा है। यह छोटा सा, सुंदर सा, छत्तीसगढ़ हम सबकी आंखों का एक हसीन ख्वाबगाह है। सुरम्य पहाड़ियों, घने जंगलों और छोटी-बड़ी, इठलाती-बलखाती हुई नदियों से घिरा हुआ यह अतुलनीय छत्तीसगढ़ अकूत खनिज संपदाओं से भरा-पूरा एक समृध्द प्रदेश है। कभी महाकोसल, तो कभी कोसल के नाम से जाना जाने वाला यह अंचल अपने छत्तीस-गढ़ों ( किलों ) के कारण आज छत्तीसगढ़ राज्य के रूप में पहचाना जाता है। 

1 नवम्बर सन् 2000 को भारत गणराज्य के छब्बीसवें राज्य के रूप में अस्तित्व में आने वाला छत्तीसगढ़ राज्य अपने विरासत में अनेक दुर्लभ प्रसंगों और इतिहासों को संजोए हुए है। संत घासीदास जैसे संत से लेकर वीर नारायण सिंह, गुण्डाधुर, सुंदरलाल शर्मा, खूबचंद बघेल, वामनराव लाखे, ठाकुर प्यारेलाल सिंह, डाॅ. ई राघवेन्द्र राव, बैरिस्टर छेदीलाल, घनश्याम सिंह गुप्त, पं. रविशंकर शुक्ल इसी मिट्टी की कोख में जन्म लेने वाले महान देशभक्त तथा स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। 

इसी प्रकार माधवराव सप्रे, ठाकुर जगमोहन सिंह, पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, जगन्नाथ प्रसाद ’ भानु ’, बाबू रेवाराम, लोचन प्रसाद पांडेय, मुकुटधर पांडेय, गजानन माधव मुक्तिबोध, श्रीकांत वर्मा, गुलशेर अहमद खा शानी, विनोद कुमार शुक्ल प्रदेश के ऐसे साहित्यकार हैं जिन्होंने अपनी कृतियों के माध्यम से संपूर्ण राष्ट्र तथा विश्व में छत्तीसगढ़ का मान बढ़ाया है। 

हबीब तनवीर, पंडित सत्यदेव दुबे, शंकर शेष जैसे हिंदी रंगमंच के पुरोधा, बुधादित्य मुखर्जी जैसे सितार वादक, रायगढ़ कत्थक घराने के पं. कार्तिकराम, सुप्रसिध्द घड़वा शिल्पी जयदेव बघेल, पंथी नर्तक देवदास बंजारे, पंडवानी के शीर्षस्थ गायक झाडूराम देवांगन, पुनाराम निषाद, तीजन बाई, ऋतु वर्मा, भरथरी की सुप्रसिध्द गायिका सुरूज बाई खांडे ये कुछ ऐसे नाम है जिन्होंने छत्तीसगढ़ का नाम पूरी दुनिया में नाम रोशन किया है। 

छत्तीसगढ़ का अतीत भी अत्यंत वैभवशाली रहा है। गोपाल मिश्र, माखन मिश्र, बाबू रेवाराम जैसे कवियों ने अपनी रचनाओं से छत्तीसगढ़ के साहित्य और संस्कृति को समृध्द किया है। गोपाल मिश्र द्वारा लिखित ’ खूब तमाशा ’ एक महाकाव्य है जिसमें उन्होंने व्यंग्य के माध्यम से समाज की विडंबनाओं पर प्रहार किया है।

छत्तीसगढ़ के एक अन्य तथा महत्वपूर्ण कवि लोचन प्रसाद पांडेय ने छत्तीसगढ़ की महिमा का बखान करते हुए ’ छत्तीसगढ़ नामक ’ काव्य की रचना की है। छत्तीसगढ़ के वैभव को अपनी इस कविता में पिरोते हुए उन्होंने लिखा है...

महानदी बोहै जहां होवै धान बिसेस।

जनम भूम सुन्दर हमर अय छत्तीसगढ़ देस।।

अय छत्तीसगढ़-देस महाकोशल सुखारासी।

राज रतनपुर जहां रहिस जस दूसर कासी।।

सोना-हीरा के जहां मिलथे खूब खदान।

हैहयवंशी भूप के वैभव सुजस महान।।

लोचन प्रसाद पांडेय के अनुज मुकुटधर पांडेय ने भी महानदी पर ’ महानदी ’ नाम से ही एक सुंदर काव्य की रचना की है। इस कविता में उन्होंने महानदी के माध्यम से तत्कालीन छत्तीसगढ़ की दशा का चित्रण किया है...

कर रहे महानदी! इस भांति करूण-क्रन्दन क्यों तेरे प्राण?

देख तब कातरता यह आज, दया होती है मुझे महान।

विगत-वैभव की अपने आज, हुई क्या तुझे अचानक याद?

दीनता पर या अपनी तुझे, हो रहा है आन्तरिक विषाद?

छत्तीसगढ़ की चर्चा माधवराव सप्रे के बिना पूरी नहीं हो सकती है। छत्तीसगढ़ स्वतंत्रता का अलख जगाने वाले तथा नवजागरण का मशाल लेकर चलने वाले माधवराव सप्रे जैसे महान विभूति की कर्म भूमि रही है। सन् 1900 में पेंड्रा रोड जैसे एक छोटे से कस्बे से ’ छत्तीसगढ़ मित्र ’ का प्रकाशन संपादन करने वाले माधवराव सप्रे को छत्तीसगढ़ भला कैसे भूला सकता है। ’ छत्तीसगढ़ मित्र ’ मासिक पत्रिका के रूप में निरंतर तीन वर्षों तक प्रकाशित होती रही है। इस मासिक पत्र के माध्यम से माधवराव सप्रे ने हिंदी प्रदेशों में स्वतंत्रता का अलख जगाने तथा नवजागरण का प्रकाश फैलाने का असाध्य कार्य किया है। कालांतर में माधवराव सप्रे ने नागपुर से ’ हिंदी ग्रंथमाला ’ तथा ’ हिंदी केसरी ’ जैसे पत्र का प्रकाशन कर पूरे देश में स्वतंत्रता का जैसे शंखनाद कर दिया था। 

माखनलाल चतुर्वेदी माधवराव सप्रे के प्रिय शिष्य थे। माखनलाल चतुर्वेदी जब अंग्रेज शासकों द्वारा कैद कर बिलासपुर जेल में डाल दिए गए उन्हीं दिनों उन्होंने बिलासपुर जेल में रहते हुए 18 फरवरी 1922 को ’ पुष्प की अभिलाषा ’ नामक एक अमर काव्य की रचना की। यह कविता देश के हजारों-लाखों स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का मूलमंत्र बन गया। यह कविता आज भी हिंदी साहित्य की एक अमर धरोहर है। छत्तीसगढ़ आज भी इस अमर रचना के आगे नतमस्तक है....

चाह नहीं मैं सुरबाला के गहनों में गूंथा जाऊं

चाह नहीं प्रेमी-माला में बिंध प्यारी को ललचाऊं

चाह नहीं सम्राटों के शव पर हे हरि डाला जाऊं

चाह नहीं देवों के सिर पर चढूं भाग्य पर इठलाऊं

मुझे तोड़ लेना बनमाली

उस पथ पर तुम देना फेंक

मातृभूमि पर शीश चढ़ाने

जिस पथ जावें वीर अनेक।  

इसी प्रदेश ने गजानन माधव मुक्तिबोध जैसे एक बड़े कवि को शरण दी है। यह बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि दिग्विजय महाविद्यालय के तत्कालीन प्राचार्य किशोरीलाल शुक्ल ने हिंदी के व्याख्याता पद पर अपने स्वर्गीय भतीजे की पत्नी का चयन नहीं कर मुक्तिबोध का चयन किया था। मुक्तिबोध नई कविता के प्रमुख कवियों में से एक थे, उन्होंने ’ अंधेरे में ’ जैसी अपनी सुदीर्घ कविता की रचना भी राजनांदगांव में आने के बाद की। मुक्तिबोध की ’ एक शीर्षकहीन कविता ’ में दण्डकारण्य की एक झलक दिखाई देती है...

मनुष्य के जंगल में 

दण्डकारण्य में 

परस्पर लड़ती हुई हवाओं के साथ-साथ

मैं घूमा। 

टीलों पर प्राकृतिक गलियों में छाया कान्तार की

हरी-घनी-अजीब उलझी हुई!

छत्तीसगढ़ प्रदेश विश्व की तीन महान विभूतियों का प्रत्यक्ष साक्षी रहा है। स्वामी विवेकानंद सन् 1877 में रायपुर आए और लगभग डेढ़ वर्षों तक अपने पिता, मां, भाई-बहन के साथ रायपुर में रहे। कवि गुरू रवीन्द्रनाथ ठाकुर भी सन् 1902 में अपनी धर्मपत्नी श्रीमती मृणालिनी देवी को लेकर पेंड्रा रोड आए। श्रीमती मृणालिनी देवी यक्षमा से पीड़ित थी और उस समय एशिया का सबसे बड़ा सेनेटोरियम पेंड्रा रोड में ही था। यह टी.बी. सेनेटोरियम पेंड्रा रोड और गौरेला के मध्य 144 एकड़ क्षेत्र में फैला हुआ था। गुरूदेव यहां दो माह तक रहें। पेंड्रा रोड जाते समय बिलासपुर स्टेशन पर उन्हें छः घंटे तक रूकना पड़ा था। अपनी सुप्रसिद्ध कविता ’ फाॅकि ’ में उन्होंने इस घटना का उल्लेख करते हुए लिखा है.... 

बिलासपूरेर इस्टेशने बदल हबे गाड़ि,

ताड़ा ताड़ि नामते हलो।

छः घंटा काल थामते हबे जात्रीशालाय।

मने हलो, ए एक विषम बालाई

( बिलासपुर स्टेशन में बदलनी होगी गाड़ी

उतरना होगा शीघ्र 

छः घंटे रूकना होगा यात्री प्रतीक्षालय में  

यह भी एक मुसीबत है भारी )

सन् 1920 और सन् 1932 में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का आगमन छत्तीसगढ़ में हुआ था। रायपुर, कंडेल, धमतरी, बिलासपुर इसके साक्षी हैं। महात्मा गांधी का छत्तीसगढ़ प्रवास, छत्तीसगढ़ के इतिहास की एक महान घटना मानी जाती है। महात्मा गांधी की चीर स्मरणीय स्मृतियों को छत्तीसगढ़ आज भी अपनी आंखों में संजोए हुए है। 

पं. सुंदरलाल शर्मा जैसे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी को छत्तीसगढ़ भला कैसे भूला सकता है, जिसके कारण ही महात्मा गांधी को छत्तीसगढ़ आने के लिए विवश होना पड़ा था। महात्मा गांधी से भी पहले राजिम के मंदिर में हरिजनों को प्रवेश दिलवाकार पं. सुंदरलाल शर्मा ने एक नया इतिहास रच दिया था। इसलिए महात्मा गांधी ने सार्वजनिक रूप से उन्हें अपना गुरू निरूपित किया। 

छत्तीसगढ़ के शीर्ष कवि और हमारे गौरव विनोद कुमार शुक्ल साहित्य के क्षेत्र में संपूर्ण विश्व में अपना एक अलग स्थान रखते हैं। विनोद कुमार शुक्ल की यह कविता ’ यह जो छत्तीसगढ़ है ’ छत्तीसगढ़ का एक दुर्लभ दृश्य रचती है, जिसमें छत्तीसगढ़ के जंगल और खेत उजाड़ है और गरीब भूखे हैं। इस दृश्य के उलट एक ऐसे दृश्य को छत्तीसगढ़ में रचे जाने की आवश्यकता है जिसमें जंगल और खेत हरे-भरे हों और कोई भी गरीब भूखा न हो। हम सब छत्तीसगढ़ की ऐसी ही तस्वीर या दृश्य की कामना करते हैं। आज 26 जनवरी गणतंत्र दिवस के शुभ अवसर पर हम सबकी यही मंगल कामना है। 

यह जो छत्तीसगढ़ है

राजनीति के समुद्र में से 

निकलकर आया है

समुद्री घोड़े की तरह है

जो नक्शा है छत्तीसगढ़

यह शार्क या मगरमच्छ जैसा

ही हो सकता था नक्शे में 

समुद्री घोड़े के पेट में लोग है

यह उतना ठीक नहीं लगता 

जितना शार्क या मगरमच्छ के

पेट में कहने से जैसा की है

इसका नक्शा संयोग से जंगली

फूल हो सकता 

या फूल की कली

पकते हुए भात की हण्डी हो

जाति घर-घर में

परंतु उजाड़ जंगल, खेतों

गरीब भूखों का एक आदि

दृश्य है जैसा कि है। 

( विनोद कुमार शुक्ल )