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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - वैदिक हिंसा हिंसा न भवति

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से  - वैदिक हिंसा हिंसा न भवति

-सुभाष मिश्र

भारतेन्दु हरिश्चंद्र का नाटक है वैदिक हिंसा हिंसा न भवति। मांसाहार के कारण की जाने वाली हिंसा को केंद्र में रखकर लिखा गया, यह नाटक जिस नांदी के दोहा गायन से शुरू होता है, वह कुछ इस तरह का है-
बह बकरा बलि हति कटैं, जाके बिना प्रमान
सो हरि की गाया करै, गब जग को कल्यान
भारतेन्दु हरिश्चंद्र ने अंधेरे नगरी नाटक भी लिखा है। पश्चिम बंगाल के चुनाव में होने वाली हिंसा, हिंसा है जिसके लिए भाजपा देशव्यापी प्रदर्शन करती है। खादी में तूफान खड़ा कर देती है। वही भाजपा उत्तम राज्य के अपने उत्तरप्रदेश में पंचायत चुनावों में होने वाली हिंसा और धांधली पर चुप्पी साध लेती है। यह कैसे संभव है कि जहां पंच, सरपंच, पार्षद के चुनावों में कांटे की टक्कर होती है, जहां भाजपा, कांग्रेस, समाजवादी, बसपा, आप जैसी बहुत सी पार्टियों की उपस्थिति हो वहां के जिला 21 जिला पंचायतों में भाजपा के निर्विरोध अध्यक्ष चुन लिए जाये। क्या ये नेता इतने लोकप्रिय हैं कि इनके खिलाफ कोई चुनाव ही नहीं लडऩा चाहता या फिर माजरा ही कुछ और है।
इस समय पंचायत चुनावों में बड़े पैमाने पर हुई हिंसा और धांधली को लेकर उत्तरप्रदेश की राजनीति गरमाई हुई है। सपा, बसपा सभी सत्तारूढ़ भाजपा पर गंभीर आरोप लगा रहे हैं। सपा नेता अखिलेश यादव का कहना है कि पूरा प्रशासन गुडों के साथ खड़ा है। पैसों को पानी की तरह बहाया जा रहा है। मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि इतने ज्यादा बहुमत वाला दल ऐसा क्यों कर रहा है? अखिलेश यादव को इस सवाल का जवाब स्वयं उनके पास है। उत्तरप्रदेश में अगले साल विधानसभा चुनाव है। देश का सबसे बड़े प्रदेश से देश की राजनीति तय होती है। बिना काशी जाये मोक्ष नहीं मिलता। मोदी जी को क्या जरूरत थी। गुजरात छोड़कर का काशी से चुनाव लडऩे की। काशी का न्याय अपने आप में अनूठा है। श्रीकांत वर्मा की एक कविता है काशी का न्याय
सभा बरखस्त हो चुकी
सभासद चलें
जो होना था सो हुआ
अब हम, मुंह क्यों लटकायें हुए हैं?
क्या कशमकश है?
किससे डर रहे हैं?
फैसला हमने नहीं लिया
सिर हिलानें का मतलब फैसला लेना नहीं होता
हमने तो सोच-विचार तक नहीं किया
बहसियों ने बहस की
हमने क्या किया?
हमारा क्या दोष?
न हम सभा बुलाते हैं
न फैसला सुनाते हैं
वर्ष में एक बार
काशी आते हैं
सिर्फ यह कहने के लिए
कि सभा बुनाने की भी आवश्यकता नहीं
हर व्यक्ति का फैसला
जन्म के पहले हो चुका है।
राजजन्म भूमि आंदोलन के जरिए पूरे देश में धार्मिक ध्रुवीकरण करने वाली भाजपा ने पिछले विधानसभा चुनाव में उत्तरप्रदेश में जो ऐतिहासिक विजय हासिल की थी वह इस चुनाव में भी उसे दोहराना चाहती है। भाजपा के पास इस बार राम मंदिर निर्माण की उपलब्धि है किन्तु कोरोना महामारी की विफलता सहित बहुत सी ऐसी बातों भी हैं जो उसके जनाधार को डिगा सकती है। बसपा सुप्रीमो मयावती का कहना है कि विधानसभा चुनावों में जमीन हासिल करने के लिए भाजपा धर्म परिवर्तन के मुद्दे को राजनीति रंग दे रही है। एक सोची-समझी रणनीति और साजिश की आड़ में धर्म परिवर्तन के मुद्दे को जबरन हिन्दू बनाम मुस्लिम मुद्दा बनाया जा रहा है।
भारतीय राजनीति में अब जनता के मूल मुद्दे लगभग नदारत है। चुनाव नजदीक आते ही ऐसे-ऐसे मुद्दे उछाले जाते हैं जिससे जनमानस की भावना को भुनाया जा सके। कभी राष्ट्रवाद, कभी पाकिस्तान, कभी दलित, तो कभी मुस्लिम, कभी गाय, तो कभी मंदिर, कभी आरक्षण, तो कभी धार्मिक, सांस्कृतिक अस्मिता को खतरा बताकर धर्म परायण जनता को भ्रमित किया जाता है। उत्तरप्रदेश में कुछ संस्थाओं के जरिए धर्म परिवर्तन का मामला हो या फिर कश्मीर में दो सिख लड़कियों को मुस्लिम लड़को से शादी करने का मामला, ऐसे भी मामलों को सोशल मीडिया के जरिए भयदोहन का जरिया बनाया जा रहा है। हिन्दू बनाम मुस्लिम की राजनीति में असुद्दीन औवेसी जैसे नेता आग में घी का काम करते हैं। जिन प्रदेशों की राजनीति में अब तक उनकी उपस्थिति नहीं थी वहां भी मुस्लिम वोटरों को प्रभावित करने का काम कर रहे हैं। औवेसी की उपस्थिति और भाषणबाजी धार्मिक कट्टरपन और अलगाववादी ताकतों को ही बढ़ावा देती है। उत्तरप्रदेश का वोटर अलग जाति, धर्म और पार्टी में बंटा हुआ है। मायावती दलितों को अपना वोट बैंक समझती है तो समाजवादी पार्टी यादव और मुस्लिम को। कांग्रेस का अपना जनाधार धीरे-धीरे खिसक रहा है। बहुसंख्यक हिन्दू भाजपा के साथ है। अधिकांश राजनीतिक पार्टियां जाति, धर्म की नैया पर संवार है। हमारा संविधान लाख कहे कि हम धर्म निरपेक्ष राष्ट्र किन्तु हमारी राजनीतिक पार्टियां चुनाव में धार्मिक और जातिगत ध्रुवीकरण लाकर इसे लोकतंत्र की मूल भावना के साथ खिलवाड़ करने में लगी हुई है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने हाल ही में अपने मंत्रिमंडल के विस्तार में इस समीकरण का पूरा ध्यान रखा है। राजनीति का गेट वे समझे जाने वाले उत्तरप्रदेश के आगामी चुनाव को ध्यान में रखकर मोदी मंत्रिमंडल में यूपी से 15 मंत्री शामिल किये गये है। मंत्रियों का चयन करते समय दलित-पिछड़ों का विशेष ध्यान रखा गया है। उत्तरप्रदेश में सर्वाधिक आबादी वाले पिछड़े और अति पिछड़े वर्ग से तीन नए मंत्री बनाए गये हैं। दलित वर्ग से भी तीन मंत्रियों को मंत्रिमंडल में शामिल किया गया है। मंत्रिमंडल विस्तार में उत्तरप्रदेश के क्षेत्रीय, सामाजिक और जातिगत समीकरण और संतुलन का भी ध्यान रखा गया है। उत्तरप्रदेश जिला पंचायत चुनाव में भाजपा ने कुल 75 जिला पंचायत अध्यक्ष के पद पर 67 में जीत दर्ज की है।
प्रसंगवश अदम गोंडवी की ये कविता -
काजू भुने पलेट में, विस्की गिलास में
उतरा है रामराज विधायक निवास में
पक्के समाजवादी हैं, तस्कर हों या डकैत
इतना असर है ख़ादी के उजले लिबास में
आजादी का वो जश्न मनायें तो किस तरह
जो आ गए फुटपाथ पर घर की तलाश में
पैसे से आप चाहें तो सरकार गिरा दें
संसद बदल गयी है यहाँ की नख़ास में
जनता के पास एक ही चारा है बगावत
यह बात कह रहा हूँ मैं होशो-हवास में