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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से -निजीकरण से बढ़ रही हैं आम आदमी की मुश्किलें

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से  -निजीकरण से बढ़ रही हैं आम आदमी की मुश्किलें

-सुभाष मिश्र

सरकारी तंत्र व्यवस्था, संस्थानो को कोसना, गरियाना और उससे लाभ उठाना आम बात है। अपनी तमाम खामियों कमियों के बावजूद आज भी आम आदमी की पहुंच सरकारी व्यवस्थाओं तक ही है। बेहतर सुविधा के नाम पर जिस निजीकरण को बढ़ावा दिया जा रहा है, उसे आम आदमी की मुश्किलें बढऩे वाली ही है। चाहे शिक्षा का क्षेत्र हो या चिकित्सा या परिवहन जहां कहीं भी सरकारी, सार्वजनिक उपक्रम को कम तर बताकर निजी क्षेत्र की घुसपैठ होगी वहां अधिकतम मुनाफा कैसे कमाया जाये, यह पहली प्राथमिकता रहेगी। बेहतर संसाधन ,सुविधा और सेवा और सर्विस के नाम पर निजी क्षेत्र जिस तरह से लाभ कमा रहा है, वह किसी से छिपा नहीं है। कोरोना काल में लोगो ने इसे बहुत नजदीक से महसूस किया है। देश में पिछले 70 सालों में जो भी सार्वजनिक क्षेत्र में संपत्तियां, सुविधाएं अर्जित की गई, इधर के दिनों में उन्हें मौद्रीकरण के नाम पर निजी हाथों में सौंपा जा रहा है।

सरकारी तंत्र और सरकारी व्यवस्था जिसमें चाहे एयर इंडिया हो, भारतीय रेल हो, राज्य परिवहन निगम द्वारा संचालित बसे हो, सरकारी अस्पताल, स्कूल और सरकार द्वारा प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से संचालित सार्वजनिक महत्व और जरूरतों के संस्थान, सुविधा केन्द्र जो भी हैं, उन्हें लोक अक्सर पानी पी पीकर कोसते हैं और उनको कार्य प्रणाली, गुणवत्ता पर सवाल उठाते हैं।
हमारे देश की सबसे बड़ी रेल सेवा अब धीरे-धीरे निजी हाथों में सौंपी जा रही है। बेहतर सुविधा, गुणवत्ता और कुशल संचालन के नाम पर किये जा रहे निजीकरण की मार सीधे-सीधे आम आदमी पर पड़ रही है। हिन्दूस्तानी आदमी अपने घर से पहले तीर्थयात्रा या धार्मिक, सामाजिक कर्मकांड के लिए ही निकलकर यात्राएं करता था। धीरे-धीरे उसका रुझाान पर्यटन और घूमने फिरने की ओर बढ़ा तो हमारी सारी मौजूदा परिवहन व्यवस्थाएं चरमराने लगीं। सार्वजनिक क्षेत्र की परिवहन व्यवस्था कुप्रबंधन के कारण लोगों को सरकारी खटारा बसों में, ट्रेन के गंदे डिब्बो में सफर करना पड़ रहा है। टे्रनों का विलंब संचालन, टिकट की कालाबाजारी, स्टेशनों की गंदगी, मारामारी, घटिया खाना, रेलवे स्टेशनों पर साफ-सुथरी बुनियादी सुविधाओं का अभाव भारतीय रेलों की पहचान है। महंगा किराया देकर, रिजर्वेशन कराकर अपनी आरक्षित सीट पर आप बैठकर जा सकेंगे की नहीं इसकी भी गारंटी नहीं है। रिजर्वेशन के डिब्बो में लोगों का जबरन घुसकर बैठना, भिखारियों और असामाजिक तत्वों का चलती ट्रेन में आकर परेशान करना आम बात है।

ट्रेन में सीट खाली होने के बाद टीटीआई द्वारा लोगों को रिजर्वेशन के नाम पर घुमाना, पैसे वसूलना, कुलियों का सामान को लेकर मनमाने पैसा मांगना, प्लेटफार्म पर घटिया खाद्य सामग्री मिलना, ट्रेनो में पेंट्रीकार का ना होना, यात्रा के दौरान सामान की चोरी और असुरक्षा का भाव बहुत सारी बातें हैं। यह रेल यात्रा का एक पहलू है किन्तु ट्रेनों की यात्रा के साथ बहुत सारी सुखद स्मृतियां भी जुड़ी है। जो वक्त के साथ बदरंग होती जा रही है।

सरकार लाख कहे की वह रेलवे का निजीकरण नहीं कर रही है। संसद में पूर्व केंद्रीय रेल मंत्री पीयूष गोयल ने कहा है कि स्टेशनों के निजीकरण करने का कोई प्रस्ताव नहीं है। निजी पार्टियों को सिर्फ पट्टा अधिकार हस्तांतरित किए जाएंगे। अवधि समाप्त होने के बाद भूमि वापस हो जाएगी। उनका कहना है कि स्टेशन पुनर्विकास कार्यक्रम के तहत निर्धारित अवधि के लिए पट्टा हस्तांतरण किया जा रहा है। ताकि मुसाफिरों को अच्छी सहूलियतें मिलें। उसके बाद  वर्तमान रेलमंत्री अश्विनी वैष्णव भी यही राग अलाप रहे है। रेलवे स्टेशनों का स्वामित्व रेलवे के पास ही रहेगा। बेहतर सुविधा के लिए स्टेशनों का आधुनिकीकरण किया जा रहा है। इस योजना के तहत भारतीय रेल को विकसित करने के लिए 1253 स्टेशनों की पहचान की है। निजी भागीदारी से 109 रुट पर ट्रेन चलेंगी, अतिरिक्त 151 अति आधुनिक ट्रेन, जिनसे बढ़ेगा रोजगार, मिलेगी आधुनिक तकनीक, बढ़ेगी सुविधा। सार्वजनिक निजी साझेदारी (पीपीपी) के जरिए शुरू किए यात्री ट्रेन परिचालन से करीब 30,000 करोड़ रुपये के कुल निवेश का लक्ष्य रखा गया है।

रेलवे ने अपनी परिसंपत्तियों के मौद्रीकरण की योजना बनायी है जिसमें, चालू होने के बाद पूर्वी और पश्चिमी माल ढुलाई गलियारा, पीपीपी के तहत स्टेशनों का पुनर्विकास, रेलवे कॉलोनी, हिल रेलवे और स्टेडियम शामिल हैं। उन्होंने कहा कि परिसंपत्तियों के मौद्रीकरण से आधारभूत ढांचों के निर्माण के लिए अधिक संसाधन जुटाने में मदद मिलेगी। रेल मंत्री का कहना है कि संपत्तियों के मौद्रीकरण का अर्थ उनका निजीकरण नहीं है बल्कि दोनों में अंतर है। उन्होंने कहा कि निजीकरण की स्थिति में संबंधित संपत्ति का स्वामित्व सरकार के पास नहीं रहता।
17 रेलवे जोन हैं और 73 डिवीजन हैं। इसके अलावा, भारत में लगभग 7500 रेलवे स्टेशन हैं। भारतीय रेलवे के रोलिंग स्टॉक में लगभग 2.8 लाख माल वैगन, 71 हजार यात्री कोच और 11.5 हजार इंजन हैं। कोविड के बाद से देश में 28 विभिन्न प्रकार की ट्रेनें भी चल रही हैं जैसे तेजस एक्सप्रेस, गतिमान एक्सप्रेस, शताब्दी एक्सप्रेस, राजधानी एक्सप्रेस, दुरंतो एक्सप्रेस, हमसफर ़एक्सप्रेस आदि प्रमुख है।

रेल दुनिया का चौथा सबसे बड़ा रेलवे नेटवर्क और नौवां सबसे बड़ा नियोक्ता है और प्रतिदिन 2.5 करोड़ से अधिक यात्रियों को ले जाता है, जो ऑस्ट्रेलिया की संपूर्ण जनसंख्या से अधिक है। भारतीय रेल का इतिहास 160 साल पहले का है। 16 अप्रैल 1853 को पहली यात्री ट्रेन बोरी बंदर(बॉम्बे) और ठाणे के बीच 34 किमी की दूरी तक चली थी। ट्रेन सुविधा के विस्तार के क्षेत्र में 31 मार्च 2020 तक, आईआर नेटवर्क 126,366 किमी (78,520 मील) ट्रैक की लंबाई तक फैला है, जबकि मार्ग की लंबाई 67,956 किमी (42,226 मील) है। रेल और बाकी सारे क्षेत्रो के मौद्रीकरण करते हुए यह सवाल उठाने वाले एक तरफ आजादी के बाद से कांग्रेस के शासन काल में किसी तरह का विकास नहीं हुआ यह कहने से भी नहीं चूकते। तब लोगो के मन में यह सवाल आना लाजमी है की जब विकास नहीं हुआ तो फिर बड़े पैमाने पर सरकारी, सार्वजनिक क्षेत्र की संपत्तियां बेचकर अरबो-खरबो रुपये कैसे इक_े किये जा रहे है? जब कुछ था नहीं था तो फिर क्या बेच रहे हो। देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु और उनके साथियों ने देश में पंचवर्षीय योजना के नाम पर विकास का जो मॉडल खड़ा किया और रोजोन्मुखी जो सार्वजनिक उपक्रम खड़े किये, आज वे धीरे-धीरे निजी हाथों में जा रहे है। सरकार अब शासन करना चाहती है, व्यापार करना उसका काम नहीं है। व्यापार करने के लिए सरकार के साथ बहुत सारे कॉरपोरेट घराने खड़े है। धीरे-धीरे पर चलने वाली सभी सार्वजनिक सुविधाओं से जुड़ी संस्थाएं, उपक्रम और उनके माध्यम से संचालित सुविधाएं निजी हाथों में जाने वाली है। जल, थल और आकाश वाले जैसे ही इन सुविधाओं के लिए निजी क्षेत्र में जाते हैं तब उन्हें आटे-दाल का भाव नजर आता है।
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