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सफलता की कहानी : ढलती उम्र में भी साक्षर होने को लालायित बुजुर्गों ने पेश की मिसाल

सफलता की कहानी : ढलती उम्र में भी साक्षर होने को लालायित बुजुर्गों ने पेश की मिसाल

सुकमा।  साक्षर होने से एक व्यक्ति ना सिर्फ स्वयं के वर्तमान को बदलता है बल्कि अपने भविष्य को भी संवारता है। वर्तमान समय में दुनिया के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने के लिए साक्षर होना बेहद आवश्यक है। क्योंकि पढ़ा लिखा इंसान ही खुद को और समाज की सोच को बदल सकता है। साक्षरता विकास की आधारशिला है। साक्षर व्यक्ति खुद के बौद्धिक विकास के साथ साथ सामाजिक और आर्थिक विकास में भी अपना योगदान देता है। 

केन्द्र प्रवर्तित कार्यकम पढ़ना लिखना अभियान के तहत विगत दिवस जिला सुकमा में असाक्षरों का आकलन हेतु महापरीक्षा अभियान का आयोजन किया गया। इस महापरीक्षा में ऐसे परीक्षार्थी भी सम्मिलित हुए जिन्होंने पहली बार किताब और कलम का स्पर्श किया और मिसाल पेश की। जगरगुण्डा में परीक्षा में शामिल वृद्ध व्यक्तियों ने इन्हीं बातों को सिद्ध किया, जिन्होंने अपने उम्र के आखिरी पड़ाव में भी साक्षर होने की चाहत को जीवित रखा। जगरगुण्डा के परीक्षा केन्द्र में आए 60 वर्षीय पार्वती, 63 वर्षीय रामैय्या और 69 वर्षीय सावित्री पुजारी इस बात का उदाहरण है कि इच्छाशक्ति के आगे उम्र कोई बाधा नहीं है। वे साक्षर कहलाने की दृढ़ इच्छा लिए परीक्षा में शामिल हुए जिसमें अधिकतर परीक्षार्थी उनसे बहुत छोटी उम्र के थे। ढलती उम्र में अपना नाम पढ़ने और लिखने को सक्षम होने की मजबूत निश्चय का ही फल है कि इन बुजुर्गों ने 120 घंटे की पढ़ाई पूर्ण कर इस महापरीक्षा में शामिल हुए। इनके चेहरे पर इस बात की चमक साफ नजर आ रही थी कि आखिरकार अब वे गर्व से कलम उठाकर अपना नाम लिख सकेंगे।

जिला शिक्षा अधिकारी  जे के प्रसाद ने बताया कि जिला सुकमा में पढ़ना लिखना अभियान अंतर्गत जानकारी दी।