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ध्रुव शुक्ल की कविताः हम जग-जीवन-सहजीवी

ध्रुव शुक्ल की कविताः हम जग-जीवन-सहजीवी


हारा मन

कहाँ पराजय त्यागे!


हारा तन

झुकता अपने दुख के आगे!


जागो बहुजन 

जैसे सब मन जागे 

सब तन जागे

सब जन जागे


प्रकट हो

सबके दुख का योग

सबके तन-मन का सहयोग

अन्याय से असहयोग


कहाँ कोई परजीवी!

हम जग-जीवन-सहजीवी

सबके बीच अभय हो

जीवन की जय हो