प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-देख चुका जो, जो आये ये चले गए

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-देख चुका जो, जो आये ये चले गए


महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की कविता है जिसे मैं आज प्रसंगवश यहां प्रस्तुत कर रहा हूं-
देख चुका जो, जो आये थे चले गए
मेरे प्रिय सब बुरे गए सब भले गए
क्षण भर की भाषा में नव-नव अभिलाषा में
उगते पल्लव सी कोमल शाखा में
आए थे जो निष्ठुर कर से मले गए
चिंताएं बाधाएं आती ही आएं
अन्ध हृदय है बन्धन निर्दय लाएं
मैं ही क्या सब ही तो ऐसे छले गए

जब भी हमारे बीच से हमारा अपना जाता है तो निराला जी की यह कविता अनायास याद आ जाती है। दरअसल, जब अचानक से हमारे प्रियजन हमारे बीच से चले जाते हैं तो हमें सहसा यकीन नहीं होता। मेरे पत्रकार मित्र मोहनराव, रंगकर्मी अजय आठले, सत्यजीत भट्टाचार्य के निधन की सूचना से स्तब्ध हूं। यह सही है कि आया है सो जायेगा राजा रंक फकीर, पर यदि कोई अचानक से यूं ही चला जाये, तो हैरानी होती है, दुख होता है, पीड़ा होती है। कोरोनाकाल में हमारे बीच से बहुत से नामवर यूं ही चले गये। पिछले छह माह में जबसे कोरोना वायरस की दस्तक हमारे देश में हुई है तब से अब तक 94559 लोगों की मृत्यु कोरोना वायरस में हुई है। मरने वालों में 50 प्रतिशत लोग 60 साल से कम उम्र के हैं जिनमें 15-29 वर्ष की आयु के 2-5 प्रतिशत, 30-44 आयु के 11. 4 प्रतिशत और 45 से 59 वर्ष तक की आयु के 35 प्रतिशत, मरने वालों में लगभग आधे लोग अपने परिवार की आजीविका को चलाते थे। ऐसे लोगों के मरने से उनके परिवार पर बहुत बड़ी आर्थिक विपदा आ गई है।

बहुतों के लिए जो कोरोना वायरस की चपेट में आये, उनका परिवार भी संकट में है। जिन लोगों के बीच से परिवार से कोई अचानक, अनायास नहीं गया है, उनके लिए यह महज एक आंकड़ा हो सकता है। यह आंकड़ा कभी पंजाब की आतंकवादी घटना के रूप में मारे जाने वाले लोगों का होता है तो कभी सांप्रदायिक दंगों में मारे जाने वाले लोगों की संख्या के रूप में, कभी जम्मू-कश्मीर में हो रही घटनाओं के मृतकों के रूप में, कभी नक्सलवादी क्षेत्र में होने वाली मुठभेड़ में मारे गये लोगों की संख्या के रूप में तो कभी किसान आत्महत्या के रूप में हमारे सामने आते हैं। चूंकि, हमारा ऐसी घटनाओं से सीधा संबंध नहीं होता। इस कारण से ये सारे आंकड़े हमें विचलित नहीं करते। हम धीरे-धीरे ऐसी खबरों और मरने वाले लोगों को क्रिकेट के स्कोर बोर्ड की तरह देखने के आदी हो जाते हैं। हमारी संवेदना का स्तर धीरे-धीरे भोथरा होने लगा है।

हमें रोबोट में या भक्त में बदलने की कोशिश जारी है। जहां हमारे पास सोचने-समझने और तर्क करने की शक्ति नहीं होती। हम केवल एक आज्ञापालक होकर रह जाते हैं। उपलब्ध ताजा आंकड़ों के अनुसार, पूरी दुनिया में अब तक 999415 लोग कोरोना से मरे हैं और 33096613 संक्रमित हुए हैं। हमारे देश में कोरोना संक्रमितों की संख्या 5996823 है। छत्तीसगढ़ में संक्रमितों की संख्या 102461 है और मरने वालों की संख्या 777 है।

जिदंगी तो बेवफा है, एक दिन ठुकराएगी, मौत मेहबूबा है अपने साथ लेकर जायेगी गीत को गुनगुनाने वाले भी ऐसी दगाबाज मेहबूबा के साथ नहीं जाना चाहेंगे, जो अचानक से आये और कहे सबको छोड़ो मेरे साथ चलो जाना तो सबको है एक दिन, पर ऐसे कौन जाना चाहेगा। दरअसल हमारी सोच और परंपरा में यह भी चिंतन है कि जीवन-मरण सब विधि के हाथ किन्तु यह जो विधि इस समय मौत का सामान लेकर आई है।, दरअसल यह विधि कुछ लोगों की असावधानी और लापरवाही से उपजी है। हवाई मार्ग से आये इस पड़ोसी देश चाइना के वायरस ने हमारे देश के लोगों को उसी तरह प्रभावित किया है जैसे उनके बहुत सारे उत्पादों, एप और गेम्स ने किया हुआ था। गलत नीति, निर्णय और व्यवस्थागत त्रुटियों की वजह से बहुत लोगों को नाहक अपनी जान गंवानी पड़ रही है। कोरोना पॉजिटिव होकर बहुत कुछ खोना पड़ रहा है। जो कोरोना पीडि़त नहीं भी हुए, आज इस समय बीमार पड़ रहे हैं या उनकी मृत्यु हो रही है तो यह भी कोरोना की सोशल डिस्टेंसिंग की चपेट में है।

छत्तीसगढ़ में कोरोना पीडि़तों की संख्या का आंकड़ा एक लाख पार कर गया है। 19 मार्च 2020 को छत्तीसगढ़ में कोरोना का पहला केस मिला था। अब तक यहां 777 लोगों ने कोरोना के कारण दम तोड़ा है। कोरोनाकाल में संक्रमण फैलने से अपनाए जा रहे सुरक्षा के उपाय के चलते अब शवयात्रा में भी जाने वालों की संख्या सीमित होती जा रही है. घर के लोग खुद ही अपील करते हैं कि आप न आयें। जहां हैं, वहीं से श्रद्धांजलि दे दें। एक अकेले कोरोना वायरस ने हम सब की जिदंगी बदलकर लगभग बदरंग और डरावनी बना दी है। समाज जीवन और रिश्तों के एक—दूसरे के प्रति सतर्कता और अविश्वास बढ़ा है। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, यह जुमला अब सोशल मीडिया पर वर्चुअल दुनिया तक सिमटकर रह गया है। कोरोना ने बहुत से परिवारों की रोजी-रोटी के संकट के साथ भूखमरी के कगार पर लाकर खड़ा कर दिया है। बहुत से लोग अपने परिवारजनों की मृत्यु के बाद उसके अंतिम दर्शन तक से वंचित हैं। एक परिवार के बहुत से लोग कोरोना संक्रमण होकर या तो अस्पताल में भर्ती रहते हैं या फिर क्वारेंटीन। ऐसे में कोरोना संक्रमण के डर से उनके पास कोई नहीं जाता।

हमारे इर्द-गिर्द ऐसे बहुत से परिवार मिल जायेंगे जो अपने परिजनों की मृत्यु का मातम भी एक साथ नहीं मना पा रहे हैं। कोरोना ने पूरी दुनिया को एक असहाय स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया है। लोग सुबह—शाम प्रार्थना में कर रहे हैं : इतनी शक्ति हमें देना दाता, मन का विश्वास कमजोर हो ना। मनुष्य जिसने अपने ज्ञान, जिज्ञासा, मेहनत और सामूहिक ताकत से अभी तक अपने को अजेय योद्धा समझ रखा था, कोरोना जैसे वायरस के सामने नतमस्तक है। पूरी दुनिया मिलकर भी पिछले 6-7 महीने में कोरोना की कोई वैक्सीन नहीं खोज पा रही है। हमारे मित्र मोहनराव, रंगकर्मी साथी अजय आठले, सत्यजीत भट्टाचार्य और इन जैसे बहुत से लोग, जो किसी रचनात्मक, सामाजिक सरोकार की दुनिया से वास्ता रखते थे, उनका जाना बहुतों को अखरता है। उनके परिवार का दायरा बड़ा होता है। ऐसे लोग हमारे बीच हमेशा जिंदा रहते हैं। समाज जीवन में वही लोग याद किये जाते हैं जो समाज को ऐसा कुछ देकर जाते हैं जो अनुकरणीय है। रचनात्मक संसार से जुड़ा व्यक्ति अपने काम की वजह से हमेशा जाना जाता है। कबीर, तुलसी, गालिब, मीर, भगतसिंह, गांधी, गणेश शंकर विद्यार्थी से लेकर ऐसे हजारों नाम हैं जो हमेशा याद किये जाते हैं।

पिछले छह महीनों में कला-जगत् के अनेक मूर्धन्य दिवंगत हुए हैं। हिंदी के यशस्वी दिवंगत साहित्यकार सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय की पत्नी कपिला वात्स्यायन का निधन भी 16 सितंबर को हुआ। कपिला वात्स्यायन का देहावसान एक साथ भारतीय संस्कृति के कई क्षेत्रों में क्षति है, वे स्वतंत्र भारत में उन थोड़ी सी आवाज़ों में से एक थीं जिन्हें भारतीय सभ्यता की आवाज़ कहा जा सकता है।
इनमें चित्रकार सतीश गुजराल, चित्रकार जऱीना हाशमी, मूर्तिकार नागजी पटेल, रंगकर्मी और कलाविद् इब्राहिम अलकाज़ी, कवि-चिन्तक मुकुन्द लाठ, शास्त्रीय संगीतकार पण्डित जसराज, संगीतकार वाजिद, प्रसिद्ध गायक एसपी बालासुब्रह्मण्यम आदि शामिल हैं। याद नहीं आता कि कभी पहले इतनी कम अवधि में, जो वैसे भी कालछाया में है, इतनी मूर्धन्यता को काल ने हमसे छीना हो।

छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता के जब अच्छे रिपोर्टर की बात होगी तो मोहन राव का नाम सम्मान के साथ लिया जायेगा। अजय आठले रायगढ़ में नाट्य गतिविधियों में इप्टा के पर्याय रहे हैं। उन्होंने ना जाने कितने नाटकों का निर्देशन, मंचन, अभिनय करते हुए रायगढ़ में नाटक का एक ऐसा संसार रचा है जो रंगमंच को समृद्ध कर रहा है। अजय और उषा आठले की लगन, मेहनत, सूझबूझ, सोच और संगठन क्षमता से नाट्य जगत समृद्ध हुआ है। अजय भाई के कार्य को उषा निरंतर आगे बढ़ाएगी, बहुत जुझारू है. अजय आठले इप्टा छत्तीसगढ़ के महासचिव थे। उन्होंने अपने पीछे अपने बहुत से ऐसे सहयोगी तैयार किये हैं जो रंगमंच को नई ऊंचाइयां दे सकते हैं।

बस्तर जैसे क्षेत्र में जो पूरी दुनिया में माओवादी घटनाओं या पिछड़ेपन के लिए जाना जाता है, वहां पर रंगमंच की गतिविधियों को सतत रूप से संचालित करने वाले सत्यजीत भट्टाचार्य  बापी का अचानक से हमारे बीच से जाना रंगमंच के लिए बहुत ही गहरी क्षति है।
रंगकर्मी सत्यजीत भट्टाचार्य पेशे से कुशल फोटोग्राफर होने के साथ-साथ ही बेस्ट वीडियोग्राफर, मूर्तिकार, मेकअप आर्टिस्ट, सिंगर सब थे। उन्होंने अभियान संस्था के जरिए बस्तर को अन्तरराष्ट्रीय पहचान दिलाई।

कबीर का एक दोहा है-
कबीरा जब हम पैदा हुए, जग हँसे हम रोये
ऐसी करनी कर चलो, हम हँसे जग रोये।