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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से -वर्जित क्षेत्रों की खुली बातचीत

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से  -वर्जित क्षेत्रों की खुली बातचीत

-सुभाष मिश्र

फादर्स डे पर सुप्रसिद्ध फिल्ममेकर अनुराग कश्यप और उनकी बेटी आलिया कश्यप तथा उसके ब्वायफ्रेंड शेन ग्रेगुआर के बीच हुई बातचीत का एक वीडियो आलिया कश्यप ने यूट्यूब पर शेयर किया। इस वीडियो में अनुराग कश्यप ने अपनी बेटी से उन सारे विषयों पर खुलकर बातचीत की जो हमारे समाज में वर्जित माने जाते हैं। हिन्दी के महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने अपनी बेटी सरोज की मृत्यु के बाद एक लंबी कविता सरोज स्मृति लिखी थी। इस कविता में निराला ने अपनी बेटी के सौंदर्य का वर्णन भी किया था। समाज में तेजी से आ रहे बदलाव के बीच बहुत सारी वर्जनाएं टूटी है। हमारा सिनेमा, साहित्य, बातचीत और सोशल मीडिया पर हमारे खुलेपन की बातचीत, स्टैंडअप कामेडी, प्रोग्राम, एकता कपूर और उन जैसे फिल्म मेकर द्वारा बनाए जाने वाले सीरियल, फिल्म के कंटेंट, विषयवस्तु इतने बोल्ड हैं जिसकी कल्पना हमने आज से बीस-तीस साल पहले नहीं की थी। टीवी के रंगीन परदे के साथ-साथ हमारे मोबाइल, लैपटॉप, कम्प्यूटर स्क्रीन पर ओटीपी प्लेट फार्म के जरिए जिस तरह का सीरिज, फिल्में, टॉक शो आ रहे हैं वे बहुत ही ओपन समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं।

शील और अश्लील के पारंपरिक मुद्दे नए जमाने में पुराने अर्थ खो चुके हैं। बीसवीं सदी के अंत में जब भारत में यौन क्रांति की बात एक बहस का रूप ले रही थी तब भी शील और अश्लील होना पुरुष या स्त्री देह के आसपास ही था। तब भी स्त्री देह की स्वतंत्रता को ही शील और अश्लीलता के संदर्भ में देखा गया, लेकिन 21वीं सदी में नई पीढ़ी ने उसे समय की जरूरत की तरह देखा और देह के बदलाव को मन और मानसिकता के बदलाव से जोड़कर भी देखा। नई सदी की पीढ़ी ने यौन क्रांति के संदर्भ बदले। नई पीढ़ी को कई तरह के बदलाव देखने पड़े और उनका आक्रमण भी इसी समय हुआ लेकिन इस पीढ़ी ने इसे किशोर उम्र के बदलाव के आनंद की तरह देखा लेकिन किशोर उम्र के शारीरिक बदलाव और मासिक धर्म से लेकर विवाह पश्चात होने वाले शारीरिक और मानसिक बदलाव के लिए शिक्षा के लिए नए माध्यम तलाशे। उनकी उत्सुकता और जिज्ञासाएं, आनंद को हाशिए पर डालकर जानकारी और शिक्षा के लिए तत्पर होने लगी लेकिन उनकी इस जिज्ञासा और शिक्षा को सही दिशा देने के लिए भारतीय पालक अभी तैयार नहीं है। जो हैं उन्हें भी परंपरागत मानसिकता के लोग पथभ्रष्ट, आधुनिक कहकर धिक्कारते रहते हैं। यह पीढ़ी बाजार द्वारा परोसी गई यौन संबंधी जानकारी से पृथक होकर जीवन में उपयोगी यथार्थ ज्ञान को हासिल करने के लिए उत्सुक है, लेकिन उनका सामना पाखंडी, धार्मिक लोगों और संस्कार के संकोच और बच्चों के लिए यौन शिक्षा की अनिवार्यता की दुविधा में फंसे माता-पिता और शिक्षकों से हो रहा है। एलीट क्लास इस तरह के संकोच और दुविधा से मुक्त हो रहा है लेकिन मध्य वर्ग के लिए यह संकोच और दुविधा विकराल रूप में सामने खड़ी है। लेकिन अचरज की बात यह है कि मध्यवर्ग की नई पीढ़ी भी माता-पिता से या अपने शिक्षकों से इस संकोच और दुविधा से बाहर आने की अपेक्षा रखती है। इंटरनेट और सोशल मीडिया ने नई पीढ़ी के लिए इस विषय के संदर्भ में खुलकर बात करने के लिए अनेक रास्ते खोल दिए हैं, लेकिन यहां भटकाव भी बहुत ज्यादा है। लेकिन युवा पीढ़ी के पास संकोच की जुबान बदलने के अवसर भी यही मौजूद हैं। कस्बों और छोटे शहरों की बात छोड़ दें तो महानगर अब यौन वर्जनाओं से मुक्त होने लगे हैं। कस्बों और छोटे शहरों में माता-पिता और बच्चों के बीच द्वंद्व की स्थिति बनी हुई है। महानगरों में जहां वर्जनाएं टूट रही हैं, वहां पुरातन पंथी, पाखंडी पंडितों और कठमुल्लाओं को अपनी सत्ता खतरे में नजर आने लगी तो इन सब बातों का विरोध शुरू कर दिया। बिना किसी तर्क और विचार के महज धर्म के नाश के नारे के आधार पर। अब चोली के पीछे क्या है का रहस्य और अश्लीलता नए समय में दोनों खत्म हो चुकी है। पहले समय में ऐसे गीतों के लिए ऐतराज उठाने वाले लोगों के पास एक नैतिक गर्भगृह था, लेकिन पहले टेलीविजन, फिर इंटरनेट सोशल मीडिया और तमाम चीजों के आने के बाद अश्लीलता के सारे रहस्य खत्म हो गए। जो जिज्ञासाएं रह गई हैं नई पीढ़ी के लोग उसे भी अब बेहिचक एक दूसरे से और यहां तक की मां-बाप से भी शेयर करने से हिचकते नहीं है। कल तक जो लड़की मासिक धर्म के शर्म और संकोच से बाहर नहीं आ पाती थी, आज वह बेहिचक स्टेफ्री या केयर फ्री के विज्ञापन देख लेती है और उसका अर्थ समझ भी लेती है और बात इससे आगे जाकर कंडोम के विज्ञापन तक पहुंच गई है। इसलिए लड़का या लड़की के लिए देह कोई रहस्य नहीं है और ना अब दैहिक संबंधों को लेकर शील-अश्लील या नैतिक-अनैतिक का बोझ या भाव रह गया है। अब वे चीजों और स्थितियों को नैतिकता के पाठ से नहीं जीव विज्ञान के ज्ञान से समझना चाहते हैं।

भारतीय समाज में आ रहे खुलेपन की एक मिसाल सुप्रीम कोर्ट का वह ऐतिहासिक फैसला था जिसमें समलैंगिक यौन संबंध को अपराधिक कृत्य समझने वाली कानून की धारा 377 को रद्द कर दिया। ये अलग बात है कि अभी भी हमारे देश में इसे सामाजिक स्वीकृति नहीं मिली है। इसी तरह लिव इन रिलेशनशिप को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने भरत मठ के मामले में कहा कि लिव इन रिलेशनशिप से पैदा हुए बच्चा वैध बच्चा है और उसे पैतृक अविभाजित संपत्ति को छोड़कर अपने माता-पिता की संपत्ति पूरा अधिकार है। हमारे देश में विवाह न केवल पुरूष और महिला के बीच का बंधन है बल्कि यह परिवारों के बीच का भी बंधन है। विवाह स्त्री-पुरूष के बीच यौन संबंधों को वैधता प्रदान करता है और उस विवाह से उत्पन्न संतान कानून और समाज की दृष्टि से वैध मानी जाती है। महानगरों में आज बहुत से जोड़े बिना विवाह के लिव इन में रह रहे हैं। समाज का एक बड़ा तबका आज भी इसे बिना विवाह के यौन इच्छाओं को पूरा करने का तरीका मानकर खारिज करता है।
संचार क्रांति के आने के बाद से सेक्स के बारे में लोगों के ज्ञान पर पोर्नोग्राफी बहुत हावी है। पोर्न फिल्में देखने वालों में ज्यादातर युवा छोटे कस्बे और शहरों के लोग हैं। हमारे देश में सेक्स को लेकर दो समस्याएं हैं एक तो दमित यौन इच्छा को अक्सर बेहूदे तरीके से सामने लाया जाता है। दूसरे हम सेक्स से संबंधित किसी भी विषय पर चर्चा करने, बहस करने से कतराते हैं। सेक्स की बातों को अश्लीलता के साथ जोड़कर देखते हैं, जबकि यह हमारे जीवन का अहम हिस्सा है। सेक्स संबंधी अज्ञानता के कारण हमारे देश में एचआईवी पॉजिटिव की संख्या में लगातार इजाफा हुआ है। भारत में 2019 की रिपोर्ट के अनुसार एचआईवी पाजिटिव के 23.48 लाख पाये गये हैं। अनुराग कश्यप और उनकी बेटी की बातचीत को यदि ध्यान से सुना जाये तो उसमें ऐसी कोई अश्लीलता या आपत्तिजनक बातचीत नहीं है जिस पर हम लोग बात नहीं करते। अनुराग कश्यप तो महिलाओं को होने वाले पीरियड्स को लेकर सही कह रहे हैं कि मैं पीरियड्स पर राय क्यों रखूंगा? पुरूषों को इस पर कोई राय नहीं रखनी चाहिए क्योंकि वे इसका अनुभव नहीं करते हैं। दरअसल हमारे देश में चोरी छिपे, व्हाट्सअप, यूट्यूब पर बैठकर आपसी बातचीत में तो लोग पोर्न फिल्मों को देखते हैं, उसे आपस में शेयर करते हैं किन्तु साहसिक रूप में सामने आकर उस पर बातचीत करने से घबराते हैं। हमारे घरों से दूल्हे की बारात रवानगी के बाद स्त्रियों द्वारा पुरूषों की अनुपस्थिति में होने वाला नकटोरा जिसमें स्त्रियां पुरूष का वेश धारण करके आपस में गीत संगीत प्रहसन के जरिए ऐसी-ऐसी बातें करती हैं जो एक सभ्य समाज में अश्लील समझी जाती है। वे इस रस्म के जरिए अपने भीतर की सेक्स संबंधी वर्जनाओं को बाहर निकलती है, उसका प्रकटीकरण करती है। यह परपंरा लंबे समय से हमारे समाज में प्रचलित है।

नई पीढ़ी को यह समझ में आने लगा है कि किसी भी प्रकार के सुख और आनंद के लिए अब पाप या पवित्रता का कोई लेना-देना नहीं है। सारा मामला फिजिकल है। यह सुखद है कि नई पीढ़ी और उनके परिवार पुराने विचारों के प्रति एक विरोध और प्रतिकार का रूप तैयार कर रहे हैं। उन्हें लगने लगा है कि बच्चों को यौन शिक्षा भी जरूरी है। यह शिक्षा कैसे दी जा सकती है इस पर विचार किया जा सकता है और किया जाना चाहिए। बहुत संभव है कि इसका पाठ्यक्रम भी हम पश्चिम से ग्रहण करें, लेकिन जरूरी यह है कि इसमें बाजार का दखल न शुरू हो जाए वरना सारी शिक्षा कंडोम और स्टेफ्री के आसपास सिमट जाएगी और बाजार के हित के अधीन हो जाएगी।