breaking news New

II संपादकीय : राज्यपाल का धर्म II

II संपादकीय : राज्यपाल का धर्म II

महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोशियारी की एक चिटठी इन दिनों चर्चा में है. मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को यह पत्र लिखते हुए उन्होंने मंदिरों को फिर से खोलने के लिए समाज के विभिन्न वर्गों से बार-बार उठ रही मांग का उल्लेख किया है जिसका जवाब ठाकरे ने दिया है. राज्यपाल ने पत्र में लिखा कि 'ये विडंबना है कि एक तरफ सरकार ने बार और रेस्तरां खोले हैं, लेकिन दूसरी तरफ पूजा स्थलों को नहीं खोला गया है. आप हिंदुत्व के मजबूत पक्षधर रहे हैं. आपने भगवान राम के लिए सार्वजनिक रूप से अपनी श्रद्धा जाहिर की. मुख्यमंत्री बनने के बाद आप अयोध्या भी गए. आषाढ़ी एकादशी पर आपने पंढरपुर जाकर विट्ठल रुक्मिणी मंदिर में पूजा की थी. मुझे इस बात को लेकर बहुत हैरानी हो रही है कि क्या आपको इस बात की कोई दैवीय आहट मिल रही है कि अगर मंदिर खोले जाएंगे तो संकट आ जाएगा? या फिर आप अचानक सेक्युलर हो गए, जिस शब्द से आप बहुत नफरत करते थे. मैं आपसे अपील करता हूं कि कोरोना के लिए जरूरी एहतियात के साथ मंदिर खोल दिए जाएं.

पत्र के सवाल का जवाब पत्र से देते हुए मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने कहा कि 'आपने अपनी चिट्ठी में जो मेरे हिंदुत्व का पक्षधर होने का उल्लेख किया, वो गलत है. हिंदुत्व के लिए मुझे आपके सर्टिफिकेट की जरूरत नहीं है. आपने मुझसे पूछा है कि क्या मैं अचानक सेक्युलर हो गया हूं? अगर मैं मंदिर खोल दूं तो हिदुत्ववादी और मंदिर न खोलूं तो सेक्युलर..क्या आपकी यही सोच है? आपने राज्यपाल के तौर पर संविधान की शपथ ली है. क्या आप सेक्युलरिज्म को नहीं मानते? अन्य राज्यों में जो हो रहा है, उसका मैं अध्ययन कर रहा हूं और महाराष्ट्र के लिए जो बेहतर है, उसे लागू करने की कोशिश कर रहा हूं.'

चूंकि मुद्दा लोगों की भावनाओं से जुड़ा है, इसलिए इस पर सियासत भी जमकर हो रही है. पिछले एक हफ्ते से मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा, महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना और बहुजन वंचित आघाड़ी के समर्थकों ने कई शहरों में प्रदर्शन किया. वे यह मांग कर रहे हैं कि पूजा स्थलों को फिर से खोला जाए, हालांकि इसके उलट कांग्रेस, एनसीपी या अन्य धर्मनिरपेक्ष दलों ने मस्जिद, गुरूद्वारे या गिरिजाघर खोलने के संबंध में मुंह तक नही खोला है जबकि वे जानते हैं कि यह उनके वोटबैंक का आधार है. महाराष्ट्र में मार्च के अंतिम सप्ताह से सभी धार्मिक स्थान बंद हैं. अब छह महीने से ज्यादा समय बीत चुका है. राजनीतिक और धार्मिक संगठनों की बार-बार मांग के बावजूद महाराष्ट्र में शिवसेना-एनसीपी-कांग्रेस गठबंधन सरकार ने मंदिरों को फिर से खोलने से इनकार कर दिया है जबकि राज्य में बार, शराब की दुकानें और रेस्तरां फिर से खोल दिए गए हैं.

राज्यपाल की पूरी चिटठी यदि आप पढ़ेंगे तो उसकी भाषा एक मुख्यमंत्री को नसीहत देने या कटाक्ष करने जैसी लगती है. स्पष्ट है कि दोनों पक्षों ने मर्यादाओं का उल्लंघन किया. राज्यपाल ने भी ऐसी बात कही जो उनकी पद के हिसाब से सही नहीं है. मुख्यमंत्री ने भी राज्यपाल की बात का जिस अंदाज़ में जवाब दिया, वो भी उनके पद की गरिमा के अनुकूल नहीं है. मुख्यमंत्री को भी राज्यपाल को जवाब देते समय संयम बरतना चाहिए था. पर चूंकि शुरूआत गवर्नर की ओर से हुई है इसलिए उन्हें नसीहत है कि संवैधानिक पद पर बैठने के बाद सिर्फ हिन्दुत्व के बजाय यदि वे सर्व—धर्म आस्था स्थलों को खोलने की सलाह देते तो ज्यादा प्रभावी और स्वीकार्य होता. सिर्फ मंदिरों की बात उठाकर कोश्यारी ने अपनी धर्मनिरेपक्ष शपथ का उल्लंघन ही किया है.

वैसे जमीनी हकीकत बिलकुल अलग है. महाराष्ट्र में मंदिरों को फिर से खोलने की मांग को लेकर प्रदर्शन हो रहे हैं. मंदिर खोले जाने के आंदोलन की शुरुआत शिरडी के साईं मंदिर से हुई. कोरोना की वजह से साईं बाबा के मंदिर के दरवाजे छह महीने से श्रद्धालुओं के लिए बंद हैं. रोज़ाना पूजा-अर्चना के लिए सिर्फ मुख्य पुजारी को ही अंदर जाने की इजाज़त है. चूंकि शिरडी में श्रद्धालुओं की वजह से हजारों लोगों को रोजगार मिलता है, हजारों घरों का चूल्हा जलता है इसलिए लोग मंदिर को खोलने की मांग कर रहे हैं. यहां पर न्यायिक दृष्टि यह है कि खुद सीएम ठाकरे नियमों को तोड़ चुके हैं. लोग तो ये भी पूछते हैं कि जब उद्धव ठाकरे 1 जुलाई को अपने परिवार के साथ पूजा के लिए पंढरपुर मंदिर का दरवाज़ा खुलवा सकते हैं तो जनता के लिए क्यों नहीं? क्या उद्धव की भक्ति में शक्ति है और आम आदमी की इबादत सियासत है? मेरा कहना तो ये है कि जैसे बार खुले, जैसे रेस्टौरेंट खुले वैसे ही कोविड गाइडलाइंस का पालन करते हुए शर्तों के साथ, सावधानी के साथ, आस्था स्थल भी खोल दिए जाने चाहिए. देश की जनता का यह सवाल जायज है कि जब शराब दुकानें खुल सकती हैं तो धार्मिक स्थल क्यों नहीं!