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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से -काम के एकांत को प्रदर्शन में बदलने का उद्योग

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से  -काम के एकांत को प्रदर्शन में बदलने का उद्योग

- सुभाष मिश्र

हमारे देश में काम यानी सैक्स के एकांत को प्रदर्शन के उद्योग में बदलने के नये खुलासे के बाद अब यह चर्चा जोरों पर है कि नई अर्थव्यवस्था के लिए बाजार के दरवाजे खोले गए और बाजार अपने साथ यूरोपीय बाजारू संस्कृति लेकर आया। अश्लीलता उनके लिए बाजार का एक उपकरण था, हमारे लिए गोपन इच्छाओं की उदार अभिव्यक्ति। इस तरह भारत में पोर्न के लिए बाजार ने जगह बनाई। इसके बाद अनेक भारतीय उद्योगपतियों को भी इसमें आर्थिक अवसर नजर आए। फिल्मों में अश्लीलता का जोर बढ़ा और ओटीटी प्लेटफॉर्म और ऐसी अनेक संरचनाओं ने मुक्त देह का मुक्त आनंद की तरह प्रस्तुत किया। बाजार ने देह, धन और अश्लीलता का एक सामंजस्य तैयार किया जिसके परिणाम में सब कुछ खुले में आ गया। एक रात यानी वन नाईट स्टेंड के रिश्ते तात्कालिक आनंद के पर्याय के रूप में सामने आने लगे हैं। इसमें नैतिक आग्रह और आत्मिक प्रेम के बंधन भी टूटने लगे हैं।

भारतीय सिनेमा में एक दौर ऐसा भी आया जब कहा जाने लगा कि सिनेमा में या तो शाहरुख खान बिकता है या फिर सैक्स। डर्टी पिक्चर जैसी फिल्म आई जिसमें कहा गया कि फिल्मे केवल तीन चीजों से चलती हैं एंटरटेनमेंट, एंटरटेनमेंट और सिर्फ एंटरटेनमेंट। इंटरनेट आने के बाद दुनिया वाकई ग्लोबल विलेज में तब्दील होने लगी। दुनिया भर की नई-नई लाईव जानकारी के साथ ओटीटी प्लेटफार्म के जरिए नया सिनेमा, नई दुनिया और पोर्न फिल्म का बाजार भी आया। भारतीय सिनेमा के दर्शक ने पोर्न फिल्म की अभिनेत्री सनी लियोनी को भी सहज स्वीकारा। इंटरनेट कनेक्शन के जरिए मोबाईल, लैपटाप, कम्प्यूटर, टैबलेट पर आपको अपनी सुविधा का संसार, जानकारी सुलभ होने लगेगी। कामुकता और सैक्स के प्रति सहज जिज्ञासा के चलते इसका बाजार भी धीरे-धीरे बड़ा होने लगा। कम लागत में अधिक मुनाफे की लालसा में राज कुंद्रा और उन जैसे बहुत से उद्योगपति जिनका संबंध सिनेमा, क्रिकेट जैसी ग्लैमरस दुनिया से था, इस धंधे में शामिल होने लगे। अश्लीलता का मुद्दा बहस और विवाद कोई नया नहीं है। यह बरसों से चला रहा है। काफी प्राचीन समय से लेकिन इसके अब रूप बदलते जा रहे हैं। अब बाजार ने अश्लीलता को एक आक्रामक के रूप में सामने रखा है। कामुकता को प्रकट में दर्शन और परोक्ष में एक मूल्य की तरह स्थापित किया जा रहा है।

अश्लीलता ने एक नए उद्योग को जन्म दिया है। पिछली सदी में 'चोली के पीछे क्या है जैसे गाने पर चिल्लाने वाले लोग नई सदी में ओटीटी प्लेटफॉर्म के लगभग पोर्न दृश्य देखकर आपदा में घिरे विलाप कर रहे हैं। पिछली सदी के उत्तरार्ध में जब बाजार का आगमन हुआ था तब बाजार के लिए दरवाजा खोलने वाली सरकार को भी ऐसी आपदा की कल्पना नहीं थी। अब पर्दे पर सोशल मीडिया पर चुंबन और नग्नता के रहस्य खत्म हो चुके हैं। नैतिकता की कंदरा ढह चुकी हैं। उत्तर आधुनिकता ने अश्लीलता की नई मीनारें खड़ी कर दी हैं। ओटीटी प्लेटफॉर्म और ऐसी अनेक संरचनाओं ने अश्लीलता को बेडरूम से बाहर निकाल कर ड्राइंग रूम और फिर बाजार में खड़ा कर दिया है। हर हाथ में थमा मोबाइल अब एक स्क्रीन है, जहां पोर्न की सुविधा अश्लीलता के बाजार को समृद्ध कर रही है। बाजार की आर्थिक गति को लेकर चिंतित सरकार समझ नहीं पा रही है कि इस तरह के नए खुलते जा रहे पोर्न उद्योगों पर किस तरह की बंदिश लगाए और किस तरह तकनीकी उद्योग को बढ़ावा दे। अकेले राज कुन्द्रा को गिरफ्तार करने से कानून का हाथ सिर्फ सतह पर है। पोर्न के पुराने उद्योग को नए रूप में प्रस्तुत करने का यह एक अंतरराष्ट्रीय गिरोह है। तकनीकी विकास के साथ-साथ इसमें अभी और भी परिवर्तन होंगे। स्थितियाँ ज्यादा पेचीदा होंगी। नई पीढ़ी देह, काम आदि को बाजार द्वारा परोसी गई सामग्री से समझ रहा है। इन तमाम चीजों से मनुष्य के भीतर की संवेदनशीलता खत्म हो रही है। यह एक खतरनाक बात है।

पुलिस ने पोर्न फिल्म मामले में कुछ समय पहले एक्ट्रेस गहना वशिष्ठ सहित 9 लोगों को गिरफ्तार किया था। इस मामले में दो एफआईआर दर्ज की गईं। उनके द्वारा शूट की गई फिल्मों को पेड मोबाइल ऐप्लिकेशन पर रिलीज किया गया था। पुलिस पूछताछ के बाद खुलासा हुआ कि राज कुंद्रा और उनके बहनोई प्रदीप बख्शी भारत और यूनाइटेड किंगडम में स्थित उनकी सामग्री निर्माण कंपनियों के माध्यम से संचालित एक अंतरराष्ट्रीय पोर्न फिल्म रैकेट के कथित मास्टरमाइंड हैं। दोनों कंपनियों के पास केनरिन लिमिटेड द्वारा विकसित हॉटशॉट्स डिजिटल एंटरटेनमेंट नामक एक मोबाइल ऐप था। हॉटशॉट्स ऐप को दुनिया का पहला 18+ ऐप के रूप में वर्णित किया गया है, जो विशेष फ़ोटो, लघु फिल्मों और हॉट वीडियो में विश्व स्तर पर कुछ सबसे हॉट मॉडल और सेलेब्स को प्रदर्शित करता है, जिसमें सॉफ्ट-टू-हार्ड पोर्न शामिल है। पोर्न फिल्म के खेल में सिनेमा के जरिए अपनी पहचान, पैसा और ग्लैमर को लेकर मुंबई आने वाली नई या महत्वाकांक्षी अभिनेत्रियों को लघु फिल्मों, वेबसीरीज और अन्य फिल्मों में काम के प्रस्तावों का लालच देकर उन्हें ऑडिशन के लिए बुलाया जाता रहा और बोल्ड दृश्यों के लिए चयन के बाद, जो अर्धनग्न और फिर पूर्ण-नग्न शूटिंग की जाती थी। कुछ मामलों में अभिनेत्रियों की सहमति होती है, कुछ में महत्वाकांक्षा या कहे मजबूरी।

भारत का सबसे बड़ा पोर्न बाजार मेरठ है, जो कभी 1857 के सिपाही विद्रोह के लिए प्रसिद्ध था, लेकिन अब भारत के कम ज्ञात ओवर द टॉप (ओटीटी) प्लेटफार्मों को कामुक फिल्मों की थोक आपूर्ति करता है। मेरठ से कई भाषाओं में अनुमानित 50 से 75 फिल्मों का निर्माण किया जाता है, जिसे कई लोग पवित्र मानते हैं क्योंकि यह गंगा और यमुना नदियों के बीच स्थित है। भारत में उल्लूू, कूकू, देसीफ्लिक्स, हॉट शॉट्स, प्राइमफ्लिक्स, गप चुप, फ्लिज़मोव, उल्लू काल सेंटर, कविता भाभी, पलंग टॉड, टैक्सी, वाइफ अन ए मेट्रो, चार्मसुख, मोना होम डिलीवरी सर्वाधिक देखे जाते हैं। ब्लाइंड कोठा, भैया की बीवी और सहेंली जैसे कुछ धमाकेदार शो हैं। फिर देसीफ्लिक्स है, जिसमें शिलाजीत, लव सहित ऐस कई शो हैं और इस तरह के कई प्लेटफॉर्म पर लाखों भारतीय दिन-रात अपनी उच्च कामुक सामग्री के साथ जुड़े हुए हैं।

इस नए तकनीकी युग में ओटीटी प्लेटफॉर्म जैसी संरचनाओं ने बच्चे से लेकर बूढ़े तक को काम के गुप्त रहस्य को नैतिकता के बंद दरवाजे से बाहर निकालने के लिए हाथ में एक रिमोट थमा दिया है। वीसीआर उसके बाद डीवीडी प्लेयर पर बंद कमरे में अश्लीलता का हासिल सुख, अब सर्व सुलभ होकर नैतिकता के प्राचीन मापदंडों को दुत्कार रहा है। पहले फिल्मों में नायक-नायिका पहाड़, बाग-बगीचे या नदी के किनारे गीत गाते हुए प्रेम प्रदर्शित करते थे। वह प्रेम नए संचार माध्यमों में बिस्तर पर आ गया है और गीतों का स्वरूप भी बदल गया है। सड़क पर या स्टेज पर नर्तकों की भारी भीड़ के साथ नायक-नायिका रतिक्रियाओं की नाटकीय भावाभिव्यक्ति के साथ जो प्रस्तुत करते हैं वह बेडरूम का प्रेम है जो सड़क पर आ गया है। काम का एकांत नष्ट हो चुका है। उसके प्रदर्शन को आनंद में बदलकर उद्योग खड़ा किया गया है। चूँकि हमारे सांस्कृतिक और सामाजिक जीवन में कभी भी अर्थशास्त्र का दखल नहीं रहा। हमने हमेशा इसे पृथक करके देखा, परिणाम यह हुआ कि हमारी विराट सांस्कृतिक विरासत के स्वरूप को जब बाजार नष्ट कर रहा था, हम सही समय पर नहीं देख पाए। आज स्थिति यह है कि काम और नग्नता हमारे सामाजिक जीवन का न तो सहज हिस्सा रह गया है और ना बहुत ज्यादा गोपन। इसलिए अश्लीलता और नैतिकता का एक नया धुंध खड़ा हो गया है जिसे राजनीतिज्ञ अपने अधकचरा ज्ञान के सहारे ना तो समझ पा रहे हैं और ना ठीक से व्याख्यायित कर पाए हैं।

पहले जब संयुक्त परिवार में टेलीविजन पर कार्यक्रम देखते हुए कंडोम का विज्ञापन आ जाता था तो परिवार में एक भयातुर नैतिकता का सन्नाटा छा जाता था। अब ऐसा नहीं है। कंडोम का विज्ञापन परिवार नियोजन की सरकारी भाषा से निकलकर सहवास की सुरक्षा पर बल दे रहा है। इसने समाज की सांस्कृतिक बनावट को चुनौती दी है। माहौल में एक अजीब तरह का ऊबाल है। धर्म ध्वजा धारण किए लोगों को भी परेशानी आ रही है। पर्याप्त ज्ञान ना होने के कारण और समय की नब्ज पर हाथ ना होने से वे सिर्फ छाती कूट विलाप कर रहे हैं लेकिन अब काम के खुले पन ने देह से कपड़े हटा दिए हैं। देह की जरूरत अब कामुकता के सुख और खेल में बदल गई है। काम का खेल में बदलना एक नई चिंता है।

भारतीय दंड संहिता की धारा 292 के अनुसार किसी चीज को अश्लील माना जाएगा यदि वह कामुक है या हित के लिए अपील करती है। इसके कई प्रावधानों के तहत जो ऐसी किसी भी सामग्री को बेचने, किराये पर लेने, वितरित करने पर रोक लगाते हैं। भारतीय दंड संहिता की धारा 293 कहती है कि जो कोई भी बीस साल से कम उम्र के किसी भी व्यक्ति को ऐसी किसी भी अश्लील वस्तु को बेचता है, किराए पर देता है, वितरित करता है, प्रदर्शित करता है या प्रसारित करता है। पिछले पूर्ववर्ती ऐसा करने का प्रयास, दंडित किया जाएगा।

आईटी अधिनियम में धारा 67 में यह प्रावधान कहता है कि जो कोई भी प्रकाशित या प्रसारित करता है या इलेक्ट्रॉनिक रूप में प्रकाशित या प्रसारित करने का कारण बनता है, कोई भी सामग्री जो कामुक है या विवेकपूर्ण हित के लिए अपील करती है या यदि इसका प्रभाव ऐसा है जो भ्रष्ट करने के लिए है और भ्रष्ट व्यक्ति, जो सभी प्रासंगिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए, इसमें निहित या सन्निहित मामले को पढऩे, देखने या सुनने की संभावना रखते हैं, को दंडित किया जाएगा।