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होली की आग- ध्रुव शुक्ल

होली की आग- ध्रुव शुक्ल


दादी घर में थोड़ी-सी आग छिपाकर रखती थी। उसे जब चूल्हा जलाना होता, थोड़ी-सी आग बाहर निकालती, उससे चूल्हा जलाती और भोजन पकाने के बाद बची हुई आग को फिर से छिपा देती। दादी के मिट्टी के कूँढ़े में भरी राख में आग छिपी रहती। जब कभी जोर की हवा चलती तो राख से आग झाँकती। दादी उसे फिर राख से ढँक देती। कूँढ़े में राख रोज बढ़ जाती थी। उससे घर के बर्तन माँजे जाते। कभी जब मंजन खत्म हो जाता, हम इसी राख से दाँत भी माँज लेते। जैसे बर्तन चमकते वैसे ही दाँत चमकने लगते।

मैं कहता, किसी दिन आग लग जायेगी घर में।

दादी कहती, यह आगी तो देवता है। कोई देवता को बुझाता है। देवता हमेशा अपने पास रहना चाहिए। घर की आग ठण्डी हो जाये, यह असगुन माना जाता है। वह कहती, जबसे इस घर में आयी हूँ इस घर की आग कभी ठण्डी नहीं हुई। मैं सोचता, अगर पूरी दुनिया की आग ठण्डी हो जाये तो मेरे घर में ज़रूर बची रहेगी।

फागुन की पूर्णिमा को होली जलती थी। हम उसी होली से थोड़ी-सी आग उठाकर घर लाते और हमारे घर की छोटी-सी होली जलती। मुहल्ले के लोग होली के लिए अपने घर से एक लकड़ी ज़रूर देते थे। एक समय ऐसा आया कि होली जल नहीं रही थी बस धुँधवा रही रही थी। जब लकड़ी ही शामिल नहीं थी किसी की तो आग कहाँ से पैदा होती।

इतनी ठण्डी आग कि घर लाते-लाते रास्ते में ही बुझ जाती। मैंने दो-तीन बार उठायी पर आग नहीं उठा पाया। दादी चुपचाप घर में गयी और अपने कूँढ़े से थोड़ी-सी आग लेकर आयी। हमारे घर के सामने छोटी-सी होली जल उठी। पड़ौसी भी हमारे घर से थोड़ी-थोड़ी आग उठाकर ले गये। सबने मिलकर गेहूँ की नयी बालें भूनकर खायीं। दादी जितनी आग निकालकर लायी उतनी ही फिर वापस ले गयी।

दादी इसे नयी आग कहती थी। मैं पूछता, आग में नया और पुराना क्या? दादी कहती, नया अन्न पकने से आग नयी होती है।