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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - निजीकरण के साथ मूल्यों की गिरावट का समय

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - निजीकरण के साथ मूल्यों की गिरावट का समय

-सुभाष मिश्र, प्रधान संपादक

एक भीषण और भयावह समय हमारी देहरी पर खड़ा है। इस भयावह समय के संकेत केवल इतने नहीं है कि नागरिक सुविधाओं दूरसंचार और रेलवे के निजीकरण हो रहे हैं। स्वास्थ्य शिक्षा के साथ-साथ, धीरे-धीरे वे सभी योजनाएं वे उपक्रम जो जनहित से जुड़ी हैं, जो लोक सेवा के अंतर्गत आती थी, अब निजीकरण के लोभ के कब्जे में हैं। अब बड़े उद्योगपतियों ने पानी, बिजली, राष्ट्रीय राजमार्ग और अब कृषि जैसे जनहितकारी और आमजन, गरीब, किसानों का एकमात्र सहारा इस क्षेत्र को भी छिनने के प्रयास में लगे हुए हैं। उस पर जैसा हमला हो रहा है यह इस बात का संकेत है कि आने वाला समय और दुरुह होगा। किसानों और मजदूरों के लिए आने वाला समय बेहद कठिन होने वाला है। श्रम और श्रम से पैदा होने वाले उत्पाद पर बड़े उद्योग-घरानों की नजर है। मूल्यों की गिरावट का यह चरम समय है, चाहे वह सामाजिक मूल्य हो, चाहे नैतिक मूल्य। जीवन के हर क्षेत्र से व्यवसाय, व्यवहार के नाम पर मूल्य खत्म किए जा रहे हैं। मूल्यों के खत्म किए जाने के षड्यंत्र को जायज ठहराने के लिए अनेक उपक्रम किए जा रहे हैं। राज्य के मूल्यों की गिरावट की दर्शनीय आभा में आमजन इसे नए जीवन दर्शन की तरह देख रहा है। आज साम्राज्यवादी शक्तियां नई टेक्नालॉजी और सूचना-संसार के नए माध्यमों के सहारे वैश्विक गरीबी को भाग्य और नियति के हवाले कर रही है। अमीर और अधिक अमीर होते जा रहे हैं। उद्योग-घराने जिनका एक ही ध्येय रह गया है कि एक व्यापकता मनुष्यता को घोर गरीबी की ओर धकेलना और अपने जैसे अल्पसंख्यक बिरादरी को और अधिक समृद्घ करते जाना। आने वाले समय में विदेशी साम्राज्यवादी शक्तियां विकासशील देशों को पराधीन करने के लिए आर्थिक रुप से कमजोर करेंगे जिसके लिए गृहयुद्घ की स्थितियां निर्मित की जाएंगी और महामारी फैलाई जाएगी। देसी उद्योग घराने इसका लाभ उठाएंगे और आपदा को अवसर में बदलेंगे, यह अवसर विशुद्घ रुप से आर्थिक होगा। विश्व व्यापार संगठन के अंतर्गत व्यापार की परिभाषा ही बदल दी जा रही है। नई नीतियां और गतिविधियों में साहित्य, संस्कृति, कला, खेल, सामुदायिक सेवा आदि सभी सरकारी उपक्रम निजी निगमों के हवाले होते चले जाएंगे। आने वाले अराजक समय में घोर गरीबी से सामना होगा। पर्दे के पीछे सत्ता औद्योगिक घरानों के हाथों में होगी। बड़े औद्योगिक घराने अपने आर्थिक हित के लिए सत्ता का संचालन परोक्ष रुप से अपने हाथ में रखेंगे। देश की एकता और सामुदायिक सत्ता के लिए बुरा समय आने वाला है। कोई भी साम्राज्यवादी शक्ति हो वह सामान्य जन की एकता को अपने लिए खतरा मानती है। वर्तमान में भारत में किसान आंदोलन की खिलाफत करना इसका बड़ा उदाहरण है। पूरे विश्व में गरीबों और किसानों को पराधीन और कमजोर करने की सफल कोशिशें शुरु हो चुकी है। नवीन आर्थिक व्यवस्था में प्रकृति के आर्थिक दोहन के लिए उसके नष्ट किया जा रहा है। प्रकृति को नष्ट करने की कोशिश एक नए विनाश की संभावनाओं को सामने ला दिया है। इसके साथ ही सामाजिक विषमता को बढ़ावा दिया जा रहा है। एकता खंडित की जा रही है। जातीय और धर्म आधारित संघर्ष को बढ़ावा दिया जा रहा है। इस तरह के नस्लीय संघर्ष अब यूरोप में भी बढऩे लगे हैं। खतरा अब वैश्विक है।

बढ़ते निजीकरण और मूल्यों की गिरावट के बहुत से उदाहरण हम अपनी आंखों के सामने देख सकते हैं। जब पूरा देश आर्थिक तंगी से जूझ रहा है तब कुछ औद्योगिक घरानों की निजी संपत्ति में अकूत वृद्घि हो रही है। जब सरकारी कंपनियां जिनमें हवाई कंपनी से लेकर दूरसंचार कंपनियां भी शामिल हैं। अपने बढ़ते घाटे और साख के कारण निजी हाथों में सौंपे जाने को विवश है। मीडिया को किसान आंदोलन, श्रमिक आंदोलन और आमजनों की दुख तकलीफ से कोई खास लेना-देना नहीं है। बहुत सारे मीडिया हाउस का संचालन निजी कंपनियां कर रही हैं, जिनके ताल्लुक बड़े औद्योगिक घरानों से है। आम आदमी का संघर्ष रंगीन टीवी सेट से लगभग नदारद है।

हमारे नागरिक अधिकारों में हमें स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार के साथ सम्मानजनक तरीके से जीने का अधिकार प्राप्त है। सरकार की बुनियादी नैतिक जि़म्मेदारी है कि वो जनता को क़ानून-व्यवस्था, भोजन और शिक्षा जैसी जीवन-यापन के लिए ज़रूरी सुविधाएं प्रदान करें। बहुत सारे क्षेत्रों में कई-कई कारणों से सरकार अपनी जि़म्मेदारी के निर्वहन में पूरी तरह से सफल नहीं हो पा रही है। हमारे देश के 30.35 प्रतिशत बच्चे निजी स्कूलों में पढ़ते हैं। सरकारी स्कूलों की संख्या और उपलब्धता के बावजूद गुणवत्तायुक्त शिक्षा के नाम पर लोग अपने बच्चों को निजी स्कूलों में भेजना चाहते हैं। सरकारी अस्पतालों के बजाय लोग निजी अस्पतालों में इलाज कराना चाहते हैं। आंतरिक कानून-व्यवस्था के लिए हमारे देश में कऱीब 17 लाख पुलिसकर्मी है और 70 लाख सिक्योरिटी गॉर्ड हैं, जो निजी कंपनी के कर्मचारी हैं। दूरसंचार सेवाएं एमटीएनएल और बीएसएनएल के बुरे हाल हैं। जब दूरसंचार क्रांति हुई और इसे निजी क्षेत्र के लिए खोल दिया गया तो पूरा परिदृश्य बदल गया। पहले सीपीडब्ल्यूडी और पीडब्ल्यूडी सरकारी सड़कें बनाती थीं, अब अधिकांश सड़कें प्रायवेट लोग बनाकर वसूली कर रहे हैं।

अब भारतीय रेल 151 रेलगाडिय़ों का संचालन निजी क्षेत्र के जरिये करने जा रहा है। रेलवे बोर्ड के चेयरमैन का कहना है कि अप्रैल 2023 में निजी रेल सेवाएं शुरू हो जाएंगी और ये भारत के रेलवे नेटवर्क पर यात्री ट्रेनों के संचालन में निजी क्षेत्र के निवेश का पहला प्रयास है। भारतीय रेलवे 67415 किमी के मार्ग की लंबाई के साथ आकार में दुनिया के चौथे सबसे बड़े रेलवे नेटवर्क का प्रबंधन करता है। सरकार के आंकड़ों के अनुसार, भारतीय रेलवे को अगले 12 साल के लिए 50 लाख करोड़ रुपए की जरूरत होगी, जबकि सरकार के पास इतना रुपया केवल इस सेक्टर पर खर्च करने के लिए नहीं है।  

देश में मुनाफे वाली बिजली कंपनी को पहले चरण में निजी हाथों में सौंपे जाने का मसौदा केंद्र सरकार ने राज्यों को जारी कर दिया है। इसके तहत एक रुपए में बिजली कंपनी को संचालन के लिए निजी कंपनी को सौंप दिया जाए। इसकी सुगबुगाहट के साथ ही चीफ  इंजीनियर से लेकर लाइनमैन तक के कर्मचारी ने बिजली कंपनी निजीकरण विरोधी मोर्चा भी गठित कर दिया हैै। 2003 में बिजली विभाग खत्म कर कंपनीकरण भी इसी तरह हो गया था।   

किसानों की कर्जमाफी पर सियापा करने वाले लोगों को शायद मालूम नहीं होगा कि हमारे देश के अमीरों के 3 लाख करोड़ लोन माफ हुए हैं। पिछले चार सालों में 21 सरकारी बैंकों ने 3 लाख 16 हजार करोड़ के लोन माफ किए गए हैं। यह भारत के स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा के कुल बजट का दोगुना है। 21 सरकारी बैंकों ने संसद की स्थायी समिति को जो डेटा सौंपा है उसके अनुसार इनकी लोन रिकवरी रेट बहुत कम है, जितना लोन दिया है, उसका मात्र 14. 2 प्रतिशत लोन ही रिकवर यानि वसूल हो पाता है।

बहुत सारे लोग निजीकरण के हिमायती हैं। उन्हें सरकारी तंत्र की कारगुजारियो, निकम्माई और कार्य के प्रति रवैय्या पसंद नहीं है। देश में उदारीकरण के बाद से लोगों को लगता है बहुत तरक्की हुई है, रोजगार के अवसर बढ़े हैं। देश आर्थिक समृद्घि की ओर बढ़ रहा है। हमारा मीडिया और सत्ता, धन लोलुप शक्तियां निजीकरण को महिमामंडित कर रही है, जबकि हकीकत यह है कि निजीकरण के साथ ही हमारे सामाजिक और नैतिक मूल्यों में भारी गिरावट आई है। समाजिक जीवन में पूंजी का महत्व दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है।
कवि धूमिल की कविता है-
जैसे खेत में सुअर
वैसे दिमाग में पैसा।।