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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-निर्वाचन से नहीं, नीलामी से तय होंगे जनप्रतिनिधि

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-निर्वाचन से नहीं, नीलामी से तय होंगे जनप्रतिनिधि


चुनाव आयोग लाख आदर्श आचार संहिता, व्यय सीमा तय करे, सबको पता है कि हमारे देश में होने वाले चुनाव चाहे वे लोकसभा, विधानसभा, नगर निगम, नगर पालिका या पंचायत तक के क्यों न हो सबमें धन-बल का खुलकर उपयोग होता है। सभी राजनीतिक पार्टियां राजनीति में शुचिता की कितनी बातें क्यों न करें चुनाव में वही सारे हथकंडे, रणनीति, जाति, धर्म-संप्रदाय और क्षेत्रीयता के कार्ड खेले जाते हैं, जिसकी मनाही है। राजनीतिक पार्टियां और प्रत्याशी चुनाव के नाम पर बड़े पैमाने पर चंदा वसूली करते हैं, काला-पीला पैसा खर्च करते हैं और चुनाव के दौरान तरह-तरह की सामग्री बांटते हैं, प्रलोभन देते हैं। यह सच्चाई किसी से छिपी नहीं है कि यह पैसा जनसेवक बनने के लिए नहीं बल्कि पद, पॉवर पाकर इसे कई गुना वसूलने के लिए खर्च किया जाता है। जिसे जनता जनार्दन की सेवा करना है वह बहुत तरीके से सेवा कर सकता है किन्तु चुनावी राजनीति वह जरिया है जिसके जरिए जीत हासिल करके लाभ के पद पर काबिज हुआ जा सकता है।

भारत की आत्मा गांव में बसती है। गांव के लोग जानने लगे हैं कि पंचायत को तरह-तरह की योजनाओं से साल में कम से कम एक करोड़ रुपये तक की राशि आबंटित होती है। जिनमें से 10 से 20 प्रतिशत राशि सरपंच सहित बाकी प्रतिनिधि अपनी जेब के हवाले कर लेते हैं। सरपंच का पद अब लाभ का पद बन गया है, यही वजह है कि मध्यप्रदेश में पंचायत चुनाव अभी कई जिलों में नामांकन प्रक्रिया शुरू ही हुई है और अशोकनगर जिले के एक गांव में प्रधान (सरपंच) चुन लिया। सरपंच को यह चुनाव वोटिंग प्रक्रिया से नहीं होकर नीलामी प्रक्रिया से हुई है।

भारत में पंचायती राज के गठन व उसे सशक्त करने की अवधारणा महात्मा गांधी के दर्शन पर आधारित है। गांधीजी के शब्दों में सच्चा लोकतंत्र केंद्र में बैठकर राज्य चलाने वाला नहीं होता, अपितु यह तो गाँव के प्रत्येक व्यक्ति के सहयोग से चलता है।

हमारे देश की बहुत बड़ी आबादी गांवों में बसती है। माना जाता है कि जब तक हम गांव में विकास लोकतंत्र में सभी की भागीदारी सुनिश्चित करने और लोकतांत्रिक शक्तियों के विकेन्द्रीकरण के लिए पंचायती राज व्यवस्था की परिकल्पना की गई, लेकिन आज देशभर में ग्राम पंचायतों की जो छवि बनी है उससे हम इतना तो कह सकते हैं कि जिस सोच के साथ इसकी स्थापना की गई थी, वो पूरी होती नजर नहीं आ रही है। दरअसल हम आज पंचायती राज व्यवस्था पर बात इसलिए कर रहे हैं, क्योंकि मध्यप्रदेश के अशोकनगर जिले में एक बेहद चौंकाने वाला मामला सामने आया है..। यहां के भटोली नाम के गांव में लोगों ने सरपंच पद की बोली लगा दी। खुलकर ऐलान कर दिया गया कि जो ज्यादा पैसा देगा उसे निर्विरोध चुन लिया जाएगा। इस प्रक्रिया के तहत एक शख्स ने 44 लाख रुपए की बोली लगाई उस शख्स को गांव का अगला सरपंच बनाने की सहमति भी बना ली गई है। भटोली गांव के लोगों ने भले ही चुनाव के नियमों का पालन नहीं किया है, हो सकता है चुनाव आयोग इस पर अपना कोई फैसला भी ले, लेकिन भटोली के लोगों ने इसे साफ तौर पर स्वीकारा कि जो भी सरपंच बनेगा वो भ्रष्टाचार करेगा और गांव के विकास को ताक पर रखकर अपनी जेब भरेगा, तो क्यों न उससे पहले ही रकम जमा करा ली जाए। यानि एक तरह से लोकतंत्र का एक पैर तोड़कर उसे ठेकेदारी की बैसाखी पर खड़े करने की कोशिश यहां के लोगों ने कर दी है।

आज पंचायत के पंच पद से लेकर सांसद बनने तक के लिए जिस तरह से धन-बल का इस्तेमाल होता है, तो आम आदमी के मन में सीधा सवाल उठना स्वाभाविक है कि कोई जनता का सेवक बनने के लिए  इतना पैसा क्यों बहा रहा है। चुनाव जीतते ही जिस तरह आज नेताओं की संपत्ति बढ़ती है जिसका ब्यौरा भी यही नेता देते हैं उस पर किसी को भी अचरज हो सकता है कि आखिर महज सरकारी भत्तों से कोई कैसे इतना माल बना सकता है। इस तरह आज आम आदमी के मन में जनप्रतिनिधियों को लेकर छबि सेवक की नहीं बल्कि जनता के हक पर डाका डालकर करोड़ों डकारने वाले की बन गई है। शायद इसीलिए भटोली के लोगों ने अपने हक की बोली लगा दी। ये अपने आपमें इस तरह का मामला है जिस पर आज बहस की जरूरत है। साथ ही जनप्रतिनिधियों के लिए भी ये आत्मअवलोकन का वक्त है उन्हें भी अब समझना होगा कि अगर यही आलम रहा तो एक दिन हमारा पवित्र लोकतंत्र धन बल का गुलाम न हो जाए।

अगर पंचायत स्तर पर ही भ्रष्टाचार इस कदर व्याप्त हो जाए तो ऊपर की इकाईयों में तो और बड़े मौके बनते हैं। दरअसल पंचायती राज व्यवस्था जिसे लागू करने के दौरान गांधीजी की कल्पना के भारत बनाने की बात कही गई।  महात्मा गांधी अपने को ग्रामवासी ही मानते थे और गाँव में ही बस गये थे। गाँव की जरुरतें पूरी करने के लिये उन्होंने अनेक संस्थायें कायम की थीं और ग्रामवासियों की शारीरिक, आर्थिक, सामाजिक और नैतिक स्थिति सुधारने का भरसक प्रयत्न किया। उनका दृढ़ विश्वास था कि गाँवों की स्थिति में सुधार करके ही देश को सभी दृष्टि से अपराजेय बनाया जा सकता है।

वे ग्रामोत्थान को सब रोगों की दवा मानते थे। इसलिये संविधान में अनुच्छेद-40 के अंतर्गत गांधी जी की कल्पना के अनुसार ही ग्राम पंचायतों के संगठन की व्यवस्था की गई। गांधी जी का मानना था कि ग्राम पंचायतों को प्रभावशील होने में और प्राचीन गौरव के अनुकूल होने में कुछ समय अवश्य लगेगा, लेकिन बापू की सोच और आज पंचायती राज की हालत में दूरी लगातार बढ़ती जा रही है। नैतिकता और आत्मनिर्भरता की जगह पर रुपया, शराब और अन्य विलासिताओं ने ले ली है। आज चुनाव लडऩे का खर्च जितना बढ़ा है उससे तो लग रहा है कि आने वाले दिनों ने चुनाव सिर्फ पैसों वालों का इवेंट बन जाएगा। ऐसे में लोग ठगा सा महसूस करने लगे हैं क्या वे चुनावों में पानी की तरह पैसा बहाकर कुर्सी पर काबिज होने वाले के लिए भ्रष्टाचार करने के लिए मौका देने वाले बनकर रह गए हैं। जिस तरह धनबल पूरे सिस्टम पर हावी हो रहा है। उससे गणतंत्र की पवित्रतता बचाना बड़ी चुनौती है। गांधीजी पंचायत को अधिकार भोगने वाली संस्था न बनाकर सदभाव जागृत करने वाली रचनात्मक संस्था के रूप में विकसित करना चाहते थे, लेकिन ये लक्ष्य से भटकता नजर आ रहा है।

छत्तीसगढ़ में त्रिस्तरीय पंचायत राज संस्थाओं में ग्राम पंचायत मूल इकाई है। राज्य में 11658 ग्राम पंचायत हैं जिनमे से 5632 ग्राम पंचायत सरगुजा और बस्तर संभाग में आदिवासी बहुल पांचवी अनुसूचित क्षेत्र के ग्राम पंचायत हैं। 73वें संविधान संशोधन के साथ ही 11वीं अनुसूची में 29 विषयों से संबंधित कार्यों को इस संस्थाओ को सौंपा गया। इसके कारण वर्तमान परिदृश्य में प्रत्येक ग्राम पंचायतों में सभी योजनाओं से साल भर में 1 करोड़ से अधिक राशि स्वीकृत हो जाती है। इतनी अधिक राशि पंचायत को प्राप्त होने से पंचायत के मुखिया का पद आर्थिक दृष्टि से भी महवपूर्ण बन गया है। अगर शहरों से जुड़े पंचायतों की बात करें तो कालोनियों के विस्तार और भवनों के अनुज्ञा में प्राप्त होने वाली राशि से इन पंचायतों की वार्षिक आय लगभग 2 से 3 करोड़ पहुच जाती हैं। इसलिए सरपंच और पंचो के चुनाव में भी जमकर पैसा और अन्य साधनों का प्रयोग हो रहा है। पंचायत की मूलभावना जिसमे सहमति और सहयोग का जिक्र होता था वह अब पैसा और भ्रष्टाचार ने ले लिया है। राज्य में पूर्व पंचायत पदाधिकारियो से वसूली हेतु शेष लगभग 400 करोड़ इस बात की पुष्टि करते हैं। ऐसे माहौल में सरपंच के चुनाव को आम सहमति और निर्विरोध करना एक कठिन समस्या है। गलत बात का उपाय गलत तरीके से निकाल लेने की पहल में मध्यप्रदेश की पंचायत में सरपंच की बोली लगा देना एक नया कदम होगा जिसके दूरगामी परिणाम आएंगे।

इस तरह के हालात से बचने के लिए छत्तीसगढ़ में 2010 में ही एक फैसला लिया गया था कि जिन पंचयातों में प्रतिनिधियों का चुनाव निर्विरोध होगा उन्हें सरकार की ओर से प्रोत्साहन राशि दी जाएगी। पिछले चुनाव में छत्तीसगढ़ में 313 पंचायतों में निर्विरोध चुनाव हुआ था। इस योजना को लागू करने के पीछे सरकार का दावा था कि निर्विरोध या सर्वसहमति से चुनाव होने से गांव में टकराव की स्थिति नहीं बनती है।