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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-क्या ब्यूरोक्रेसी सत्ता के तलवे चाटती है

 प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-क्या ब्यूरोक्रेसी सत्ता के तलवे चाटती है


हमारी प्रजातांत्रिक व्यवस्था के जो चार महत्वपूर्ण स्तंभ हैं उनमें कार्यपालिका, न्यायपालिका, व्यवस्थापिका और मीडिया शामिल है। आज कल एनजीओ यानि स्वयंसेवी संस्था या कहें दबाव समूह की भूमिका भी पांचवें स्तंभ के रूप में महत्वपूर्ण हो गई है। यदि किसी राज्य में 15 साल मुख्यमंत्री रहने वाले सौम्य और शालीन छबि के नेता डॉ. रमन सिंह द्वारा सार्वजनिक रूप से यह बयान दिया जाए कि ब्यूरोक्रेसी सत्ता के तलवे चाटना बंद करे उनका समय आ गया है। नोट में जितना भी हिस्सा मिला है खा लो, लेकिन इस प्रकार की राजनीति और रणनीति करोगे तो तुम्हारा भी हिसाब-किताब समय के साथ होगा। मैं यह बात साफ शब्दों में बोलने आया हूं।

तो यह सवाल लाजिमी है कि क्या प्रदेश के ब्यूरोक्रेट शासन की तयशुदा नीति नियमों और निर्देशों के अनुरुप काम नहीं करके सत्ता के इशारे पर कुछ करने को तैयार है। कभी ब्यूरोक्रेट के भरोसे अपनी सरकार चलाने के लिए अपनी ही पार्टी के नेताओं के आरोपों से घिरे डॉ. रमन सिंह कांग्रेस की सत्ता में काम करने वाले कलेक्टर एसपी को चुनाव सभा से संबोधित या ललकारते हुए कहें कि यदि 'मैं मंच के माध्यम से सार्वजनिक खुलेआम चौक में बोल रहा हूं, कलेक्टर और एसपी कान खोलकर सुन लें। 3 साल हो गया है, 2 साल बाकी है, तुम्हारा भी हिसाब-किताब लिखा जा रहा है। मेरा कार्यकर्ता तुम्हारा नाम लिखकर रखा है। जो-जो आतंकित करेगा, जो मेरे कार्यकर्ताओं को परेशान करेगा, उन कार्यकर्ताओं को परेशान करने वाले अधिकारियों की सूची बनेगी।

रमन सिंह ने कहा था कि अधिकारियों को गिने-चुने दिन ही रहना है, उन्हें इतने तलवे चाटने की जरूरत नहीं है।  जबरदस्ती इतना स्वामिभक्त मत बनो, वक्त बदलता है। सरकार के दो साल बीत गए हैं। तीन साल बाद हिसाब-किताब करने हम भी आएंगे इसलिए ज्यादा गर्मी न दिखाएं।
डॉ. रमन सिंह छत्तीसगढ़ की जिस ब्यूरोक्रेसी को स्वामी भक्त बता रहे हैं, दरअसल अपनी सररकार में इसी ब्यूरोक्रेसी के भरोसे ऐसे बहुत सारे काम किये हैं जिसने छत्तीसगढ़ को अग्रणीय प्रदेश बनाया है और राष्ट्रीय स्तर पर बहुत सारे पुरस्कार और पहचान दिलाई है। छत्तीसगढ़ की यही ब्यूरोक्रेसी है जिसने कुछ दिन पहले छत्तीसगढ़ को इज आफ लिविंग इंडेक्स के चार मापदंड गुणवत्ता, आर्थिक क्षमता, स्थिरता और नागरिकों की धारणा के आधार पर राष्ट्रीय स्तर पर पुरस्कार दिलाया। यदि इस राज्य की ब्यूरोक्रेसी बेलगाम हो रही है जैसा कि पूर्व मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह कह रहे हैं तो निश्चित ही ब्यूरोक्रेट को सोचना होगा कि उनके कामकाज और आचरण और कार्यव्यवहार में कहां गलती हो रही है?
ऐसा नहीं है कि डॉ. रमन सिंह देश के पहले नेता हैं जिन्होंने ब्यूरोक्रेसी को चेताया है। इसके पहले भी मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री केंद्रीय मंत्री उमा भारती तथा वर्तमान मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने खुलेआम ब्यूरोक्रेट को अच्छी तरह से धमका चुके हैं।
भाजपा की वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती ने ब्यूरोक्रेसी को लेकर कहा, 'मुझे पता है कि ब्यूरोक्रेसी हमारी चप्पल उठाती है। यह कौम तो हमारी चप्पलें उठाने वाली होती है। ब्यूरोक्रेसी नेताओं को घुमाती है, ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। मैं मध्यप्रदेश की सीएम और केंद्र में मंत्री रही हूं। ब्यूरोक्रेट वही फाइल लेकर आते हैं, जो उन्हें बता दिया जाता है कि इसमें करना क्या है?Ó 'ब्यूरोक्रेसी की औकात क्या है? हम उन्हें तनख्वाह दे रहे हैं। हम उन्हें पोस्टिंग दे रहे हैं। हम उन्हें प्रमोशन और डिमोशन दे रहे हैं। उनकी कोई औकात नहीं है। असली बात है कि हम ब्यूरोक्रेसी के बहाने से अपनी राजनीति साधते हैं।  

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने पिछले कई अवसरों पर लापरवाह और अकर्मण्य नौकरशाही को सार्वजनिक रूप से लटका देने, देख लेने की बात कही है। वे अफसरों को सार्वजनिक मंचों से कई बार यह चेतावनी दे चुके हैं- 'मैं ऐसे लोगों को छोड़ूंगा नहींÓ चाहे मंचीय भाषण हों या फिर मंत्रालय में होने वाली विभागों की बैठकें या फिर कलेक्टर, कमिश्नर कांफ्रेंस, शिवराज के ये तेवर हर जगह नजर आ रहे हैं लेकिन आश्चर्य की बात है कि इसके बावजूद नौकरशाही की बिगड़ैल चाल में कोई अंतर दिखाई नहीं दे रहा।

अच्छे ब्यूरोक्रेट हवा का रूख भांपकर नेताओं के ईर्द-गिर्द अपनी जमावट बना लेते हैं। कई बार वे ब्यूरोक्रेट जो खुलकर एक सरकार के साथ किसी पार्टी कार्यकर्ता या व्यक्तिगत नौकर की तरह काम करते हैं उन्हें ही सरकार बदलने पर ज्यादा दिक्कत होती है, किन्तु ऐसे लोग दूसरी सरकार में भी उन लोगों को तलाश लेते हैं जिनके लिए वे उपयोगी हो सकते हैं। इस समय देश में जिस तरह की नई शासन व्यवस्था है उसमें नए-नए तरीके से कमाओ और हमको और हमारी पार्टी को लाकर दो यह चलन ज्यादा बढ़ा है। बहुत सारे ब्यूरोक्रेट अपने कामकाज को तयशुदा नियम प्रक्रिया से करते हैं वे भी भ्रष्ट सरकारी तंत्र में काफी परेशान रहते हैं।

आमतौर पर मजबूत सरकारों और सरकारों के मजबूत नेतृत्व को अपनी नौकरशाही को धमकाने या चमकाने की जरूरत नहीं होती। अब तक यही माना जाता रहा है कि नौकरशाही एक घोड़ा है, जिस पर राजनीतिक नेतृत्व सवारी करता है और जाहिर है जो सवारी करता है लगाम भी उसी के हाथ में होती है लेकिन, यदि घोड़ा बेलगाम हो जाए तो सवार को मुश्किल में डाल देता है, ऐसे बिगड़ैल घोड़े बातों से नहीं मानते, उन्हें चाबुक की जरूरत होती है। सत्ता संचालन में ऐसे चाबुक बहुत चुपचाप चलाए जाते हैं, जो मार तो करते हैं पर दिखते नहीं। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को ही लें। प्रदेश में हुए अप्रत्याशित राजनीतिक परिवर्तन के बाद जब से वे चौथी बार मुख्यमंत्री बने हैं, नौकरशाही के प्रति उनका सार्वजनिक रवैया तल्खी वाला ही रहा है।

कहा जाता है कि चालाक ब्यूरोक्रेट या कहें अवसरवादियों के बारे में अक्सर यह बात कही जाती है कि वे
जैसी चले बयार, पीठ को तैसी किजै।
की नीति पर चलते हैं यही वजह है कि वे हर विपरीत परिस्थिति में भी अपने आपको बचाकर ले जाते हैं।