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पहल का बंद होना साहित्य जगत के लिए दुर्भाग्यपूर्ण

पहल का बंद होना साहित्य जगत के लिए दुर्भाग्यपूर्ण

देश की चरित्र पत्रिका पहल अपने 125 अंक के प्रकाशन  बाद बंद हो रही है। पहल अपनी ने साहित्यिक सांस्कृतिक जगत में अपनी विशिष्ट पहचान बना रखी है। पहल से प्रकाशित होना हर लेखक, कवि,साहित्यकार  के लिए प्रतिष्ठा की बात होती थी। ज्ञान रंजन द्वारा जबलपुर से प्रकाशित पत्रिका, पहल को जब 2009 में 9० अंक निकालने के बाद बंद करने की घोषणा की गई तब कृष्ण कल्पित ने पहल को लेकर एक लिखा था।

'पहल' शोकगीतों का एक शोकगीत
-कृष्ण कल्पित
मजहब से मिरे क्या तुझे तेरा दयार और
मैं और, यार और मिरा कारोबार और !
मीर तक़ी मीर

जिस जिस ने भी पहल के अवसान को एक साहित्यिक पत्रिका का अवसान समझकर अपनी शोकांजलियाँ अर्पित की हैं - उन कमजफऱ्ों को यह नहीं पता कि यह दूसरा ही कारोबार था । यह इस बात से भी साबित है कि जब तथाकथित लघु-पत्रिकाओं के चांदी काटने के दिन आ गए हैं - जब जनपथ और राजपथ पर अनेक विलुप्त पत्र-पत्रिकाओं को नई सज-धज के साथ विचरण करते हुए देख रहे हैं - तब दवा-ए-दिल बेचने वाले ज्ञानरंजन अपनी दूकान बढ़ा गए। आज से कोई चालीस साल पहले (अब पचास) जब ज्ञानरंजन ने पहल की शुरुआत की थी तब यह पथ कंटकाकीर्ण था । तब हिन्दी की व्यावसायिक पत्रिकाओं के अलावा कल्पना थी, जिसे एक साहित्यिक अभिरुचि के सेठ बद्रीविशाल पित्ती चलाते थे । ज्ञानोदय थी, जिसे एक पूंजीपति घराने की साहित्य-सेवा कह सकते हैं । एक अजमेर से निकलने वाली लहर थी, जिसे प्रकाश जैन ने सचमुच अपार संघर्षों के बीच अपने जुनून से चलाया; लेकिन लहर की विचारहीनता ने इसे अकवितावादियों और विचार-विपथ विद्रोहियों का अड्डा बना दिया था । ऐसे माहौल में ज्ञानरंजन और उनके साथियों ने पहल को एक ख़ास मक़सद से निकाला - वैज्ञानिक चेतना और विचारधारा के साथ । इसे उन्होंने इस महादेश के वैज्ञानिक विकास के लिए प्रस्तुत प्रगतिशील रचनाओं की अनिवार्य पुस्तक की तरह प्रस्तावित किया। ध्यान रहे - पत्रिका नहीं, पुस्तक।

आज तो साहित्यिक या लघु पत्रिका निकालना एक कैरियर या धंधा है । जिस लिटल-मैगज़ीन की तजऱ् पर हिन्दी में लघु-पत्रिकाएँ निकलीं, वे वाक़ई प्रोटेस्ट की पत्रिकाएँ थीं । अब तो प्रोटेस्ट को सरकारी अनुदान मिलता है, उनकी सरकारी खऱीद होती है और कुछ असफल और दोयम दर्जें के कवि/लेखक/पत्रकार सिफऱ् पत्रिकाएँ निकालकर साहित्य की भूमि में जामवंत बने हुए हैं।

यहां यह भी याद रखा जाना ज़रूरी है कि ज्ञानरंजन ने जब पहल निकालने की अपने मित्रों के साथ पहल की थी तब वे कथाकार के रूप में अपनी ख्याति के उत्कर्ष पर थे । वे पिता, अनुभव, फैंस के इधर और उधर, घण्टा और बहिर्गमन जैसी अनूठी कहानियाँ लिख चुके थे । ज्ञानरंजन ने दूधनाथ सिंह और काशीनाथ सिंह के साथ नयी कहानी के लद्धड़, मध्यवर्गीय और किंचित रूमानी गद्य के बरक्स एक ठेठ हिंदुस्तानी धूल-धक्कड़-धक्कों से लिथड़ा हुआ एक नया आवारा और बेचैन गद्य प्रस्तावित किया था - अपनी कहानियों के ज़रिए । नयी कहानी के पुरोधा और तीन-तिलंगे अभी जैनेंद्र-विजय का पूरा उत्सव भी नहीं मना पाए थे कि ज्ञानरंजन के चमकीले गद्य के सामने उनकी नयी कहानी पुरानी पड़ गई।

इस गद्य का निर्माण मिश्र-धातुओं से हुआ था, जिस पर बकौल असद ज़ैदी इतने बरसों के बाद भी जऱा-सा भी जंग नहीं लगा है । विद्रोह की ऐसी जीवन में फंसी हुई कलात्मक भाषा इससे पूर्व कहाँ थी - इसमें धूल-धक्कड़, धुआँ, गर्द और एक शहर से घातक लगाव था । यह याद रखने लायक बात है कि ज्ञानरंजन के महाभिनिष्क्रमण के बाद ही इलाहाबाद ने साहित्यिक राजधानी की हैसियत गंवाई थी । इस आवा-जाही में ज्ञानरंजन से वह पुजऱ्ा खो गया, जिस पर इस अभूतपूर्व गद्य का कीमिया लिखा हुआ था । अब यह एक बन्द गद्य था । दीवारों से घिरा हुआ । वह दरवाज़ा जो ज्ञानरंजन से बन्द हुआ था, जिसे बाद में दूधनाथ सिंह ने, काशीनाथ सिंह ने - कुछ कुछ स्वयं प्रकाश और बाद में उदय प्रकाश ने अपनी बरसों की खट खट से खोलने का उपक्रम किया ।
(यह मेरी एक विनम्र प्रस्तावना है कि ज्ञानरंजन ने छठे-दशक की शुरुआत में जिस धुंधली और बीच-बीच में तीक्ष्ण-चमत्कार वाली भाषा का आविष्कार किया था वह बीसवीं-शताब्दी के अंत में दूधनाथ सिंह के यहाँ आखिऱी कलाम में परवान चढ़ी । यह इस गद्य की परिणति है जहाँ दूधनाथ सिंह ने अपनी विदग्ध और उत्तेजक भाषा में उत्तर-भारत के सर्वप्रिय ग्रन्थ रामचरित मानस को कटघरे में खड़ा कर दिया।)

ज्ञानरंजन : इस माहौल में ज्ञानरंजन ने अपनी वैचारिक प्रतिबद्धताओं के साथ, सीमित साधनों से पेरिस रिव्यू, लंदन मैगज़ीन और क्रिटिकल इंक़व्यरी जैसी पत्रिका हिंदी में निकालने का असम्भव स्वप्न देखा था जिसे उन्होंने तमाम प्रतिकूलताओं के बावज़ूद कोई चार दशक (अब पाँच दशक) तक जारी रखा । अब तो यह कल्पना भी नहीं की जा सकती कि अगर पहल नहीं होती तो क्या होता? समकालीन हिन्दी साहित्य का स्वरूप क्या होता? कला-प्रतिष्ठानों, सेठ-साहूकारों, निर्वीर्य-कलावादियों और धर्मप्राण जी-हुज़ूरियों का पहल ने निरन्तर प्रतिरोध किया। आज यदि हिन्दी साहित्य का माहौल अभी भी वाम वाम वाम दिशा समय साम्यवादी बना हुआ है तो इसमें पहल का भी कुछ योगदान रहा होगा।

असद ज़ैदी ने दस बरस की भूमिका में लिखा है : '1960 के दशक से हिन्दी की साहित्यिक पत्रिकाओं के वैकल्पिक मंच ने रचनात्मक साहित्यिक परम्परा के प्रकाशन और पुनरुत्थान का जो ऐतिहासिक जिम्मा निभाया है, उसकी मिसाल विश्व-सहित्य के इतिहास में शायद ही मिलती हो।' यह कहना ग़लत नहीं होगा कि इस ऐतिहासिक जि़म्मेदारी का पहल ने एक तरह से नेतृत्व किया। पहल के बाद उसकी नक़ल में बहुतेरी पत्रिकाएँ निकलीं, अब तक निकल रही हैं। शक्ल-सूरत, गेटअप और आकार-प्रकार में पहल की जितनी नक़ल हुई और हो रही है, वह इस बात का प्रमाण है कि एक तरह से पहल लघु-पत्रिकाओं की प्रतीक बन गई । इन पत्रिकाओं के योगदान को भी भुलाया नहीं जा सकता लेकिन ऐसी अधिकतर कोशिशें सम्पादकीय महत्वाकांक्षाओं और वैचारिक-विपथन से अपना वांछित प्रभाव नहीं छोड़ सकीं।

पहल का मूल्यांकन भविष्य में होगा लेकिन अब तक के 125 अंक देखकर कहा जा सकता है कि ज्ञानरंजन ने दुनिया-भर में जो प्रतिरोध और स्वतंत्रता का साहित्य है, विचार है - उसे पहल में समेटने की कोशिश की। इससे हिन्दी में सांस्कृतिक-राष्ट्रवाद और साम्प्रदायिक-फ़ासीवाद के प्रतिरोध की एक मज़बूत धारा विकसित हुई। पहल ने न केवल विश्व-साहित्य के प्रतिरोधी स्वर को बल्कि भारतीय भाषाओं के ऐसे लेखन को भी हिन्दी के समकालीन लेखन से जोड़ दिया। आज अगर पाश, लालसिंह दिल और सुरजीत पातर हमें हिन्दी के कवि लगते हैं तो इसमें पहल का बड़ा योगदान है। भारतीय-भाषाओं के अतिरिक्त पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे पड़ोसी मुल्कों के समकालीन लेखन से पहल ने हमें परिचित कराया। 1980 और 1989 में निकले पहल के दो कविता विशेषांकों ने हिन्दी की समकालीन कविता की दिशा-दशा निर्धारित की । हिन्दी में समकालीन कविता के ये सर्वश्रेष्ठ विशेषांक हैं।

पहल में छपी कोई एक यादगार कहानी, एक मौलिक वैचारिक लेख का नाम लेने की धृष्टता मैं नहीं करूँगा, क्योंकि यह सवाल नामवरजी ने अपने छोटे भाई काशीनाथ सिंह से पूछा था । ज्ञानरंजन ने अक्सर पहल में सम्पादकीय नहीं लिखे लेकिन पहल के एक-एक पृष्ठ पर ज्ञानरंजन के सम्पादन की छाप है। साहित्यिक पत्रकारिता की दृष्टि से देखें तो ज्ञानरंजन आज़ादी के बाद के सर्वश्रेष्ठ सम्पादक ठहरेंगे। नए लेखकों को बनाने में, एक नई साहित्य भाषा विकसित करने में, उनका योगदान महावीर प्रसाद द्विवेदी के समकक्ष ठहरेगा। एक सम्पादक के रूप में ज्ञानरंजन हमेशा रणक्षेत्र में खड़े नजऱ आते हैं। आज़ादी के बाद एक ख़ास मक़सद से की गई मिशनरी पत्रकारिता का पहल पहला और सम्भवत: अंतिम उदाहरण है।
यहाँ एक व्यक्तिगत दृष्टांत देना अनुचित नहीं होगा क्यों कि ये मुस्तनद है । 1989 के पहल कविता विशेषांक में मेरी कविताएँ प्रकाशित हुईं थीं और 1990 में मेरा कविता-संग्रह 'बढ़ई का बेटा' प्रकाशित हुआ था । ज्ञानजी से थोड़ा-बहुत पत्राचार था । इसके बाद साहित्य की निर्मम, कुटिल और कृतघ्न दुनिया से मैनें कई बार भागने की कोशिशें कीं । ऐसे ही एक निर्वासन के दिन मैं बाड़मेर के सीमांत पर बिता रहा था कि एक दिन डाक से पहल का नया अंक मिला । अगरतला, पटना, जयपुर । कभी एक पैसा मैंने पहल को नहीं भेजा लेकिन हर बार मेरे नए पते पर पहल का अंक पहुंच जाता । पता नहीं ज्ञानजी को कहाँ से ख़बर लगती थी । पहल ने मेरा पीछा कभी नहीं छोड़ा । आज अगर मैं साहित्य-संग्राम का एक छोटा-मोटा सिपाही बना हुआ हूँ तो इसमें पहल का भी योगदान है अन्यथा निश्चय ही मैं बाउल-गायकों में शामिल होकर चिलम में निर्वाण तलाश करता।

पहल से किसी की भी तुलना नहीं की जा सकती । मारवाड़ी सेठों, सेठानियों के चंदे से चलने वाली हंस पत्रिका के सम्पादक राजेन्द्र यादव ने कहा कि जिन पत्रिकाओं की रचनात्मकता का स्रोत टूट जाता है, वे बन्द होने को अभिशप्त होती हैं । जाहिर है हंस और पहल की तुलना बेमेल है । पहल पुस्तक है जबकि हंस पत्रिका । हंस हर महीने रद्दी में बिकती है जबकि पहल के अंक दुर्लभ किताबों की तरह लोगों ने सम्भाल कर रखे हुए हैं।

ऐसा नहीं कि पहल के हिस्से आलोचनाएँ नहीं आईं । कहा गया कि अखिल भारतीय सेवा के जितने अधिकारियों को पहल ने लेखक बनाया उतना किसी ने नहीं । ज्ञानरंजन की सम्पादकीय मनमानी की भी आलोचना हुई । आठवें-दशक के कवियों की परवरिश पहल-आश्रम में ही हुई । आलोचना से पहल के महत्व पर ही प्रकाश पड़ता है। किसी दूसरे हाथों में देने की मनाही के साथ अब यदि पहल पत्रिका बन्द हो रही है तो इसका अर्थ यही है कि ज्ञानरंजन पहल को किसी व्यावसायिक-ब्रांड में नहीं बदलना चाहते । जिस पत्रिका को उन्होंने अपने ख़ून-पसीने से सींचा है उसे वे अपने सामने ही नष्ट होते देखना चाहते हैं और यह उचित ही है क्योंकि सरस्वती का महावीर प्रसाद द्विवेदी के बाद और अभी हाल में हंस का राजेन्द्र यादव के बाद जो हश्र हुआ है, वह सबके सामने है।

ज्ञानरंजन ने एक सम्पादक के रूप में पिछले चालीस-वर्षों में जो पत्र लिखे हैं उनका यदि भविष्य में संकलन हुआ तो यह एक ज़रूरी और महत्वपूर्ण दस्तावेज़ होगा । ये हिन्दी के आखिऱी पत्र भी हो सकते हैं।ज्ञानरंजन को हम एक ऐसे सम्पादक के रूप में याद नहीं करेंगे जो पत्रिका की कमाई से शोफर-ड्रिवन गाड़ी से चलता था बल्कि वे एक ऐसे सम्पादक के रूप में याद किए जाते रहेंगे जिन्होंने मनुष्यता के पक्ष में फ़ासीवाद, साम्प्रदायिकता, पूंजीवाद, और बाज़ारवाद से अनथक संघर्ष किया और जो पहल के हर लिफ़ाफ़े पर अपने हाथ से पता लिखते थे।

पहल के प्रकाशन को बंद करने को लेकर लिखा गया ज्ञानरंजन का पत्र
पहल' का अंक 125 हमारी और उसकी यात्रा का अब आखिऱी अंक होगा। अभी तक यह ख़बर अफ़वाहों में थी जो सच निकली। यह निर्णय हमारे और 'पहल' से जुड़े तमाम लोगों के लिए तकलीफ़देह है। हर चीज़ की एक आयु होती है, जबकि हम अपनी सांसों से अधिक जी चुके हैं। हमारे संपादकीय साथी मिल जुल कर इससे सहमत हैं। उन्हें मेरी सेहत को लेकर चिन्ता और शुभकामना है। पहल के मंच का एक बैक स्टेज भी है जो सामने आया नहीं और संभवत: कभी नहीं आयेगा। वह एक बहुत बड़ी दुनिया है जो आती जाती रही, बदलती रही, घूमती रही। जब हमने पहल शुरू की हम संपादक नहीं थे। उसकी कलाओं और मशक्कतों से अवगत नहीं थे। आज भी हम पूरा पूरी संपादक नहीं हैं, एक समूह है जो मिल जुल कर गाड़ी चलाता रहा। संपादन की मुख्य धाराओं के अगल बगल से निकलते रहे पर पारंगत नहीं हो सके। बस एक पंक्ति हमारी जरूर थी उस पर जोश, जज़्बे और आवेग के साथ चलते रहे। हमारी शैली यही थी जिसमें ताज़ा और आज़ाद ख्याल बने रहे। एक ज़रूरी सुचारु व्यवस्था न होने के कारण हम अब थक भी रहे हैं। हमने कभी 'पहलÓ को एक संस्था या सत्ता की व्यवस्था नहीं दी। चीज़ें आती रहीं, हम निपटते रहे, अपने को भ्रष्ट होने से बचाते रहे।

हमें अपनी ही पंक्ति पर बार बार बदलते समय और उसमें आते जाते तूफानों और सच्ची प्रतिभाओं की पहचान करती थी सो हमें तटस्थता और कठोरता की शैलियों का पालन करना पड़ा। हज़ारों लोग पहल में छपने से वंचित रह गये। हम जितना कर सके वह खरा था। नये जमाने के शत्रुओं की पहचान भी ज़रूरी थी। प्रगति विरोधी, साम्प्रदायिक और तानाशाह शक्तियों और घरानों से हमारी मुठभेड़ चलती रही। हम पर्याप्त मरते जीते रहे। 'पहल' का टिकट बहुतों ने लिया पर कुछ बीच में उतर गये, कुछ आजीवन साथ निभा सके, इसके लिए कमिटमेन्ट अनिवार्य था जो हमारे रक्त और रगों में था। इसमें पाठक, लेखक, वित्तीय सहयोगी, अनाम शुभचिन्तक, पक्षधर, मोहब्बत करने वाले, बैक स्टेज, अण्डरवर्ल्ड के लोग शामिल हैं। इसका बयान एक लम्बी जीवनी बन सकता है जिसकी ज़रूरत नहीं है। और 47 वर्ष बाद अनेक लोग गुमनामी में रहना चाहते हैं या लापता हैं।

हमारे पास फूटी कौड़ी नहीं थी और शुरूआत हो गई। आज भी हमारे पास फूटी कौड़ी नहीं है। मनोबल है। आश्चर्य की बात है कि ऐसे सैकड़ा में लोग हैं जो जब चाहे स्वयंस्फूर्त राशियाँ, छोटी बड़ी जब तब पहल के नाम करते रहे। कुछ तो ऐसे आजीवन है कि कतई व्यक्त नहीं होना चाहते। यही उनकी शर्त है। हम मानते हैं कि प्रायोजित सम्पदा से छोटी पत्रिकाओं का काम नहीं हो सकता। ईंधन चाहिए। जब ख़त्म होने लगे ईंधन जुटाया जाय और झोंक दिया जाय। फिर विचार की अग्नि और जीवन तथा साहित्य की बुनियादी लड़ाईयों का साथ न छोड़ा जाय। 50-60 साल के इतिहास में अनेक गर्वीली और शानदार साहित्यिक पत्रिकाएँ हिन्दी में निकलीं। कुछ अच्छी थीं पर उनके साथ संपादक की जीविका का सवाल था या संस्थान निर्भर थीं। बहरहाल, हमारा मार्ग यह था कि पत्रिका मात्र चंदे से नहीं असंख्य जुड़ावों से चले। पहल की आंतरिक रचना प्रक्रिया एक ऐसी कृतज्ञता में है जिसके हक़दार देश भर के अनगिनत साहित्य प्रेमी हैं। हमारे साथ चुपचाप सूंघने वाली, जलने वाली, दोहरा सलूक करने वाली हस्तियाँ भी छाया की तरह लगी रहीं, पर हमारे भीतर भी बिल्लियाँ और चीटियाँ चौबीस घंटे जीवन्त थीं।
हमने संपादकीय घोषणाएँ नहीं कीं और उसके अतिरेक से बचते रहे 50 साल में कोई फतवा हमारा नहीं है। हमने रचनाएँ आदर, प्यार, आग्रह से मांगीं और उन्हें प्रस्तुत किया। इस अंक में कृष्ण मोहन का एक उदाहरण है कि जिनसे बीस साल पहले कविताएँ मांगी थीं और बीस साल बाद उन्होंने स्मरण करते हुए कविताएँ भेजीं। भूखण्ड तप रहा है। संगतकार, कपड़े के जूते, रामसिंह, क्रागुएवात्स, कोठ का बांस, लेबर कॉलोनी के बच्चे, कविता की रंगशाला, ब्रूनो की बेटियाँ, सीलमपुर की लड़कियाँ, यह मृत्यु उपत्यका नहीं है मेरा देश, गांधी मझे भेंटला जैसी कविताएँ प्राप्त कीं और याद इसके साथ ही टूट जाती है। कुंवरनारायण, रघुवीर सहाय, केदारनाथ सिंह के युग के बाहर जो नई कविता थी, पौद-फुलवारी बन रही थी, उसे एक संसार की रोशनी देने की कोशिश की और एक नया पाठक-वर्ग बनता रहा।
इससे अधिक कहना, अहंकार होगा। इसलिए बकवास और नहीं। एक मुहावरा याद आता है, जो सैनफ्रांसिस्को में एक नारे की तरह लगाया गया - शट अप एण्ड राइट। यह वाचिकों के लिए भी एक नसीहत है। कहना मात्र यह है कि पहल एक देह की तरह थी, जिसकी आयु भी है। यह आयु आ गई, इसको स्वीकार करते हैं। संपादन के लिए जहाँ सम्पादक पीर, बाबर्ची, भिश्ती, खर सब कुछ हो अच्छी सेहत ज़रूरी है। पर यह अंत श्मशान में नहीं, इतिहास में दर्ज हो सकेगा यह उम्मीद करते हैं। हम अमर नहीं थे और मर भी नहीं रहे हैं।

हमारा ढांचा शिथिल पड़ रहा है क्योंकि यह महामारी जाने से इन्कार नहीं कर रही है। इसने हमारे ताने बाने को उलट पलट दिया है। यह महामारी चंचल है, बार-बार अपने को बदलती है, इसने सत्ताओं को भीतरी तौर पर खुश और मन माफिक बनाया है। हमारे कई साथी जो प्रकाश स्तम्भ की तरह थे, इसकी चपेट में चले गये। कुछ को वर्तमान अंधी सत्ता ने मौन और निष्क्रिय कर दिया। हम मुखौटे उतारते रहे और अब प्रतिदिन नए मुखौटे तैयार हो रहे हैं। ऐसे वक़्त में हम आपसे विदा ले रहे हैं। यही समय है जब हम कुछ अच्छी ख़बरें भी बताएँ और उन लोगों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करें जिन्होंने विविध प्रकार से, विभिन्न समयों में स्वयं स्फूर्त पहल को जारी रखने में सहयोग दिया। यह कतई व्यवसायिक मार्ग नहीं बना। 'पहल' शुरू से ही चूंकि एक अनियतिकालीन कि़ताब की शक्ल में निकलती रही, पत्रिका के फॉर्म में नहीं, इसलिए आपात काल की विपत्तियों में अपना बचाव केन्द्रीय गृह मंत्रालय और सूचना प्रसारण मंत्रालय की जटिल तहक़ीक़ातों से कर सके। बाद में रणनीतिक कारणों से पहल के मुद्रणालय और प्रकाशक बदल बदल जाते रहे। ये केवल छापाख़ाने ही नहीं थे ये हमारे साथी थे जहाँ लेन देन का तात्कालिक दबाव नहीं था। इलाहाबाद प्रेस के स्वामी रवीन्द्र कालिया पर तो यदा-कदा पुलिस की छापामारी और पूछताछ भी होती रही। बहरहाल, जबलपुर के सामाजिक कार्यकर्त्ता दुर्गाशंकर शुक्ल के पंकज प्रिंटर्स और द्वारिका तिवारी के महाकोशल ऑफ़सेट, इलाहाबाद में परिमल प्रकाशन के शिवकुमार सहाय, इम्पैक्ट के राधारमण (पियरलेस प्रिंटर्स), रवीन्द्र कालिया के इलाहाबाद प्रेस, नीलाभ के नीलाभ प्रकाशन के सहयोग से 'पहल' निकली। आपातकाल में जबलपुर के चित्रा प्रिंटर्स के यहाँ रातों को ट्रेडिल पर अत्यंत गोपनीय तरह से हमारे प्रतिरोधी पर्चे भी छपते रहे। 'पहल' के अनेक अंक देश के सुप्रसिद्ध तबला वादक आह्लाद पंडित ने अपना काम छोड़ कर नागपुर के एक मराठी प्रेस से प्रकाशित कराए। आपात काल में ही सतना के सिंधु प्रेस में पहल का एक अंक छापा गया। एक ऐसा दौर था जब 'पहल' पंचकूला के देश निर्मोही ने आधार प्रकाशन से प्रकाशित किया। पहल के कुछ अंक छापा कला के उस्ताद मोहन गुप्त के सारांश प्रकाशन, दिल्ली में भी छपे। यह सब अबाध चलता रहा, हाँ मशक्कत बहुत थी। और अंतिम दौर का लम्बा समय यादगार है जब पहल के प्रकाशन, वितरण और तमाम दैनिक झंझटों को उठाने वाले गौरीनाथ ने अंतिका प्रकाशन से पहल को संभव बनाया। इसमें अशोक भौमिक और जितेन्द्र भाटिया की असाधारण भूमिका थी। पता ही नहीं चला कि एक बड़ा चित्रकार और एक बड़ा लेखक पहल की गाड़ी खींच रहा है। अब शिवकुमार सहाय, आह्लाद पंडित, राधारमण, नीलाभ, रवीन्द्र कालिया जीवित नहीं हैं कि इन पंक्तियों को पढ़ सकें। मात्र इसका जि़क्र नाकाफ़ी है। ये लोग अपनी घनघोर मुसीबतों और तकलीफ़ों के मध्य पहल का काम प्राथमिकता से करते रहे। जब लगता था आगे रास्ता बंद हो जायेगा, इन्होंने रास्ते खोले। बैक स्टेज और परदे के पीछे गहरे संकोच के साथ कुछ और लोग भी खड़े हैं जो कभी सामने आना नहीं चाहते थे। 'पहल' की नींव का पत्थर उन्होंने लगाया है। पहल की दूसरी पारी में जब उसके पुनर्गठन की शुरूआत हुई तो मैंने अपने पुराने दोस्त राजकुमार केसवानी को आमंत्रित किया और वे मेरा आग्रह मान गये। वे नैतिक रूप से कठिन, बेहद मानवीय और एक छुपे हुए लेखक हैं। उर्दू रजिस्टर की कल्पना, योजना उन्हीं की थी जिससे पहल की एक बड़ी कमी पूरी हुई। राजकुमार का कलश भरा हुआ है और वह दुर्लभ है। इसको रचनावली में परिवर्तित करने के लिए स्वयं उन्हें कई जीवन लगेंगे। लेकिन उन्होंने पहल को गहरी प्राथमिकता के साथ अपना सर्वोत्तम दिया। जब कि वे एक पुरस्कृत पत्रकार हैं और उनका जीवन परिचय विरल है। राजसत्ता में गहरी पैठ के बावजूद उनकी स्वतंत्रता जानी मानी है और अभी भी वे पूरी तरह श्रमजीवी हैं। जब उन्हें पता चला कि हम 'पहल' में सरकारी विज्ञापन नहीं लेंगे तो वे उत्साह और खुशी के साथ हमारे अभिन्न हुए। पहल से जुडऩे के बाद उनकी जहान-ए-रूमी, दास्तान-ए-मुग़ले-आज़म और कशकोल जैसी कृतियाँ आईं। और काम अभी जारी है। उन्होंने हमें विपथगामी होने से बार-बार बचाया। नई पारी में वरिष्ठ कथाकार राजेन्द्र दानी और युवा रचनाकार पंकज स्वामी भी पहल की संपादक मंडली में शामिल हुए। वास्तव में पहल का प्रमुख काम यह लोग करते थे, मैं श्रेय लेता रहा। इन दोनों कथाकारों का रचनात्मक सफऱ जारी है। पंकज स्वामी का पहला संग्रह इस अंतिम अंक के साथ आ रहा है। उनका पदार्पण हिन्दी कथा मंच पर हो रहा है। पहल के मुखपृष्ठों की हिन्दी जगत में एक अलग पहचान है। मुखपृष्ठ कभी दोहराये नहीं गये। यह काम प्रयोगशील अवधेश वाजपेयी ने किया जिनकी चित्रकला की अब भारतभूमि में बड़ी पहचान बन रही है। मुखपृष्ठों को अंतिम रूप देने में संजय आनंद भुलाये नहीं जा सकेंगे, जबकि उनकी घनघोर व्यस्तताएँ रही हैं। और हमारे चुपचाप जुटे हुए श्रमिक मनोहर बिल्लौरे हैं जो सुबह शाम 'पहल' के काम के लिए उपस्थित रहे। उन्होंने पहल का पूरा इतिहास और पहल संपादक की सारी बिखरी चीज़ें संभाल के रखी हैं। 'पहल' की वेबसाइट को निरंतरता से संचालन करने वाले कुलभूषण का शुक्रिया जो सुदूर दक्षिण में रहते हुए यह काम अथक करते रहे। सहभागिता का एक उदाहरण यह भी है कि 'पहल' का अक्षर संयोजन करने वाले पीयूष जोधानी अब तक उसके 50 अंकों को तैयार कर चुके है।

अंत में, पहल के झोंकों को सुगंध से भरने वाले दिवंगतों और जीवितों को हमारा सलाम और शुक्रिया। सर्वश्री राहुल बारपुते, मायाराम सुरजन, कमलेश्वर, श्याम कश्यप, वीरेन्द्र कुमार बरनवाल, सुदीप बैनर्जी, एल.के. जोशी, रमाकांत, कामरेड रतिनाथ मिश्र, विनोद कुमार श्रीवास्तव, अनूपकुमार, बुद्धिनाथ मिश्र, प्रकाश दुबे, सुधीर अग्रवाल, परितोष चक्रवर्ती, एन.के. सिंह, कमलेश अवस्थी, चमनलाल, रमेश मुक्तिबोध, संजीव कुमार, ईशमधु तलवार, यशवंत व्यास, निरुपमा दत्त, शंकर, शैलेन्द्र शैल, सुशील शुक्ल, गुलाम मोहम्मद शेख, प्रदीप सक्सेना, दिवाकर झा, सत्येन्द्र सिंह ठाकुर आप सब बहुत याद आते हैं।