मास्को, जो एक शहर से अधिक सपना था

मास्को, जो एक शहर से अधिक सपना था

अजित राय

विश्व सिनेमा में रूस के योगदान पर जब भी बात होती है तो हम आम तौर पर सर्जेई आइजेंस्टाइन और आंद्रे तारकोवस्की का नाम लेते हैं और हमारी सूची वहीं पर समाप्त हो जाती है। हालांकि हाल के वर्षों में कान फिल्म फेस्टिवल में महत्त्व मिलने के कारण सर्जेई लोजनित्स (डोनबास ,2018) और आंद्रे ज्याग्निशेव (लवलेश, 2017) का नाम भी लिया जाने लगा है। पर हमें नहीं भूलना चाहिए कि भारत और रूस में सिनेमा का इतिहास एक ही साथ शुरू होता है जब 1896 में फ्रांस के ल्यूमिएर बंधुओं द्वारा बनाई गई दुनिया की पहली फिल्म इन दोनों देशों में पहुंचती है। दोनों देश पहली फीचर फिल्म भी लगभग एक ही कालखंड में बनाते हैं। रूस में राजकपूर और मिथुन चक्रवर्ती की हिंदी फिल्में खूब लोकप्रिय हुई तो भारत के प्रबुद्ध दर्शकों में आइजेंस्टाइन और तारकोवस्की की फिल्में खूब सराही गई।

   ब्लादिमीर मेनशोव की फिल्म " मास्को डज नाट बिलीव इन टीयर्स "(1979) के बारे में बहुत कम लोग जानते हैं जिसे 1980 में विदेशी भाषा में सर्वश्रेष्ठ फिल्म का आस्कर अवार्ड मिल चुका है जबकि आज तक किसी भारतीय फिल्म को आस्कर अवार्ड नहीं मिला है और इसी दौरान अब तक चार रूसी फिल्मों को आस्कर अवार्ड मिल चुका है।  यह अमरीका और रूस ( तब का सोवियत संघ) के बीच शीत युद्ध का दौर था। हमें याद है कि 1980 के मास्को ओलंपिक का अमरीका ने और जवाब में 1984 के लास एंजिल्स ओलंपिक का रूस ( सोवियत संघ) ने तब बहिष्कार किया था।


" मास्को डज नाट बिलीव इन टीयर्स" में रूस के सुदूर गांव में रहने वाली तीन लड़कियां इस उम्मीद में वहां से भाग कर मास्को आती है कि उनका जीवन खुशियों से भर जाएगा। अंतोन चेखव की " थ्री सिस्टर" में भी एक गांव की तीन बहनें अपनी लगातार ऊब से भरी जिंदगी में मास्को जाने का सपना देखती है।

 फिल्म में 1958-1978तक का मास्को है। तीनों लड़कियां एक घटिया सी डोरमेट्री के एक ही  कमरे में जैसे तैसे गुजारा करती है। उन तीन में से सबसे सुंदर और प्रतिभाशाली कैटरीना यूनिवर्सिटी में अपनी पढ़ाई के साथ साथ एक फैक्टरी में कड़ी मिहनत करके पैसे बचाती है। एक पार्टी में कैटरीना की मुलाकात रूडौल्फ से होती है जो किसी टेलीविजन चैनल में कैमरामैन है।वह उसे बहला फुसलाकर उससे शारीरिक संबंध बना लेता है और कैटरीना गर्भवती हो जाती है। रूडौल्फ उसे ठुकरा देता है। रूडौल्फ की मां उसे हर्जाने के तौर पर पैसा देना चाहती है। कैटरीना किसी की नहीं सुनती। वह एक बच्ची को जन्म देती है, उसे पाल पोस कर बड़ा करती है।

 समय बदलता है। अब 1978 के मास्को में कैटरीना एक बड़ी फैक्टरी की मालकिन है जिसका इंटरव्यू रिकार्ड करने उसका धोखेबाज प्रेमी रूडौल्फ उसके आफिस में आता है। कैटरीना उसे कोई महत्व नहीं देती और यहां तक कि उसे पहचानने से इनकार कर देती है। उसकी दोनों सहेलियां भी गृहस्थी बसाकर खुश हैं। तीनों सहेलियां अक्सर मिलती है और अपने पुराने दिनों को याद करती है। फिल्म का सुखांत यह कि चालीस साल की उम्र में कैटरीना को उसकी पसंद का ऐसा पुरुष मिलता है जो उसे समझ सके। 

फिल्म में हम 1950 के दशक का मास्को देखते हैं। वहां की सुबहें और शामें, उत्सव और परंपराएं और तब कैटरीना के दुखों के दो ही मुक्ति स्थल होते थे- पुस्तकालय और नाट्य गृह। ब्लादिमीर मेनशोव ने बड़ी खूबसूरती से निम्न वर्ग की तीन स्त्रियों की दिनचर्या के माध्यम से बीस साल में बदलते मास्को को फिल्माया है। अंतोन चेखव की सुप्रसिद्ध तीन बहनें कभी मास्को नहीं जा पाती पर ब्लादिमीर मेनशोव की तीन सहेलियां न सिर्फ मास्को आती है वल्कि अपने सारे सपने पूरे करती है। 

  72 वें कान फिल्म समारोह (2019) के अन सर्टेन रिगार्ड खंड में सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का पुरस्कार और फिप्रेस्की का बेस्ट फिल्म का पुरस्कार जीतने वाली कंटेमीर बालागोव की फिल्म " बीनपोल " की भी इन दिनों बड़ी चर्चा है। कंटेमीर बालागोव की फिल्म " क्लोजनेस " को 1917 में भी कान फिल्म फेस्टिवल के अन सर्टेन रिगार्ड खंड में फिप्रेस्की का पुरस्कार मिल चुका है। 

   "बीनपोल " द्वितीय विश्व युद्ध से तबाह हो चुके 1945 के लेलिनग्राद ( अब, सेंट पीटर्सबर्ग) में चुटकी भर जिंदगी के लिए संघर्षरत दो स्त्रियों की बेमिसाल प्रेम कथा है। ईया और माशा इस ध्वस्त हो चुके शहर में जहां जीवन और मृत्यु का खेल जारी है, तरह-तरह से अपने जीवन को संवारने में जुटी हुई है। ईया की भूमिका निभाने वाली अभिनेत्री विक्टोरिया मिनोश्निचेंको की दुनिया भर में जबरदस्त चर्चा हो रही है। " बीनपोल '  आस्कर अवार्ड में विदेशी भाषा की श्रेणी में इस बार रूस से आफिशियल प्रविष्टि थी। यह फिल्म बेलारूस की नोबेल पुरस्कार विजेता श्वेतलाना अलेक्सीएविच की रचना " वर्ल्ड अनवुमनी फेस (1985)  से प्रेरित है।

रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कई मुलाकातों के बाद दोनों देशों के बीच को-प्रोडक्शन संधि संभव हुई है जिसके तहत भारतीय फिल्मकारों को रूस में फिल्में बनाने पर 40 प्रतिशत सब्सिडी मिलेगी।

दोनों देश मिलकर फिल्म निर्माण में काम करें तो इतिहास रचा जा सकता है। दोनों देशों के पास गजब की कहानियां, टेक्नोलॉजी और शूटिंग लोकेशन्स है। पेरेस्त्रोइका (1989-90) के पहले  रूस और भारत के बीच फिल्मों का आयात- निर्यात होता था।  रूस की एक पूरी पीढ़ी राजकपूर और मिथुन चक्रवर्ती की फिल्मों के साथ जवान हुई है। रूस में भारतीय फिल्मों का स्वर्णिम इतिहास रहा है, उसे अब फिर से दोहराने की जरूरत है। अभी शूजित सरकार सेंट पीटर्सबर्ग में अपनी फिल्म " सरदार उधम सिंह " की शूटिंग कर रहे हैं जिसमें विकी कौशल मुख्य भूमिका निभा रहे हैं।

          जब  सोवियत संघ था तब कुछ फिल्में दोनों देशों के बीच को- प्रोडक्शन मे बनी थी। मसलन नरगिस की " परदेशी ", अ जर्नी बियोंड द थ्री सी ', ब्लैक माउंटेन" (1971), " रिक्की टीक्की तावी "(1975),  धर्मेंद्र और हेमा मालिनी की " अलीबाबा और चालीस चोर " (1979), अमिताभ बच्चन की " अजूबा " (1989) आदि।