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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - डीजल-पेट्रोल की कीमत, जनता की फजीयत, सरकार की सहुलियत

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - डीजल-पेट्रोल की कीमत, जनता की फजीयत, सरकार की सहुलियत

-सुभाष मिश्र
पूरे देश में अब महंगाई के खिलाफ उस तरह का जनआंदोलन, आक्रोश दिखाई नहीं देता जैसेपहले दिखता था। पेट्रोल-डीजल की बढ़ी हुई कीमत पर 31मई 2012 को भारत बंद करने वाली भाजपा जो आज केंद्र की सत्ता पर काबिज है और सौ रूपये प्रति लीटर कीमत पर चुप है। यदि कोई आपसे कहे कि पेट्रोल-डीजल की दरें अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे माल की कीमत पर तय होती है तो यह आधा सच है। दरअसल क्रूड आयल यानी कच्चा माल हमारे देश को जिस कीमत पर मिलता है उससे कहीं ज्यादा केंद्र सरकार सेंट्रल एक्साईज टैक्स के नाम पर और राज्य सरकारें टैक्स के नाम पर ले रही है। हमारे देश की जो कच्चा आयल मिलता है उसकी कीमत 30-40 प्रतिशत होती है। बाकी 60-70 प्रतिशत उसमें केंद्र, राज्य के टैक्स, दस प्रतिशत रिफाइन करने की लागत और पांच प्रतिशत डीलर का कमिशन शामिल है। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे माल की कीमत कम होती है तो भी हमारे देश में डीजल-पेट्रोल की कीमत कम नहीं होती किन्तु जब अंतराराष्ट्रीय बाजार में इसकी कीमत बढ़ती है तो हमारे देश में डीजल-पेट्रोल की कीमते बढऩे लगती है। डीजल-पेट्रोल की बढ़ी हुई कीमत का असर हमारी पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। आज हमारे खाने-पीने के समान से लेकर व परिवहन तक सब कुछ महंगा है। महंगाई का सूचकांक लगातार ऊपर चढ़ रहा है। किन्तु इसको लेकर जनता के बीच जो प्रतिरोध, आक्रोश दिखाई देना चाहिए वह उस तरह से नहीं दिखता। लगता है हमारी प्रतिरोध की क्षमता धीरे-धीरे कम हो रही है या हमने यथा-स्थिति को स्वीकार कर लिया है। गोस्वामी तुलसी दास बहुत पहले कह भी गए हैं कि- जेही विधि राखे राम तेही विधि रहिए।

ये रामजी वाली सरकार है जिसे आमजनों ज्यादा आदमकद प्रतिकमाएं लगाने, ऊंची-ऊंची ईमारते बनाने की बुलेट ट्रेन चलाने की चिंता ज्यादा है। आज ही पेट्रोल-डीजल की कीमत में 25-25 पैसे का इजाफा हुआ है।
पेट्रोल-डीजल ही कोरोना काल में सरकार के राजस्व का मुख्य स्रोत बने हुए हैं। दुनियाभर में कच्चे तेल की कीमत भले ही औंधे मुंह गिरी हो, लेकिन भारत के लोगों को इसका फायदा नहीं मिल रहा है। भारत दुनिया में पेट्रोल-डीजल की खुदरा कीमतों पर सबसे ज्यादा टैक्स लगाने वाला देश बन गया है। अब पंप में मिलने वाले पेट्रोल-डीजल पर टैक्स बढ़कर 69 फीसदी हो गया है, जो दुनिया में सबसे ज्यादा है।

ऐसे में हर व्यक्ति ईधन के दाम में कटौती की आस लगाए बैठा है, लेकिन पेट्रोलियम और नेचुरल गैस मंत्रालय ने धर्मेंद्र प्रधान ने राज्यसभा में एक लिखित प्रश्न के जवाब में कहा है कि केंद्र सरकार पेट्रोल-डीजल पर लगने वाले टैक्स में कोई कटौती नहीं करेगी। केंद्र सरकार पेट्रोल पर प्रति लीटर 32.98 रुपये एक्साइज ड्यूटी वसूलती है, वही डीजल पर प्रति लीटर 31.83 रुपये एक्साइज ड्यूटी लेती है। राज्य सरकारें पेट्रोल पर वैट के रूप में 19.55 रुपये लेती है, वहीं, डीजल पर राज्य सरकारें वैट के रूप में 10.99 रुपये टैक्स लगाती है। इसके अलावा पेट्रोल पर डीजल का कमीशन 2.6 रुपये प्रति लीटर और डीजल पर 2 रुपये प्रति लीटर होता है।
पेट्रोल और डीजल की एक्साइज ड्यूटी में हर एक रुपये की बढ़ोतरी से केंद्र सरकार के खजाने में 13000-14,000 करोड़ रुपये सालाना की बढ़ोतरी होती है। वही क्रूड की कीमतें घटने से सरकार को व्यापार घाटा कम करने में मदद मिलती है। असल में भारत अपनी जरूरतों का करीब 82 फीसदी क्रूड खरीदता है। ऐसे में क्रूड की कीमतें घटने से देश का करंट अकाउंट डेफिसिट (सीएडी) में घट सकता है।
लगातार पेट्रोल और डीजल की बढ़ती कीमतों ने आम आदमी की कमर तोड़ दी है। तेल के दामों में बेतहाशा वृद्धि की वजह से भारतीय अर्थव्यवस्था पर बहुत नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। तेल के बढ़ते दाम महंगाई का एक बहुत बड़ा कारण बन रहे हैं और आम जनता की कमाई और खर्च में बड़ी गिरावट पैदा कर रहे हैं।

देश में पेट्रोल और डीजल के दाम आसमान छूने से इसका सबसे ज्यादा असर गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों पर पड़ा है। खासकर दोपहिया और चारपहिया वाहन चलाने वालों को अब गाड़ी चलाने के लिए कई बार सोचना पड़ेगा। लोगों का कहना है कि पेट्रोल-डीजल के बढ़ते दामों ने महंगाई में आग लगा दी है। वो दिन दूर नहीं, जब लोगों को दोबारा साइकिल की सवारी करनी पड़ेगी।
आम तौर पर देश की अर्थव्यवस्था पर ईधन की बढ़ती कीमत हरेक वस्तु की लागत को बढ़ाती है, जिससे सभी सेक्टरों की कीमत में इजाफा होता है। चूंकि हरेक सेक्टर किसी न किसी रूप में परिवहन का इस्तेमाल करता है, परिवहन लागत में इजाफा से समग्र रूप से मुद्रास्फीति जन्म लेती है।

मौजूदा कोविड-19 महामारी के कारण उपजी आर्थिक मंदी के साथ, ईधन की कीमतों में तेजी से वृद्धि ने व्यक्तियों, परिवारों और कंपनियों को प्रभावित किया है। केंद्र सरकार करों में कटौती करने के लिए इच्छुक नहीं है, तो ऐसे में आने वाले समय में आम जनता को और भी कठिन दौर का सामना करना पड़ सकता है। एक सर्वेक्षण के अनुसार, 51 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने माना कि ईधन पर होने वाले खर्चों को प्रबंधित करने के लिए वे अन्य जरूरी खर्चों में कटौती करता है।

कोरोना संक्रमण के चलते जहां पेट्रोल-डीजल की खपत कमी हुई थी। वहीं मई 2021 में अब तक देश में बेरोजगारी दर 14.5 फीसदी है। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनामी के डाटा के मुताबिक, अप्रैल 2021 के दौरान देश में बेरोजगारी दर 8 फीसदी पर थी, इसमें लॉकडाउन और सख्त कफ्र्यू के कारण बढ़ोतरी हो गई है। इसी तरह देश में अप्रैल के महीने में थोक महंगाई में बेतहाशा तेजी देखने को मिली है। अप्रैल 2021 में महंगाई दर (डब्ल्यूपीआई) 10.49 फीसदी पर रही है। महंगाई की दर लगातार 5 साल तक निचले स्तर पर रहने के बाद दोबारा बढऩा शुरू हुई है। अप्रैल 2020 से यह लगातार 6 फीसदी से ऊपर है। बसों का किराया बढ़ाने की मांग कर रहे बस संचालक शासन द्वारा 25 प्रतिशत किराया बढ़ाए जाने से संतुष्ट नहीं है।

लोगों के बीच यह धारणा भी बड़ी चालाकी से फैलाई गई है कि पेट्रोल-डीजल के दाम सरकार सीधे कंट्रोल नहीं कर रही है। क्रूड आईल कीमत के लिए एक डायनोमिक प्राईज सिस्टम लागू है। हर दिन सुबह इसी सिस्टम से रेट तय होता है। दरअसल पहले 15-15 दिन के अंतराल में माह की एक तारीख और 16 तारीख को पेट्रोल-डीजल की कीमत तय होती थी। 16 जून 2017 से अब तक रेट हर दिन तय होता है। देश में विकास के नाम पर बढ़ती और वसूले जा रहे टैक्स को राष्ट्रनिर्माण का नाम दिया गया है। जिन दिन कम कीमत पर पेट्रोल-डीजल मिलता था उन दिनों सरकार इसकी कीमत पर बहुत दबाव रहता था। सरकार पेट्रोल-डीजल पर सब्सिडी भी देती थी। अब सरकार इससे मुक्त होकर बड़ा राजस्व कह रही है। यदि हम बाकी दुनिया के देशों से अपने देश के पेट्रोल-डीजल की दरों की तुलना करें तो हमें 50-60 रुपये अधिक कीमत प्रति लीटर देनी पड़ रही है। सरकार तेल के जरिए आम आदमी का तेल निकालने में लगी है और देश के नागरिक खामोश हैं।
प्रसंगवश - शायर ज़मीनी का शेर
तुम आसमाँ की बुलंदी से जल्द लौट आना
हमें जमीं के मसाइल पे बात करनी है।