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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - जनसंख्या नियंत्रण क्या वाकई टोपी से टाई तक की कवायद है

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - जनसंख्या नियंत्रण क्या वाकई टोपी से टाई तक की कवायद है

-सुभाष मिश्र

यूपी सरकार जनसंख्या नियंत्रण कानून ला रही है। असम में भी इसकी तैयारी है। भाजपा के तीन राज्यसभा सांसदों के बयान भी इस बात की ओर संकेत कर रहे हैं कि यह बिल राष्ट्रीय स्तर पर भी लाया जा सकता है। यह सही है कि  हम दुनिया की सर्वाधिक आबादी वाले चीन के बाद दूसरे नंबर के देश हैं। हमारे बहुत से संसाधन, योजनाएं आबादी के दबाव की वजह से उन लक्ष्यों को प्राप्त नहीं कर पाते जिनके बारे में सोचा जाता है। जनसंख्या नियंत्रण की यदि कोई पॉलिसी होगी तो वह राष्ट्रीय होगी। कोई राज्य पृथक से इस बारे में पॉलिसी बनाए तो उसकी नियत और टाईमिंग पर सवाल उठना लाजमी है। यू पी में अगले साल चुनाव है। आम हिन्दुओं के मन में यह बात तेजी से बिठा दी गई है कि मुसलमान ज्यादा बच्चे पैदा करते हैं। यदि इनकी आबादी इसी तेजी से बढ़ती गई तो एक दिन भारत इस्लामिक राष्ट्र हो जायेगा। यह बात उसी तरह फैलाई जाती है जैसा कि नौकरियों में आरक्षण का मामला। कई देश के युवाओं को ये सच नही बताता कि नौकरियां बहुत कम हैं। आरक्षण से उनका हिस्सा नहीं मारा जाता बल्कि अवसरों की कमी इसकी बड़ी वजह है। उत्तर प्रदेश सरकार में अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री मोहसिन रजा कहते हैं कि राज्य में जनसंख्या पॉलिसी बहुत जरूरी है। भारतीय जनता पार्टी मुसलमानों को टोपी से टाई की तरफ ले जाना चाहती है। हमारी सरकार ने इस विषय पर जनता से भी राय मांगी है। इसके बाद ही हम इस कानून को लाएंगे।

भाजपा के तीन सांसद सुब्रमण्यम स्वामी, हरनाथ सिंह यादव और अनिल अग्रवाल ने राज्यसभा में प्राइवेट मेंबर बिल पेश किया है। इस बिल में दो से ज्यादा बच्चे पैदा करने वालों पर कठोर कार्यवाही का प्रावधान है। नौकरी छिनने से लेकर मताधिकार और राजनीतिक रोक, मनोनयन पर रोक, मुफ्त भोजन बिजली पानी की सब्सिडी और वित्तीय संस्थाओं से लोन पर रोक लगाना प्रस्तावित है जब यह बिल व्हाया उत्तर प्रदेश और असम के जरिए लाने की कोशिश हो रही है तब यह सच्चाई भी सामने आ रही है कि जिन राज्यों में बीस प्रतिशत से अधिक मुस्लिम आबादी है वहां की प्रजनन दर राष्ट्रीय औसत 1.8 से नीचे है केवल उत्तर प्रदेश को छोड़कर जहां औसत प्रजनन दर 2.4 है। यह भी सही है कि प्रजनन दर का सीधा संबंध शिक्षा सामाजिक आर्थिक स्थिति, स्वास्थ्य सुविधाओं और जागरूकता से है।

जनसंख्या नियंत्रण के लिए उत्तर प्रदेश का प्रस्तावित कानून ऐसे वक्त पर लाया जा रहा है जब प्रदेश में विधानसभा चुनाव निकट है, यह तथ्य ही इसके राजनीतिक निहितार्थ को स्पष्ट कर देने के लिए काफी है। दूसरा यह कि सत्ताधारी पार्टी के राजनीतिक एजेंडा के लिहाज से भी यह अनुकूल है।  इसमें संदेह नहीं कि यह धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय और निम्न वर्गीय जनता को लक्ष्य करता है। इसके पीछे यह मिथक काम कर रहा है कि मुस्लिमों और दलित निम्नवर्ग की जनसंख्या हिंदुओं की अपेक्षा तेज़ी से बढ़ रही है। यदि उस पर काबू न किया गया तो एक दिन उनकी संख्या हिंदुओं से आगे निकल जाएगी और हिन्दू अल्पसंख्यक हो जाएंगे। यह झूठ इतनी बार ज़ोर-शोर से दुहराया गया है कि अब बहुसंख्यक समुदाय की मानसिकता में पैठ बना चुका है। 2011 की जनगणना के वास्तविक आंकड़े भले ही इस झूठ का पर्दाफाश कर देते हों दुष्प्रचार आखिर किस सत्य को स्वीकार करता है। जनगणना के आंकड़े स्पष्ट कहते हैं कि बीते दशकों में हिंदुओं की तुलना में मुस्लिम बहुल राज्यों में और पूरे देश में जनसंख्या वृद्घि की दर अपेक्षाकृत कम रही है लेकिन प्रचार यही किया जाता है कि मुस्लिम कई शादी करते हैं जिससे आबादी बेतहाशा बढ़ रही है। स्पष्ट है हिन्दू-मुस्लिम ध्रुवीकरण के राजनीतिक प्रोजेक्ट के रूप में जनसंख्या स्थिरीकरण के इस कानून को लाया जा रहा है। यह भी स्पष्ट है कि उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनाव में धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण के पुराने नुस्खे को फिर आजमाया जाएगा।  संभावना यह भी है कि समान नागरिक संहिता लागू करने की बातें भी अब ज़ोर-शोर से की जाएंगी।
 
किसानों के मुद्दों की उपेक्षा होने से उन्हें धार्मिक आधार पर गोलबंद करने की रणनीति के अलावा भाजपा के पास और कोई उपाय है भी नहीं। इस मुद्दे का राष्ट्रीय स्तर पर प्रचार कर ध्रुवीकृत बहुसंख्यक आबादी का समर्थन हासिल करने के लिए संसद में जनसंख्या बिल पारित करने के प्रयास किये जाएंगे। गौर करें कि ये निजी विधेयक के रूप में पेश किए जारहे हैं ताकि सीधे विरोध की स्थिति में सरकार उससे बचकर निकल जाए। भारत में जनसंख्या नियंत्रण के लिए सरकारी और स्वैच्छिक प्रयास छह दशक पहले से ही किये जा रहे हैं। आपातकाल में उसे लेकर सख्ती भी बरती गई थी। इसलिये जनसंख्या नियंत्रण और समान नागरिक संहिता को एक समग्र राजनीतिक एजेंडा के हिस्सों के रूप में देखा जाना चाहिये। उत्तरप्रदेश में प्रस्तावित कानून से समाज के निम्नवर्ग के लोगों के प्रभावित होने की आशंका अधिकहै। इनमें से ज़्यादातर दलित हिन्दू और अशिक्षित मुस्लिम हैं क्योंकि जनसंख्या वृद्घि की दर गरीब और अशिक्षित जनता के बीच अपेक्षाकृत अधिक है। उनके राजनीतिक अधिकार सीमित होने सत्तापक्ष को लाभ है और सरकार की ओर से मिलने वाली सब्सिडी आदि से वंचित होने से स्वयं सरकार को सरकारी धन की बचत का लोभ है जिसे वित्तीय अनुशासन के नाम पर प्रचारित किया जा सकेगा। अर्थव्यवस्था के नियंत्रण की यह भाजपाई रणनीति है।

विधानसभा चुनाव से पहले उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार  जनसंख्या नीति लागू करना चाहती है। प्रस्तावित कानून के तहत दो से अधिक बच्चों के पिता को किसी भी सरकारी सब्सिडी या किसी कल्याणकारी योजना का लाभ नहीं मिलेगा। इसके अलावा ऐसे व्यक्ति किसी सरकारी नौकरी के लिए भी आवेदन नहीं कर पाएंगे ऐसे लोगों को स्थानीय निकाय चुनाव में भी लडऩे की मनाही होगी। इस पॉलिसी को लेकर राज्य विधि आयोग ने 19 जुलाई तक आम जनता से राय मांगी है। ऐसी चर्चा है कि ये कानून आगामी विधानसभा चुनाव की दिशा पलट सकता है।

ऑल इंडिया शिया पर्सनल लॉ बोर्ड के प्रवक्ता मौलाना यासूब अब्बास ने कहा कि जनसंख्या नियंत्रण कानून सही है। सब चाहते हैं कि जनसंख्या पर नियंत्रण हो लेकिन खासतौर से किसी मजहब को टारगेट करके अगर यह कानून बनाया जा रहा है तो यह गलत है। यह आज का नारा नहीं है। यह जब से होश संभाला है तब से सुन रहे हैं कि हम दो और हमारे दो लेकिन इस पर अमल इसलिए नहीं हो सकता क्योंकि प्रैक्टिकली ऐसा मुमकिन नहीं है।
नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-5 की रिपोर्ट के मुताबिक ज्यादातर राज्यों में फर्टिलिटी रेट प्रजनन दर गिरकर रिप्लेसमेंट प्रतिस्थापन रेट 2.1 के बराबर या नीचे आ गयी है।

जम्मू-कश्मीर, केरल पं. बंगाल सहित जिन राज्यों में मुस्लिम आबादी 20 प्रतिशत से ज्यादा है वहां भी फर्टिलिटी रेट राष्ट्रीय औसत 1.8 से नीचे है। इसमें यूपी अपवाद है जहां दर 2.4 है। 68 प्रतिशत मुस्लिम आबादी वाले जम्मू-कश्मीर में फर्टिलिटी रेट 14 है। यूपी के ग्रामीण क्षेत्रों को छोड़दें तो फर्टिलिटी रेट रिप्लेसमेंट रेट से कम है।
राज्यसभा में जनसंख्या नियंत्रण पर निजी बिल लाने वाले भाजपा सांसद राकेश सिन्हा सर्वे के आंकड़ों को भ्रामक बताते हैं। सिन्हा का कहना है कि क्षेत्रीय आंकड़े भ्रामक हैं। इसे समग्र तौर पर देखना चाहिए। कुछ परिवार एक बच्चा पैदा करते हैं तो कुछ 7.8 तक। ऐसे में संसाधनों का वितरण असमान होता है।
बड़ी कंपनियां भी नहीं चाहती कि जनसंख्या नियंत्रण हो क्योंकि उन्हें सस्ता श्रम चाहिए। बिहार और यूपी इसका दुष्परिणाम भोग रहे हैं।

भारत की जनसंख्या वृद्धि में मुसलमानों ने 14.6 प्रतिशत (1901-2011) 16.1 प्रतिशत (1951-2011) और 16.7 प्रतिशत (1971-2011) का योगदान दिया। दूसरी ओर हिंदुओं का योगदान 79.4 प्रतिशत 78 प्रतिशत और 77.4 प्रतिशत था और बाकी का योगदान इन अवधियों के दौरान 6 प्रतिशत 5.9 प्रतिशत और 5.9 प्रतिशत था। 1901 में हिंदुओं की संख्या भारत में मुसलमानों से 164 मिलियन अधिक थी। 1951 में 268 मिलियन 1971 में 392 मिलियन और 2011 में 794 मिलियन तक। इसलिए कम विकास दर के बावजूद पर बहुत अधिक जनसंख्या के बावजूद हिंदुओं का संख्यात्मक लाभ अन्य तरीकों के बजाय वर्षों से बढ़ा है। वहीं  मुसलमानों की जनसंख्या वृद्धि दर 1971 से घट रही है। 1961-71 के दौरान 30.9 प्रतिशत से 2001-11 के दौरान 24.6 प्रतिशत हो गई। जो लोग मुसलमानों की जनसंख्या विस्फोट के नाम से लोगों को डराकर गुमराह कर रहे हैं, ऐसे लोगों की बातें सुनकर चिंतित होने की जरूरत नहीं है यह सब चुनावी हथकंडे हैं जो अलग-अलग शक्ल और मुद्दों के साथ लोगों को एक दूसरे से लड़ाने डराने के काम आते हैंं।