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नागपंचमी पर चिंतन आलेख: सांप नहीं होते आस्तीन के सांप

नागपंचमी पर चिंतन आलेख: सांप नहीं होते आस्तीन के सांप


- विजय मिश्रा ‘‘अमित’’

भारत भर में श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को नांग पंचमी का पर्व मनाया जाता है। इस पर्व पर नांग सांपों की पूजन की परम्परा है। वेद ग्रंथ तथा वैज्ञानिक तथ्य इस बात की पुष्टि करते हैं कि सर्पों की उत्पत्ति मानव समुदाय को हानि पहुंचाने के लिए नहीं हुई है। अनेक दृष्टि से सर्पों को मानव जाति के लिए जीवनदाता की श्रेणी में रखा गया है। सर्पों की उपादेयता की जानकारी के अभाव में तथा जहरीले सर्पों के भय से मानव समुदाय सदैव सांपो को अपना दुश्मन मानता आया है, जबकि वैज्ञानिक तथ्य बार-बार इस बात को व्यक्त करते है कि सर्प मानव के लिए शत्रु से कहीं ज्यादा मित्र है। किसी इंसान के समक्ष अचानक आ जाने पर अपने बचाव के लिए ही सर्प उसे काटते है अन्यथा सांपों की प्रवृत्ति एकांत में रहने की ही है।


*अन्नदाता की भूमिका में सांप*

मानव समुदाय के लिए सांप मित्र होते है। इसे कृषि वैज्ञानिकों ने तार्किक ढंग से सिद्ध किया गया है। भारत मूलतः एक कृषि प्रधान देश है। यहां खेत एवं उपज को नुकसान पहुंचाने वाले चूहे एवं अन्य कीड़े-मकोड़े आदि का भक्षण कर सांप फसलों की रक्षा करते है। इन अर्थो में देखे तो अप्रत्यक्ष रूप से सांप हमारे अन्नदाता हुए, क्योंकि वे अन्न को नुकसान पहुंचाने वाले जीवों को खा जाते हैऔर अन्न की बर्बादी को रोकते हैं। पर्यावरण संतुलन में भी इनकी भूमिका होती है। आषाढ़ और सावन माह में सर्प जाति अधिक सक्रिय देखी जाती है। दरअसल बारिश के मौसम में खेतों के रक्षक एवं कृषकों के मित्र सर्पों का प्राकृतिक आवास (बिल, पेड़ों के खोह) पानी भर जाने के कारण के नष्ट हो जाते है। ऐसी परिस्थिति में सांपों का बाहर निकलना एक स्वाभाविक प्रकिया है। यही वजह है कि सर्प दंश की ज्यादातर घटनाएं वर्षाकाल में ही होती है। यह भी याद रखना चाहिए कि अधिकतर सांप जहरीले नहीं होते, अतः देखते ही सांपों को मार डालने की प्रवृत्ति मानव समुदाय संग सांप के लिए भी घातक सिद्ध होगी।

सर्पो के प्रति संवेदना बनाये रखने तथा अन्न एवं पर्यावरण को सुरक्षित रखने में योगदान देने हेतु कृतज्ञता के भाव व्यक्त करने की दृष्टि से ही नागपंचमी का पर्व मनाने की प्रथा प्रारंभ हुई। नागपूजन की परम्परा अत्यंत प्राचीन है। यह परम्परा भारत के अलावा अन्य देशों में भी प्रचलित है।

भारत में लगभग 140 प्रजातियों के सर्प पाये जाते है जिनमें से ज्यादातर जहरीले नहीं होते। अनावश्यक छेड़े जाने पर अथवा अनायास किसी मनुष्य के निकट आ जाने पर अपने बचाव के लिए वे काटते है। भारत में 15 से 20 प्रतिशत अनाज को चूहे तथा अन्य जीव बर्बाद कर देते है या फिर चट कर जाते है। विश्व स्तर पर किये गये सर्वेक्षण में पाया गया कि दुनिया भर के खाद्य पदार्थ में से 5 प्रतिशत हिस्सा चूहे हजम कर जाते है। इतने खाद्य पदार्थो से 10 करोड़ से अधिक लोगों को भूखमरी से बचाया जा सकता है। अन्नों के दुश्मन चूहों को खाकर नष्ट करने के कारण ही सापों को मनुष्य मित्र कहलाने का हक मिला है। 

*कान नहीं होते सांप के*

सांप देख सकते है ।सुंघ सकते है, पर सुन नहीं सकते। सांपों के कान नहीं होते उनके कान का काम इनकी त्वचा करती है ।इनके द्वारा ही सांपों को किसी प्रकार की ध्वनि-कंपन का आभास होता है, अतः बीन की आवाज पर सांप नाचते हैं सोचना एक मिथक है। नांग सांप दूध भी नहीं पीते है जैसा कि नागपंचमी के दिन दिखाया जाता है। 

 *सर्पों की खाल का व्यापार*

सृष्टि के सभी प्राणी एक दूसरे पर आश्रित है।इसमें मानव सर्प संबंध भी शामिल है। ऐसे में एक प्राणी का लुप्त प्राय होना शुभ संकेत नहीं कहा जा सकता। सर्पों के बारे में यही बात लागु होती है। सर्पों के विष और खाल का व्यापार भी सर्प प्रजाति के अस्तित्व के लिए खतरा बना हुआ है। भारत वर्ष में तंजौर (आन्ध्रप्रदेश) ऐसे धंधो के लिए मशहूर है। सर्पों की खाल से बैग, बेल्ट, पर्स, सेंडिल तथा विष से औषधियां निर्मित की जाती है। 1974 में बने कानून के मुताबिक सर्पों की खाल विष का व्यापार अपराध की श्रेणी मेें आता है। इसे अनदेखी करते हुए आस्तीन के सांप बने कुछ लोग चंद रूपयों के लालच में सर्पों की बेरहमी से हत्या करते है। ऐसी स्थित रही तो सांपों का अस्तित्व समाप्त हो जायेगा, जो कि अनेक दृष्टि से सृष्टि के लिए हानिकारक सिद्ध होगा।धातू निर्मित सर्प की पूजा करना और जीवित सर्पों को देखते ही मार डालने की मानवीय प्रवृत्ति से लुप्त होते सर्प वंश की रक्षा कतई नहीं हो सकती है। अतः नागपंचमी पर सर्पों की हिफाज़त का संकल्प लें,इस पर्व की सार्थकता तभी सिद्ध होगी।