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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से -मौजूदा टीकाकरण पॉलिसी में बदलाव की जरूरत

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से  -मौजूदा टीकाकरण पॉलिसी में बदलाव की जरूरत

- सुभाष मिश्र
ये इसका टीका है ,ये उसका टीका है की बजाय अब जो टीका उपलब्ध है, वह सबका टीका है। राष्ट्र के टीके को केन्द्र राज्य के बीच बांटना टीकाकरण अभियान में अवरोध पैदा करना ही होगा। केन्द्र सभी राज्यो को समान दर पर सबके लिए टीके उपलब्ध कराये। जो व्यय भार टीका खरीदने पर आये उसे केन्द्र वहन करे, यदि ऐसा करना संभव ना हो तो बाद में हिसाब-किताब करके राज्यों से ले ले। आज इस फार्मूले को अपनाने की जरूरत है। जो टीकाकरण केंद्र पर आये वह टीका सबको लगे यह जरूरी है। अभी हाल ही में पहले टीकाकरण से दूसरे टीकाकरण की अवधि को बढ़ाकर 16 सप्ताह तक कर दिया गया है। राष्ट्रीय टीकाकरण तकनीकी सलाहकार समूह ने टीके की दूसरी डोज के लिए 3 से 9 माह के अंतराल का सुझाव दिया है। कल शायद ये भी कहा जा सकता है एक लग गया वही पर्याप्त है। उनकी सोचो जिन्हे एक भी टीका नहीं मिला। वैसे ही देश को बहुत से मामलों में पहले ही खूब बांटा जा चुका है। अब कोरोना टीकाकरण के नाम पर ना बांटा जाये। कोरोना का वायरस ना जात-पात, अमीर-गरीब ,ना धर्म, ना किसी सीमा को जानता है, वह विश्वव्यापी है।

टीकाकरण के लिए 18+ के जो लोग जा रहे हैं, टीका उपलब्ध नहीं होने के कारण बहुत से लोग टीकाकरण केंद्रों से लौट रहे हैं। उसी टीकाकरण केंद्र पर उपलब्ध टीको को लगाने 45 वर्ष से ऊपर के लोग कम आ रहे हैं। एक ही केंद्र पर अलग-अलग आयु समूह के आधार टीको की उपलब्धता को देखते हुए टीकाकरण की मौजूदा पॉलिसी में बदलाव करते हुए हमें उपलब्ध टीको को अधिकतम आबादी को लगाने की जरूरत है। यदि हम देश की 50 प्रतिशत आबादी को भी टीकाकरण कर देते हैं तो हो सकता है कि हम भी बाकी देशों की तरह भयमुक्त होकर काम काज कर सकें।

सरकार द्वारा हाल ही में लिए गये निर्णयों के प्रकाश में 45+ की रणनीति बदलने की जरूरत है। देश की आबादी के 20 प्रतिशत यानी 26 करोड़ लोग 45+ में आते हैं। जिनमें से 8-10 करोड़ लोग गांवों में रहते हैं। इनमें बहुत सारे लोगों तक सरकार पहुंच नहीं पा रही है या अपनी अज्ञानता, अंधविश्वास और बहुत से कारणों से ग्रामीण क्षेत्र के लोग टीकाकरण के लिए फिलहाल आगे नहीं आ रहे हैं। ऐसे में जो लोग भी टीकारण कराने आगे आ रहे हैं उन्हें बिना गांव, शहर, उम्र आदि के वर्गीकण के टीके लगवाने की जरूरत है। गांवों में टीकाकरण बढ़ाने के लिए पंजाब सरकार की तरह सौ प्रतिशत वैक्सीनेशन पर दस लाख का पुरस्कार देने की कोरोना मुक्त पिंड के नाम से जो योजना चलाई जा रही है वैसी योजना पंचायतों में चलाए जाने की जरूरत है।

कोरोना की दूसरी लहर के दौरान यह भी देखने में आया है कि इससे प्रभावित होने वाले में 45 साल से कम आयु वर्ग के लोग अधिक है, जिनमें बच्चे भी शामिल है। +45 के आयु समूह में 60 साल से ऊपर वाले 6.49 करोड़ लोगों को तथा 45 से 60 साल के 5.76 करोड़ लोगों को कोरोना टीके की पहली डोज लग चुकी है। इसी तरह 92,39,392 करोड़ लोगों को कोरोना वैक्सीन की दूसरी डोज लगी है।

पूरे देश को इस सच्चाई को स्वीकार करने में कोई झिझक नहीं होनी चाहिए की अभी हमारे पास मांग और जनसंख्या के अनुसार टीके के डोज उपलब्ध नहीं है। मन की बात कहने वाले हमारे प्रधानमंत्री ये बात सबको बताएं की टीका कब और कैसे मिलेगा। वैसे बताया तो यह जा रहा है की आने वाले समय में हमें अलग-अलग कंपनियों देशों के माध्यम से 18.44 करोड़ डोज उपलब्ध हो जायेंगे। ऐसे में हमें एक ऐसी रणनीति पर जिसमें उम्र का बंधन न हो, जो टीका लगाने आये उसे टीका लगे इस पर विचार करना जरूरी है।

इस समय गांवों में कोरोना संक्रमण की रफ्तार बढ़ी है किन्तु वहां पर ना तो टेस्टिंग और ना ही उपचार की सुविधा। ऐसे में गांव वाले भगवान भरोसे है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ऐसी स्थिति को देखते हुए कहा कि राम भरोसे है चिकित्सा सुविधा। गंगा, जमुना, सरयू जैसी नदियों के किनारे बड़े पैमाने पर लाशों को दफना या नदीं में डालना इस बात का संकेत है कि गांव में कोरना बुरी तरह फैला है और उससे लोगों की मौत हो रही है। गांव वालों के पास मृतकों की सम्मानजनक अत्येष्टी करने के लिए पैसे भी नहीं है। कोरोना से मरने वालों के जो आंकड़े सरकार बता रही है, वह वे है जो अस्पतालों में दर्ज है, वे लोग जो किसी अस्पताल में नहीं गये उनके आंकड़े कहीं दर्ज नहीं है। सरकारी रिकार्ड के अनुसार अभी तक ढाई करोड़ से अधिक कोरोना पॉजिटिव केस पाये गये हैं, जिनमें से अभी तक 2.64 लाख लोगों की मृत्यु होना बताया गया है। श्मशान, कब्रिस्तान और लोगों की जुबानी ये आंकड़े बहुत आए हैं। वैक्सीनेशन के अलग-अलग समूह होने के कारण 16 जनवरी से प्रारंभ महाटीकाकरण अभियान में अब तक 44 लाख से ज्यादा खुराक नष्ट हो चुकी है। भारत में कोविड-19 टीके की औसतन 6.5 फीसदी खुराक बर्बाद हो रही है, जबकि तेलंगाना में 17.6 प्रतिशत और आंध्र प्रदेश में यह बर्बादी 11.6 प्रतिशत है। 44 लाख टीकों की खुराक में से तमिलनाडु में सबसे ज्यादा 12.01 फीसदी की बर्बादी हुई। इसके बाद हरियाणा का नंबर है, वहां 9.74 फीसदी, पंजाब में 8.12 फीसदी, मणिपुर में 7.8 फीसदी, तेलंगाना में 7.55 फीसदी खुराक बेकार हुई।
रायपुर में 18 प्लस के हितग्राहियों की एक भी डोज बर्बाद नहीं हो इसके लिए वैक्सीन सेंटर में उधारी का फार्मूला अपनाया जा रहा है। एक श्रेणी की बची डोज दूसरी श्रेणी के हितग्राहियों के लिए उधार देकर उसे एडजस्टमेंट किया जा रहा है। वैक्सीन की एक वायल में 10 डोज रहती है। वायल खुलने के बाद अगर 10 लोग नहीं पहुंचे तो करीब 6 घंटे बाद बची हुई डोज खराब हो जाती है। रायपुर में जब 1 मई से युवाओं का वैक्सीनेशन शुरु हुआ तब शुरूआती पांच दिन में ही 77 से ज्यादा डोज बर्बाद हो गए थे। इससे सबक लेकर चार अलग-अलग श्रेणियों में लगाए जा टीको को चारों श्रेणियों के बीच उधारी का सिस्टम बनाया। इससे अब टीके खराब नहीं हो रहे हैं।

अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों में जहाँ वैक्सीन लगाने की रफ़्तार तेज़ है और आबादी के एक बड़े हिस्से को टीका लग चुका है, वहाँ कोरोना की लहर धीरे-धीरे कम हो रही है। यदि हमें भी अपने देश से कोरोना के भय, संक्रमण को समाप्त करना है तो हमें टीकाकरण की वर्तमान नीति और व्यवस्था पर पुर्नविचार करके ऐसी नीति बनानी होगी जो सबके लिए सुलभ हो। बिना किसी उम्र, वर्ग के अंदर के प्रत्येक नागरिक को कोरोना वैक्सीन के टीके उपलब्धता के अनुसार लगाए जाये।